भगवान कालभैरव अष्टमी को मदिरा को क्यों चढ़ाई जाता है जानिए

 भगवान  कालभैरव अष्टमी को मदिरा को क्यों चढ़ाई जाता है  जानिए

कालभैरव अष्टमी 

शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव के अंश से ही कालभैरव की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए अष्टमी तिथि को आने वाली कालाष्टमी को काल भैरवाष्टमी या भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान शिव जल्द प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और अमोघ फल की प्राप्ति होती है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, मार्गशीष अष्टमी को भगवान शिव ने काल भैरव के रूप में अवतार लिया था. काल भैरव भगवान शिव के रौद्र, विकराल एवं प्रचण्ड स्वरूप हैं. इस दिन भैरव जी के साथ शिव और मां पार्वती की भी पूजा की जाती है.
शिव महापुराण के अनुसार जब भगवान महेश, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा अपनी श्रेष्ठता और पराक्रम के बारे में चर्चा कर रहे थे, तो भगवान शिव भगवान ब्रह्मा द्वारा कहे गए झूठ के कारण क्रोधित हो गए। इसके परिणाम के रूप में, भगवान कालभैरव  ने  क्रोध में भगवान ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया। इसलिए इसी तिथि पर शिवजी के क्रोध से कालभैरव अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। वैसे तो भगवान कालभैरव को किसी भी चीज का भोग लगा सकते हैं, लेकिन भगवान काल भैरव का सबसे प्रिय भोग मदिरा है। आइए जानते हैं कालभैरव को मदिरा को क्यों चढ़ाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से काल भैरव की पूजा करने से आपके घर परिवार से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और इसी के साथ ही अगर किसी ने आप पर कोई तंत्र-मंत्र किया हो, तो वह भी विफल होता है. काल भैरव की सवारी श्वान अर्थात कुत्ता है, इसलिए इस दिन कुत्ते को दूध पिलाने से बहुत पुण्य मिलता है. काल भैरव की पूजा अर्चना करने से सभी तरह के दुख- दर्द दूर हो जाते हैं.

क्या है मदिरा अर्पित करने का रहस्य 

ज्योतिषविदों के अनुसार किसी भी धर्म शास्त्र में मदिरा के भोग का उल्लेख नहीं मिलता है। इसके पीछे सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक भाव है। दरअसल मदिरा बुराई का प्रतीक है। और जब आप अपनी यह वस्तु भगवान को अर्पित कर समर्पित कर देते हैं तो इसका अर्थ है कि हम सभी प्रकार की बुराइयों से छुटकारा चाहते हैं। जिस प्रकार भगवान भोलेनाथ ने अपने भैरव रूप में ब्रह्मा जी के पाँचवे सिर को काट दिया था वो सिर बुराई का प्रतीक था। कालभैरव को चढ़ाई जाने वाली अन्य तामसिक चीजों के पीछे भी यही भाव होता है। ये सभी चीजें बुराई का प्रतीक है। इन्हें भगवान को समर्पित कर हमें इनसे दूर हो जाना चाहिए। यही इस परंपरा का मनोवैज्ञानिक भाव है।

भगवान काल भैरव  की धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता है कि भगवान काल भैरव की पूजा करने से भय से मुक्ति प्राप्त होती है. कहते हैं कि अच्छे कर्म करने वालों पर काल भैरव मेहरबान रहते हैं, लेकिन जो अनैतिक कार्य करता है, वह उनके प्रकोप से बच नहीं पाता है. साथ ही कहा जाता है कि जो भी भगवान भैरव के भक्तों का अहित करता है. उसे तीनो लोक में कहीं भी शरण प्राप्त नहीं होती है.

भगवान काल भैरव  के हैं आठ स्वरूप

ये रूप भीषण भैरव, चंद्र भैरव, क्रोध भैरव, रुद्र भैरव, असितांग भैरव, संहार भैरव, कपाली भैरव, उन्मत्त भैरव हैं. इस दिन कालभैरव की पूजा करने से जीवन की समस्त बाधाएं दूर होती हैं और काल भय भी खत्म हो जाता है.

भगवान काल भैरव को ऐसे करें प्रसन्न

प्रात कालः स्नान आदि के बाद भैरव जी के मन्दिर में जाकर उनकी पूजा करनी चाहिए और भैरव के वाहन कुत्ते को पुए खिलाना चाहिए. भगवान भैरव को इमरती, जलेबी, उड़द, पान, नारियल का भोग लगाएं. भैरव जी को काशी का कोतवाल माना जाता है. भैरव के पूजा से राहु ग्रह भी शान्त हो जाते है और बुरे प्रभाव शत्रु भय का नाश होता है.

भगवान भैरव की पूजा का चमत्कारी मंत्र

  1. ॐ भैरवाय नम:
  2. ॐ कालभैरवाय नमः
  3. ॐ भयहरणं च भैरवः
  4. ॐ ब्रह्म काल भैरवाय फट,

कब करें काल भैरव की पूजा

भगवान भैरव की पूजा के लिए रात्रिकाल की साधना को सबसे उत्तम माना गया है. हालांकि आज आप किसी भी समय अपनी सुविधा के अनुसार भगवान भैरव की विधि-विधिान से पूजा कर सकते हैं क्योंकि अगहन मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी आज पूरे दिन रहेगी. भगवान भैरव की प्रदोष काल में की पूजा भी अत्यंत ही शुभ और फलदायी मानी गई है.

 

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