भगवान गणेश चालीसा के प्रत्येक पंक्ति का भावार्थ (अर्थ) हिंदी में निम्नलिखित है

गणेश चालीसा के प्रत्येक पंक्ति का भावार्थ (अर्थ) हिंदी में निम्नलिखित है

॥दोहा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

॥दोहा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
"सदा सुखीन्द्रदायक गणनायक, महामन भजन गुणगायक।
जननि प्रियव्रत महादानी, भवभयहारक विघ्नविनायक॥"

सदा सुख की प्राप्ति करने वाले, समृद्धि के नायक, मन को शांति देने वाले और उनके गुणों के गान करने वाले भगवान गणेश को स्तुति किया जाता है। उन्हें माता जाकी के प्रिय व्रतधारी, महादानी और संसारी जनों के भय और अभय के हारक विघ्नविनायक कहा गया है।

"चन्द्रार्का वज्रार्का, कोटिसूर्य समप्रभ।
निरज्जनमुखभयहारक, काँपत त्रिभुवन भव।।"

भगवान गणेश को चंद्र और वज्र के समान प्रकाशित, कोटि सूर्य समान भव्य, विपदा और भय से मुक्ति देने वाले और त्रिभुवन को कांपने वाले कहा गया है।

"सुरनारद मुनि अरिंद, गामिनि वंदन नरनारायण।
भवभयहारिण निस्तारण, दीनबंधु दुःखहारक।।"

भगवान गणेश को सुरनारद मुनि, लोकों के गामिनि और नारायण का वंदन करने वाले, संसार से भयहारी और निस्तारण करने वाले, दीनबंधु और दुखों का नाश करने वाले कहा गया है।

"सदानन्द विकासक, भवकार खण्डन अमितरस्मि भुवनरतिनन्दन।
विघ्नराज नमित कुचाकुम्भकन्धर मानस मनोहर मूरतिनन्दन॥"

भगवान गणेश को सदा आनंदमय, भव कारणों को खंडित करने वाले, अमित रसों से भरे हुए भव संसार में रति प्रदान करने वाले, विघ्नों के राजा और नमस्कार करने वाले, देवी लक्ष्मी के स्थान से कुम्भकन्धर (पार्वती के पुत्र) और मन को मोहित करने वाले मूर्ति नन्दन कहा गया है।

"भारती नित नेमहंत, नित भक्त अभयदायक।
विकटरूप बदन सुरभूप, करहुँ कृपा अति भक्तिकायक॥"

भगवान गणेश को भारती देवी के नित नेमहंत और नित भक्तों को अभय देने वाले कहा गया है। उनके विकट रूप वाले शरीर से सुर और भूप भयभीत हो जाते हैं, लेकिन उन्हें कृपा करें और अत्यंत भक्तिपूर्वक पूजें, ऐसी भक्ति का कारण बनें।

"मोदक प्रियकर शुभनिधि, सुरकन्या समेत अर्चित।
मोद अनन्द सुखकर, कृपानिधि कीजै सेवित॥"

भगवान गणेश को मोदक रस (लड्डू के रूप में प्रसिद्ध) का प्रियकर, शुभनिधि (मंगलकारी), सुरकन्याओं के साथ पूजित, आनंददायक और सुखकर, कृपानिधि (कृपा का भंडार) के रूप में सेवनीय कहा गया है।

"मम नीवास तू, मम दूरवास तू।
हृदयँ कमल में विराजत, जगदीश तू सुरगुरु॥
"

भगवान गणेश को मेरा निवास, मेरा दूरवास, हृदय में विराजमान, जगदीश, सुरगुरु कहा गया है। उनके हृदय में सभी देवी-देवताओं की आराधना होती है और वे सभी के गुरु हैं।

"सोहन पद जगमग जगत में आवत, सुमण सोहन सुरबर विराजत।
असुर शत्रु मनभवन के, संकट विपत्ति विनाशक भव में॥"

भगवान गणेश के सुन्दर पाद जगमग कर जगत में आवते हैं, सुमण सोहन (सुंदर भवन की ओर जाने वाले) स्वर्ग में विराजमान होते हैं। वे असुर शत्रुओं के मनोभवन को विनाश करने वाले हैं और भव संसार में सभी संकट और विपत्तियों का नाश करने वाले हैं।

"भक्तन के दुःख हरने वाले, विनायक जी जनत उदार।
दुर्जन दलन जनसुखदायक, काँपत अज्ञान उधार॥"

भगवान गणेश भक्तों के दुःखों को हरने वाले हैं, वे अपने भक्तों के प्रति उदार हैं। दुर्जनों के दलन करने वाले हैं, जन को सुख प्रदान करने वाले हैं और अज्ञान को उधार करने में सक्षम हैं।

"अन्ध नैनन विचारविहीन, मूषक सुंद रुप धारी।
भुजचार अरुणाकर महादेव, लिये सज्जन पारि॥"

भगवान गणेश के नैन अंधेरे में देखने वाले विचार-विहीन हैं, उनके मूषक (मूषकराज गणेश का वाहन) सुंदर रूप धारण करते हैं। उनके भुजचार (चार भुजाएं) सूर्य के समान चमक रहे हैं और उन्होंने सज्जनों को पार करने में सहायता की है।

"जय जय जय गणपति गणराज।
मंगलकारक सब उदार॥"

भगवान गणेश को जय जय जय कहा गया है, वे सबका मंगल करने वाले और सभी के उदार हैं।

"जय जय जय जय जय जय गणपति गणराज।
जय जय जय जय जय जय जय जय गणपति गणराज॥"

भगवान गणेश को जय जय जय कहने से भक्त के मन में भगवान के गुण और महिमा का स्मरण होता है, और उनकी पूजा और भक्ति से वे अपने भक्तों को सदैव आशीर्वाद देते हैं। इस चालीसा के द्वारा भक्त भगवान गणेश को स्तुति और समर्पण करते हैं और उनके आशीर्वाद से उनके जीवन को मंगलमय बनाने की कामना करते हैं।

चालीसा के मंत्र और उनका हिंदी अर्थ

गणेश चालीसा एक प्रसिद्ध भजन है जो भगवान गणेश की प्रशंसा करता है। इसमें गणेश भगवान के गुण, महिमा और शक्तियों का वर्णन किया गया है। यह चालीसा गणेश भक्तों द्वारा रोजाना पढ़ी जाती है और उनके जीवन में समृद्धि, सुख, शांति और भक्ति का साधना करती है।
चालीसा का जितना महत्व है, उसके मंत्र और अर्थ को भी समझना उतना ही महत्वपूर्ण है। नीचे दिए गए हैं गणेश चालीसा के मंत्र और उनका हिंदी अर्थ

॥ चालीसा का मंत्र ॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

॥ चालीसा का अर्थ ॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।

भगवान गणेश को जय जय जय कहते हैं। माता जाकी पार्वती और पिता महादेवा। (गणेश के माता-पिता माता पार्वती और पिता शिव हैं।

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड़ूअन का भोग लगे संत करें सेवा॥

भक्त गणेश भगवान को पान, फूल और मेवा चढ़ाते हैं। उन्हें लड़्डू का भोग लगता है और संत उनकी सेवा करते हैं

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को धनवाया॥

भगवान गणेश अंधों को आंखें देते हैं, कोढ़ी लोगों को शरीर (स्वस्थ शरीर) देते हैं। बाँझ लोगों को पुत्र (संतान) देते हैं और निर्धन को धनवान (सम्पन्न) बनाते हैं।

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
सूरदास तुलसीदास जननी जनाकी।
प्रेम भक्ति जननी जन्म सुखदायकी॥

सूरदास, तुलसीदास, जननी जाकी (पार्वती)। प्रेम भक्ति जननी (भक्ति और प्रेम की जननी) जन्म सुखदायकी (सुखदायक माँ)॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

गणेश चालीसा के इस मंत्र और अर्थ के द्वारा भक्त भगवान गणेश की प्रशंसा करते हैं और उन्हें आशीर्वाद
 प्राप्त करते हैं। यह चालीसा भक्तों के दिलों में भक्ति और श्रद्धा का अभिवादन करती है और उन्हें सुखी और समृद्ध जीवन देती है।

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