भगवान शिव के बारे में जानिए विष पीने की कथा।/ Know the story of Lord Shiva drinking poison.

 भगवान शिव के बारे में जानिए विष पीने की कथा।

भगवान शिव के बारे में

शिव जी देवों के देव महादेव कहलाते हैं। भगवान शिव का स्वरूप अन्य देवताओं से अलग माना जाता है। शिव जी को कई नाम है। शंकर,भोलेनाथ,महेश्वर,शम्भू और नीलकंठ आदि के नाम से जानते हैं। पुराणों के अनुसार शिव जी के 108 नाम हैं। भगवान शंकर दयालु स्वभाव के हैं। भोलेनाथ की पूजा से भक्त मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। त्रिशूल भगवान शंकर का अस्त्र है। वैसे अस्त्र संहार का प्रतीक मन जाता है। पर शिवजी का त्रिशूल संसार की तीन तरह की प्रवृत्तियों को दर्शाता है।

[1]भगवान शिव के विष पीने की कथा;-

समुद्र मंथन के कथानक के अनुसार, देवता और असुरों के बीच एक महत्वपूर्ण संधि (समझौता) हुआ था कि उन्हें अमृत (अविनाशी रस) प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन करना चाहिए। इस समुद्र मंथन के दौरान, मंथन का एक अंश मंदराचल पर्वत के साथ बाँधा जाता है और उसे मंथन करने के लिए वसुकि नाग (सर्पराज वसुकि) को रस्सी के रूप में उपयोग किया जाता है।
देवता और असुरों द्वारा मंथन किये गए समुद्र से विभिन्न रत्नों, वस्त्रों, देवी-देवताओं और विष की उत्पत्ति होती है। यह विष भयानक पदार्थ होता है और नागों के लिए विषाधार (विष का स्वरूप) होता है। इस प्रकार, विष के उद्भव के समय, विषाधार भगवान शिव ने विष पिया था।
भगवान शिव के विष पाने का यह कथानक प्रसिद्ध है और हिंदू पुराणों में उल्लेख किया जाता है। इसके अलावा भी कई अन्य कथाएं भी हैं जो भगवान शिव के विष पाने के बारे में बताती हैं, लेकिन समुद्र मंथन की कथा सबसे लोकप्रिय है।

[2] विष पीने की कथा;-

एक बार जब सृष्टि में महाप्रलय आयी थी। तब देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र मंथन किया गया था। जिससे अमृत और अन्य अनमोल चीज़ों की प्राप्ति हो सके। समुद्र मंथन में विष भी निकला। जिस प्रकार अच्छाई के साथ बुराई भी आती है। उसी प्रकार समुद्र मंथन में अमृत के साथ विष भी आया था। इस विष का नाम हलाहल विष था। कोई भी देवता और असुर इस विष को पीने के लिए तैयार नहीं था।
शिव जी ने हलाहल विष को पिया था। यह विष जैसे ही शिव जी की कंठ पर गया। माँ पार्वती ने शंकरजी के गले को पकड़ लिया था। जिसके कारण विष उनके गले पर रुक गया। जिसकी वजह से शिव जी का गला नीला पड़ गया था। तबसे शिव जी का नाम नीलकंठ पड़ा। माँ पार्वती ने शिव जी से विष पीने का कारण पूछा। शिव जी ने कहा। अगर इस विष को नहीं पीता। तो इस सृष्टि का नाश हो जाता। क्योंकि विष की एक बूँद सम्पूर्ण सृष्टि को तबाह कर देती।

 भगवान शिव के विष पीने के संबंध में 10 महत्वपूर्ण तथ्य हैं:-

1. विष पीने की कथा में, भगवान शिव ने अपनी दया और धैर्य के कारण विष पिया, जो उन्हें विशेष शक्ति और अमरत्व देता है।
2. विष की प्राप्ति से पहले, वह सदाशिव या नीलकण्ठ (नीली गले वाला) कहलाते थे। विष पाने के बाद, उनका गला नीला हो गया।
3. विष पीने के बाद, भगवान शिव के गले में विष निर्मित हुआ, जो उन्हें पहनने के लिए एक आभूषण की तरह था।
4. विष पीने के कारण, भगवान शिव को नीलकण्ठ या नीलकंठेश्वर (नीली गले वाले ईश्वर) भी कहा जाता है।
5. विषाधारी नागों को उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने उपयोग में लिया। यह कथा भगवान शिव और भगवान विष्णु के मध्य अद्वैत संबंध की प्रतीक है।
6. विष पीने के बाद, भगवान शिव ने विषुवानाथ या विष्णुवानाथ (विष पीने वाले ईश्वर) कहलाये जाने लगे।
7. भगवान शिव के विष पाने की कथा ने उनके
 पुराणिक महत्व को बढ़ाया है और भगवान शिव की पूजा, व्रत और आराधना में विशेष महत्व रखती है।
8. विष पीने की कथा ने विष को भगवान शिव के विशेष प्रतीक के रूप में स्थापित किया है।
9. भगवान शिव के विष पाने की कथा से हमें यह सिखाया जाता है कि धैर्य और समर्पण के द्वारा कठिनाइयों को पार किया जा सकता है।
10. विष पाने की कथा का महत्वपूर्ण सन्देश है कि शरीरिक और मानसिक कष्टों के बावजूद, आत्मा अमर है और विषयों से परे है। भगवान शिव के विष पाने के द्वारा हमें इस अमरत्व की याद दिलाई जाती है।

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