भगवान शिव से बड़ा कौन है जानिए शिव पुराण की कथा क्या है

भगवान शिव से बड़ा कौन है जानिए शिव पुराण की कथा क्या है

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को महादेव या महाकाल के रूप में जाना जाता है। शिव हिन्दू त्रिमूर्ति का एक अंग हैं और उन्हें भगवान ब्रह्मा (सृष्टि के देवता) और भगवान विष्णु (पालने के देवता) के साथ समान माना जाता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में शिव को सर्वोच्च देवता माना जाता है। वे त्रिमूर्ति के रूप में सृष्टि, स्थिति और प्रलय के लिए जिम्मेदार होते हैं। उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं के प्रमुख देवता माना जाता हैं। इसलिए, शिव से बड़ा कोई दूसरा देवता नहीं माना जाता है।हिन्दू धर्म में, शिव को सर्वशक्तिमान, अनंत, अद्वैत, निर्गुण, निराकार, अव्यक्त, अविनाशी, नित्य, अविकारी और जगत के सृष्टि-स्थिति-लय का कारण माना जाता है। उन्हें सभी देवताओं का सर्वोच्च माना जाता हैं और उन्हीं की पूजा-अर्चना की जाती है।इसलिए, हिन्दू धर्म में भगवान शिव को कोई भी दूसरा देवता उनसे ऊँचा माना नहीं जाता हैं। वे सर्वोच्च देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
    भगवान शिव हिन्दू पौराणिक के अनुसार, उनसे भी बड़े कोई दूसरे देवता नहीं हैं। हिन्दू धर्म में भगवान शिव त्रिमूर्ति में से एक हैं, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर (शिव) शामिल होते हैं। यह त्रिमूर्ति देवताएं सृष्टि, स्थिति और संहार के अधिपति हैं।भगवान शिव को यहां बड़ा माना जाता है क्योंकि उन्हें त्रिमूर्ति के संहारी अस्पेक्ट के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव के विशेष धर्मिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण, उन्हें अपार भक्ति और सम्मान के साथ पूजा जाता है। यहां एक बार फिर स्पष्ट करने के लिए, भगवान शिव के अनुसार किसी दूसरे देवता से उन्हें बड़ा माना जाना सही नहीं है। इस विचारधारा को मानने वाले लोग हिंदू धर्म के अनुयायी और भगवान शिव के भक्त होते हैं।

भगवान शिव  उनका न प्रारम्भ है और ना ही अंत।

जानिए शिव पुराण की कथा क्या है
एक बार भगवान विष्णु व भगवान ब्रह्मा में मतभेद हो गयी। दोनों ही स्वयं को शीर्ष मान रहे थे। इसी मतभेद में ब्रह्मा व विष्णु के मध्य एक अग्नि का स्तम्भ प्रकट हुआ। ब्रह्मा ने बतख का रूप लिया और इस स्तम्भ का प्रारंभ ढूंढने ऊपर उड़ना चालू किया। विष्णु ने सुअर का रूप लिया और स्तंभ का अंत ढूंढने नीचे जाना चालू किया। जब दोनों में से कोई भी इस अग्नि स्तभ के अंत को पाने में सफल ना रहा. भगवान विष्णु ने तो अपनी हार स्वीकार कर ली परन्तु ब्रह्माजी ने असत्य कहा की उन्हें अंत मिल गया है इसलिए में श्रेष्ठ हूँ ब्रह्माजी के मुख से असत्य सुनकर उस अग्नि स्तंभ में से शिवजी प्रगट हुए और उन्हों ने ब्रह्माजी के पांच मुख में से जो मुख असत्य बोला था उसे काट दिया ओर यह श्राप दिया की संसार में उनकी पूजा नहीं होगी. भगवान विष्णु से प्रसन्न होकर उन्हें अपने समान पूजे जाने का वरदान दिया . यह कथा शिव पुराण की है जिसके अनुसार शिवजी सबसे बड़े है

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एक बार सप्तऋषियों में यह चर्चा हो रही था कि ब्रह्मा,विष्णु और महेश में से बड़ा कौन है. इसलिए उन्होंने त्रिदेवो की परीक्षा लेने का सोचा और यह कार्य भृगु ऋषि को सौपां गया. अपने इस उदेश्य से भृगु ऋषि परम पिता ब्रह्मा के पास गए और उन्होंने उनका अपमान किया. इस अपमान से ब्रह्माजी क्रोधित हो गए बाद में भृगु ऋषि शिवजी के पास गए उन्होंने शिवजी का भी अपमान किया. फिर वह भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ गए जहां भगवान विष्णु अपनी शेष शैया पर विश्राम कर रहे थे.महर्षि भृगु ने जाकर सीधे भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मारी. इनके इस कृत्य से भगवान विष्णु को तनिक भी क्रोध नही आया और उन्होंने भृगु के पैर पकड़ लिए और कहा महर्षि आप के पैर में कई कोई चौट तो नहीं लगी. मेरा वक्षस्थल बहुत कठोर है और आप के पैर बहुत ही कोमल है. भगवान विष्णु की यह विनम्रता को देखकर महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु से क्षमा माँगी और फिर सप्त ऋषियोँ ने यह स्वीकार कर लिया की ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से भगवान विष्णु ही श्रेष्ठ है.
     गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि रुद्रोमें में शंकर हु. इसका मतलब यह भी होता है की जो रूद्र है वह कृष्ण है और जो कृष्ण है वहीँ रूद्र है.गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि जो भक्त मुझे जिस तरह भजता है में उसे वैसे ही रूप में प्राप्त होता हूँ. इसका मतलब यह होता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश वास्तव में एक ही परम तत्व है. जब यह तीनो एक ही परम तत्व है तो यह तुलना करना संभव ही नहीं है कि कौन बड़ा है. तुलना तो वहां की जाती है जहाँ दूसरा कोई मौजूद हो.
 तीनो में से कौन बड़ा और कौन श्रेष्ठ है यह तुलना हमारे जैसे मनुष्य नहीं कर सकते है

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