माँ संतोषी की पूरी आरती:और आरती का अर्थ /Complete Aarti of Maa Santoshi: and meaning of Aarti

माँ संतोषी की पूरी आरती:और आरती का अर्थ


माँ संतोषी की पूरी आरती:
जय माँ संतोषी, माँ जय माँ संतोषी।
अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी॥
जय शुक्रवारी माता, जय जय शुक्रवारी माता।
दिन रात तुमको ध्यावे, नित तुमको ध्यावे माता॥
अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी॥
जय लक्ष्मी के माता, जय जय लक्ष्मी के माता।
दिन रात तुमको ध्यावे, नित तुमको ध्यावे माता॥
अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी॥
त्रैतीया रात्रि की आरती:
जय सती सन्तोषी माँ, जय जय सती सन्तोषी माँ।
जग के नित उद्धारण के अवतारण तुम ही हो माँ॥
माँ संतोषी तुम दुःख हरनी, त्रैतीया तिथि को आनी।
दुखों के नाशनी, तुम ही विश्व में भानी॥
चंद्रमा को मुख दिखाए, सिंहासन गढ़ कराए।
जय सती सन्तोषी माँ, जय जय सती सन्तोषी माँ॥
दोहा:




संतोषी तुम सर्वजगत के पालनहारी।
दुःख हरण दात्री तुम भगवती सुखकारी॥
आरती की श्री जय माँ संतोषी माता।
माता जय सती सन्तोषी माँ॥
जय माँ संतोषी, माँ जय माँ संतोषी।
अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी॥
जय शुक्रवारी माता, जय जय शुक्रवारी माता।
दिन रात तुमको ध्यावे, नित तुमको ध्यावे माता॥
अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी॥
जय लक्ष्मी के माता, जय जय लक्ष्मी के माता।
दिन रात तुमको ध्यावे, नित तुमको ध्यावे माता॥
अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी॥
जय सती सन्तोषी माँ, जय जय सती सन्तोषी माँ।
जग के नित उद्धारण के अवतारण तुम ही हो माँ॥
माँ संतोषी तुम दुःख हरनी, त्रैतीया तिथि को आनी।
दुखों के नाशनी, तुम ही विश्व में भानी॥
चंद्रमा को मुख दिखाए, सिंहासन गढ़ कराए।
जय सती सन्तोषी माँ, जय जय सती सन्तोषी माँ॥
संतोषी तुम सर्वजगत के पालनहारी।
दुःख हरण दात्री तुम भगवती सुखकारी॥
आरती की श्री जय माँ संतोषी माता।

**माँ संतोषी की पूरी आरती का अर्थ:**

1. **जय माँ संतोषी, माँ जय माँ संतोषी।** आरती की शुरुआत होती है माता संतोषी की प्रशंसा के साथ, और उन्हें जयकार के साथ स्वागत किया जाता है।
2. **अनुपम सुखदात्री, माँ जय माँ संतोषी।** इस पंक्ति में, माता संतोषी के अनुपम सुखदाई गुणों की महिमा का वर्णन किया जाता है, जिनसे वे भक्तों को अत्यधिक सुख प्रदान करती हैं।
3. **जय शुक्रवारी माता, जय जय शुक्रवारी माता।** इस पंक्ति में, माता संतोषी को शुक्रवार के दिन की प्रशंसा की जाती है, जिसे वे पूजनीय मानी जाती हैं, और उन्हें दिन रात ध्यान देना चाहिए।
4. **दिन रात तुमको ध्यावे, नित तुमको ध्यावे माता।** इस पंक्ति में, भक्तों को यह समझाया जाता है कि माता संतोषी की पूजा और ध्यान दिन-रात किया जाना चाहिए, ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
5. **जय लक्ष्मी के माता, जय जय लक्ष्मी के माता।** इस पंक्ति में, माता संतोषी को लक्ष्मी माता की पुत्री के रूप में प्रशंसा की जाती है, जो समृद्धि और सौभाग्य की संचिता हैं।
6. **दिन रात तुमको ध्यावे, नित तुमको ध्यावे माता।** इस पंक्ति में भक्तों को यह सिखाया जाता है कि माता संतोषी की पूजा और ध्यान नित्य रूप से किया जाना चाहिए, ताकि उनकी कृपा बनी रहे।
7. **जय सती सन्तोषी माँ, जय जय सती सन्तोषी माँ।** इस पंक्ति में, माता संतोषी को सती सन्तोषी माँ के रूप में प्रशंसा की जाती है, जिन्हें भक्तों की इच्छाएँ पूरी करने वाली माना जाता है।
8. **जग के नित उद्धारण के अवतारण तुम ही हो माँ।** इस पंक्ति में, माता संतोषी की उपस्थिति का महत्व बताया जाता है, जिन्हें भगवती और सुखदात्री के रूप में पुकारा जाता है, जो भक्तों के उद्धारण के लिए आवतार धारण करती हैं।
9. **माँ संतोषी तुम दुःख हरनी, त्रैतीया तिथि को आनी।** इस पंक्ति में, माता संतोषी का वर्णन किया जाता है कि वे
 भक्तों के दुःखों को हरने वाली हैं और त्रैतीया तिथि को उनकी पूजा की जाती है।
10. **दुखों के नाशनी, तुम ही विश्व में भानी॥** इस पंक्ति में, माता संतोषी को दुखों के नाशक और विश्व में प्रकट होने वाली देवी के रूप में प्रशंसा की जाती है।
11. **चंद्रमा को मुख दिखाए, सिंहासन गढ़ कराए।** इस पंक्ति में, माता संतोषी की महिमा बताई जाती है कि वे चंद्रमा के मुख की प्रकटि करती हैं और उन्हें सिंहासन पर विराजमान करती हैं, जो उनके महत्व का प्रतीक है।
12. **संतोषी तुम सर्वजगत के पालनहारी।** इस पंक्ति में, माता संतोषी का समस्त जगत के पालनकर्ता के रूप में प्रशंसा की जाती है, जिन्हें भक्तों के दुःख हरने वाली माना जाता है।
13. **दुःख हरण दात्री तुम भगवती सुखकारी॥** इस पंक्ति में, माता संतोषी को दुःखों के नाशक और सुख प्रदान करने वाली माता के रूप में प्रशंसा की जाती है।
14. **आरती की श्री जय माँ संतोषी माता:** आरती की समापन में, आरती की प्रशंसा की जाती है और माता संतोषी की कृपा और आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है।
**दोहा:**
संतोषी तुम सर्वजगत के पालनहारी।
दुःख हरण दात्री तुम भगवती सुखकारी॥

**दोहे का अर्थ:**

इस दोहे में, माता संतोषी की महिमा व्यक्त की गई है:
1. **संतोषी तुम सर्वजगत के पालनहारी:** यहाँ पर संतोषी माता का वर्णन किया गया है कि वे सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता हैं, जिनकी कृपा से ही यह संसार चलता है। उन्होंने अपने भक्तों का पालन करने का कर्तव्य स्वीकार किया है।
2. **दुःख हरण दात्री तुम भगवती सुखकारी:** यहाँ पर संतोषी माता की महिमा और गुणों का वर्णन हो रहा है। वे दुःखों को हरने वाली हैं और भक्तों को सुख प्रदान करने वाली हैं, जिनकी कृपा से उनके भक्त दुःख से मुक्त होते हैं और सुखमय जीवन जीते हैं।
**आरती की श्री जय माँ संतोषी माता:**
यह पंक्ति आरती की समापन में आती है और इसमें माता संतोषी की प्रशंसा और आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि माता संतोषी हमेशा अपने भक्तों की कृपा करती है और उन्हें सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करती है।

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