बालकाण्ड रामचरितमानस श्लोक अर्थ सहित (५९ -६२)

 बालकाण्ड  रामचरितमानस श्लोक अर्थ सहित Balkand Ramcharitmanas verse with meaning

श्लोक 
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ।।
 निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं ॥५८
भावार्थ-
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास जी के 'रामचरितमानस' से हैं और इसमें निर्बलता और अपनी असमर्थता को स्वीकार करने की बात की गई है।
"जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।। निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं॥"
इस दोहे में कहा गया है कि हे प्रभु, मैं आपका सेवक हूँ और आपकी कृपा की आशा में हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरी अपेक्षाएं और मेरी बुद्धि, शक्ति और विश्वास मुझमें नहीं हैं। इसलिए, मैं आपको सभी कुछ समर्पित करता हूँ और अपनी निर्बलता को स्वीकार करता हूँ। मैं आपकी शरण में हूँ और आपकी कृपा की प्रार्थना करता हूँ।
यह दोहा हमें यह सिखाता है कि कभी-कभी हमारी शक्तियों और सामर्थ्य के विषय में हमारी खुद की भ्रमित उम्मीदों को छोड़ना चाहिए, और हमें हमारी असमर्थता को स्वीकार करना चाहिए। इस तरह हम अपनी सच्ची स्थिति को समझते हैं और ईश्वर की शरण में आत्मनिर्भरता की भावना रखते हैं।
श्लोक 
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा ।। 
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ ।।५९
भावार्थ-
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास जी के 'रामचरितमानस' से हैं और इसमें अपनी बुद्धि की मान्यता करने और गुरु के मार्गदर्शन की महत्ता का संदेश है।
"करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।। सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।।५९"
इस दोहे में कहा गया है कि मैं भगवान राम के गुणों का गान करना चाहता हूं, लेकिन मेरी बुद्धि छोटी है और मेरा ज्ञान अल्प है, इसलिए मैं उनके चरित्र को समझने में असमर्थ हूँ। मैंने एक भी गुण को समझा नहीं है और मेरी मनोरथ भी विकृत है।
इस दोहे से हमें यह सिखाई जाती है कि अकेले हम अपनी बुद्धि और अनुभव से सब कुछ समझने की कोशिश नहीं कर सकते हैं। हमें गुरु की शरण में जाना चाहिए ताकि हमें सही दिशा और सही ज्ञान प्राप्त हो सके।
श्लोक 
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअजग जुरइन छाछी । 
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥ ६०
भावार्थ-
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास जी के 'रामचरितमानस' से हैं और इसमें सज्जनों के संग में रहकर उनकी सलाह को सुनने की महत्ता का बयान है। 
"मति अति नीच ऊंचि रुचि आछी। चहिअ अमिअजग जुरइन छाछी। छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥ ६०"
इस दोहे में कहा गया है कि मेरी बुद्धि कितनी भी नीची या उच्ची क्यों ना हो, मेरी रुचि सही होनी चाहिए। अच्छी रुचि वाले लोगों के संग में रहना चाहिए, चाहे वे ऊँची या नीची स्थिति में क्यों ना हों। मैं अच्छे सज्जनों को देखना चाहता हूँ और उनकी सलाह को मन में रखना चाहता हूँ।
यह दोहा हमें सिखाता है कि हमें सदैव अच्छे और समझदार लोगों के संग में रहना चाहिए और उनकी सलाह को मानना चाहिए। उनके बातों को सुनकर हमें सही दिशा में चलने में मदद मिल सकती है।
श्लोक 
जों बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ।। 
हँसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी ॥ ६१
भावार्थ-
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास जी के 'रामचरितमानस' से है और इसमें बालक के वचनों की महत्ता और उनके परिवार के लिए खुशियों की उम्मीद का जिक्र किया गया है।
"बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।। हँसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥"
इस दोहे में कहा गया है कि एक बालक की बातों को सुनने से माता-पिता का मन मुदित हो जाता है। वे उनके वचनों को सुनकर खुश होते हैं। वहीं, वह कुटिल और कपटी व्यक्ति हंसता है, जो दूसरों की बुराई करता है और उसे सज्जनता की भूषा मानता है।
इस दोहे से समझाया जाता है कि एक बालक या युवक की सरलता और सत्यता में बात करने का महत्त्व होता है, और उनकी सलाह और विचारों को समझने का योगदान माता-पिता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।
श्लोक 
निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका ॥ 
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥ ६२
भावार्थ-
''निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।। जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥"
इस दोहे में बताया गया है कि अपनी कविता या अपने विचारों को समझा जाना, उनकी महत्ता या उनकी गुणवत्ता को समझने का प्रयास किया जाना, यह बहुत जरूरी है। वे बातें जो अन्य लोगों को खुशी और हर्षाये, उन्हें सुनकर यदि किसी को संतोष मिलता है, तो वह व्यक्ति बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है।
इस दोहे का संदेश है कि अपने विचारों और बोले गए शब्दों का महत्त्व समझना जरूरी है। वे लोग जो अन्य लोगों को आनंदित करते हैं, उन्हें बहुत ज्यादा महत्त्व दिया जाता है।


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