भक्ति और निष्काम कर्म राम की महिमा

भक्ति और निष्काम कर्म राम की महिमा। Devotion and selfless deeds are the glory of Ram.

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥  
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥ 280

यह दोहा तुलसीदासजी के द्वारा रचित है और इसका अर्थ इस प्रकार है:-
"आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥"
जो मेरी दीनता को आराधना करते हैं, उनकी विनती और आरति मुझे प्रिय होती है। मेरी शक्ति छोटी होने के बावजूद, वह मेरी मनोहारी और मनभावना का पाठ नहीं बिगाड़ती।
"अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥"
मेरे इस अद्भुत सलिल (जल) को सुनकर जिसमें गुणों की कविता होती है, वह आस और प्यास को मिटाने वाली है, और यह मन को शुद्ध कर देती है।
यह दोहे में व्यक्त किया गया है कि भगवान के सामने दीनता और भक्ति की भावना से आरति और बिनय करना सर्वोत्तम होता है, और उनकी महिमा का गान करने से मानव का मन शुद्ध हो जाता है।

राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानौ॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥281

यह भी तुलसीदासजी का दोहा है और इसका अर्थ निम्नलिखित है:-
"राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानौ॥"
जो राम के प्रेम में लीन हैं, उनके लिए वह पानी की भाँति है, जो सभी कलियुग के दोषों को नष्ट कर देता है।
"भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥"
राम का प्रेम भवसागर के कष्ट को सोषता है, संसार के दुःखों को तथा दारिद्र्य और दोषों को नष्ट करता है।
यह दोहा बताता है कि भगवान राम के प्रेम में लीन होने से संसार के सभी दुःख और दोष नष्ट हो जाते हैं और वह प्रेम जीवन को पवित्र और समृद्ध बनाता है।

काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥282

यह भी तुलसीदासजी का दोहा है और इसका अर्थ निम्नलिखित है:-
"काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥"
काम (कामना), क्रोध, मद (अहंकार), और मोह (मोहभंग) को नष्ट करके, पवित्र बुद्धि (बिमल बिबेक) और वैराग्य (बिराग) को बढ़ावा देना।
"सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥"
समर्पित भाव से भगवान का नाम जपने से पापों का नाश होता है और पापों का परिताप होता है।
इस दोहे में बताया गया है कि अपने मन को कामनाओं, क्रोध, अहंकार और मोह से मुक्त करके और भगवान को समर्पित करके, हम पापों को नष्ट कर सकते हैं और पापों का पछतावा होता है।

जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी॥283

यह भी तुलसीदासजी का दोहा है और इसका अर्थ निम्नलिखित है:-
"जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥"
जो इस बार नहीं मानते, उन्हें कलियुग में कायरता ही बिगाड़ देती है।
"तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी॥"
जैसे सूर्य को देखकर तृषा लगती है और मृग को जैसे जीवन धारण करने वाले को दुःख होता है, वैसे ही इस संसार को देखकर भी तृष्णा लगती है और मनुष्य को दुःख होता है।
इस दोहे में बताया गया है कि जो व्यक्ति इस बार में नहीं मानता, उसे कलियुग में कायरता ही बिगाड़ देती है, और संसार को देखकर हमारी तृष्णा बढ़ती है और हमें दुःख होता है।

दो0-मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥ 284

यह दोहा संत तुलसीदास जी के रचित "विनय पत्रिका" का भाग है और इसका अर्थ निम्नलिखित है:-
अर्थ: "दोहा: मेरी बुद्धि अनुहार कर अपनी निंदा करती है और मन निरंतर अन्हवा विचारों में लीन है। मैं भवानी का स्मरण करता हूँ, परन्तु कवि कहता है कि संकर हो जाता है, क्योंकि मैं उनकी कथा सुनाता हूँ।"
यहां कवि तुलसीदास जी विशेष रूप से अपनी अन्तरात्मा की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं। उनकी बुद्धि निंदा की ओर आकर्षित होती है और मन निरंतर नकारात्मक विचारों में विचलित रहता है। वे भवानी का स्मरण करते हैं, लेकिन फिर भी कहते हैं कि वे संकर बन जाते हैं, क्योंकि वे कविता में अपनी अन्तरात्मा की स्थिति की व्याख्या कर रहे हैं जहाँ उन्हें नकारात्मकता का सामना करना पड़ता है।

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