मिथ्या भ्रांतियों का समाधान

मिथ्या भ्रांतियों का समाधान solution to misconceptions

जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥302

तुलसीदास जी इस दोहे में लोगों को जीवन की सत्यता को समझाते हैं। "जैसे मिटता है मोर का भ्रम, वैसे ही भारी होता है संसार में किया हुआ आभास।" इस दोहे में उन्होंने कहा है कि हमारा जो संसारिक जीवन है, वह सब एक कल्पित और अस्थायी है। इसमें हम अपने मन की मिथ्या भ्रांतियों में उलझे हुए हैं।
जागबलिक यहाँ एक प्रकार का चिड़िया है जो मुस्काने वाली होती है। वह इस तत्व को समझती है और कहती है कि आप ही में राम, जिसे हम सच्चे स्वरूप में पहचान सकते हैं।
इस दोहे में तुलसीदास जी हमें यह सिखाते हैं कि हमें माया में फंसने की बजाय अपनी आत्मा को समझना चाहिए, जो हमारे असली रूप को जानने में हमारी सहायता कर सकती है।

राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥303

यह दोहा भगवान राम की प्रशंसा में है और इसमें तुलसीदास जी की भक्ति व्यक्त की गई है। वे कह रहे हैं कि भगवान राम की प्रशंसा मन के क्रम से होती है और उनकी कविता में उनकी चतुराई (कला) है, जो केवल वे ही समझ सकते हैं।
यहां तुलसीदास जी कह रहे हैं कि वे भगवान राम के गुणों की महानता को सुनना चाहते हैं, लेकिन जब उन्होंने अपने मन में इसका प्रश्न किया, तो उन्हें अपनी अज्ञानता का अनुभव हुआ। वे समझ गए कि भगवान के गुणों को समझना मानसिक चतुराई की बजाय दिव्य चतुराई की आवश्यकता है। इससे यह संदेश मिलता है कि भगवान की महिमा को समझने के लिए हमें हमारी मानसिकता को पारंपरिक चतुराई से बचाना चाहिए।
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई॥
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥304

यह दोहे तुलसीदास जी के रामायण महाकाव्य की महिमा को बयान करते हैं।
पहले दोहे में, तुलसीदास जी कह रहे हैं कि वे एक प्रकार से भगवान राम की कथा को सुनाने के लिए तैयार हैं और उनका मन समर्पित है। वे यह सादरता से कह रहे हैं कि हे भगवान, मैं आपकी कथा को सुनाने के लिए तैयार हूँ।
दूसरे दोहे में, तुलसीदास जी रामायण को एक कालिका या कालरात्रि के समान वर्णित कर रहे हैं। महिषासुर जैसे महान राक्षस को मारने वाली माँ दुर्गा की तरह, रामायण भी मायावी मोह को नष्ट करती है और अन्धकार को दूर करती है। यहां भगवान राम की कथा को उसी प्रकार का शक्तिशाली उपासना या रक्षा साधना के रूप में वर्णित किया गया है।

रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥305

यह दोहे भगवान राम की कथा की महत्ता को दर्शाते हैं।
"रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥" - इस दोहे में तुलसीदास जी कह रहे हैं कि भगवान राम की कथा का महत्त्व सूर्य की किरणों के समान है। जैसे चकोर पक्षी सूर्य की किरणों को पीने के लिए तत्पर रहता है, उसी तरह संत और भक्त भगवान राम की कथा में निरंतर रसानुभव करते हैं।
"ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥" - इस दोहे में तुलसीदास जी यह बता रहे हैं कि भगवान शिव ने भी भगवान राम की महिमा को बताया था। इससे वे यह बोल रहे हैं कि रामकथा का महत्त्व सभी देवी-देवताओं द्वारा मान्य है और यह सर्वोच्च दिव्यता को प्रकट करती है।

कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद306

यह दोहा भगवान शिव और माता पार्वती के बीच हुए एक संवाद को व्यक्त करता है।
"कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥"
यहां दोहा माता पार्वती की उमा से शिव जी से कह रहे हैं कि अब उन्हें विवेकपूर्ण बुद्धि दिखानी चाहिए। वे कह रहे हैं कि समय बड़ा ही भयंकर है, जिसके कारण मुनियों का विषाद मिट सकता है। इसका अर्थ है कि उन्हें विचार करना चाहिए कि कैसे समय के साथ संगठित रूप से काम किया जा सकता है और मुनियों की चिंता दूर की जा सकती है।

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