रामायण में सीता हरण का इतिहास

रामायण में सीता हरण का इतिहास History of Sita Haran in Ramayana

सीता हरण का इतिहास भारतीय साहित्य और पौराणिक ग्रंथों में महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। यह रामायण महाकाव्य की एक प्रमुख कथा है जो भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध है।
रामायण के मुताबिक, लंका के राजा रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता का हरण किया था. रावण ने मायावी रूप धारण करके राम के अभाव में सीता को धरती से उठा लिया था. रावण ने अपनी मां मारीच को सोने का हिरण का रूप धारण करने के लिए कहा था. सीता ने हिरण को देखकर राम से उसे पकड़ने के लिए कहा था. राम हिरण का पीछा करने लगे और रावण ने इस अवसर का लाभ उठाकर सीता का हरण कर लिया !
रामायण में बताया गया है कि राम और उनके भाई लक्ष्मण ने हनुमान और अन्य वानर सेना की मदद से सीता को खोजने और उसे बचाने का प्रयास किया. राम ने रावण को मारकर सीता को बचाया और उसे अपने साथ ले लिया. युद्ध समाप्त हो जाने के बाद, भगवान राम ने माता सीता को अग्नि परीक्षा के लिए कहा और माया की सीता अग्नि कुंड में समा गईं. 

रामायण में सीता हरण की कथा

रामायण में सीता हरण कथा

जब श्रीराम लक्ष्मण और सीता सहित चित्रकूट में अपनी कुटिया बनाकर रह रहे थे, तभी एक दिन वहाँ से रावण की बहन सूर्पणखा आकाश की ओर से जा रही थी। उसकी नजर श्रीराम व लक्ष्मण पर पड़ी। वह उन्हें देखकर उन पर मोहित हो गई और सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर उनके समक्ष जाकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखने लगी। तब श्रीराम ने मना करते हुये कहा कि- "मैं तो विवाहित हूँ और आजीवन दूसरा विवाह न कर सकने के लिये प्रतिज्ञाबद्ध हूँ। तुम लक्ष्मण से बात करो।" फिर वह लक्ष्मण के समीप जाकर विवाह प्रस्ताव रखने लगी तो उन्होंने भी इन्कार कर दिया। इस पर वह गुस्से में सीता पर प्रहार करने लगी। तभी लक्ष्मण ने माता सीता को उससे बचाते हुये उसकी नाक काट दी थी।

सूर्पणखा व रावण की योजना

सूर्पणखा रोते हुये रावण के पास गयी और वहाँ जाकर सब बात बतायी। तब रावण ने गुस्से में 'सीता हरण' की योजना बनाते हुये मारीच राक्षस को वहाँ सुन्दर हिरण के रूप में भेजा। हिरण को देखकर सीता ने राम को उस हिरण को लाने को कहा। सीता को अकेले ना छोड़ने का आदेश लक्ष्मण को देकर राम हिरण पकड़ने चले गए। जैसे ही राम का बाण हिरण बने मारीच को लगा, उसने ने राम की आवाज़ में लक्ष्मण और सीता को पुकारा। राम की आवाज़ सुनकर सीता ने लक्ष्मण को राम की मदद के लिए जाने का आदेश दिया। सीता की आज्ञा सुन, लक्ष्मण ने सीता को 'लक्ष्मण रेखा' में सुरक्षित किया और राम की मदद को चल दिए।

रावण द्वारा सीताहरण

तभी साधु का रूप धरकर रावण भोजन लेने सीता की कुटिया के पास आ पहुँचा और सीता से लक्ष्मण रेखा से बाहर आकर भोजन देने को कहा। जैसे ही सीता भोजन देने लक्ष्मण रेखा से बाहर आईं, रावण ने सीता का अपहरण कर लिया। राम ने लक्ष्मण को देखकर उनसे सीता को अकेले छोड़ आने का कारण पूछा। खतरे को भांपकर दोनों ने कुटिया की ओर दौड़ लगाई। सीता का अपहरण कर ले जा रहे रावण से जटायु ने सीता को बचाने के लिए युद्ध किया। कुटिया में सीता को ना पाकर राम, लक्ष्मण सीता को खोजने हेतु निकल पड़े। पुष्पक विमान से रावण द्वारा अपहरण कर ले जा रही सीता ने वानरों को देखकर अपने गहनों को धरती पर फेंकना शुरू कर दिया और अपना संदेश राम तक पहुँचाने का अनुरोध किया।

रामायण में सीता हरण की घटना

रामायण महाकाव्य में सीता हरण का एक महत्वपूर्ण पात्र है। यह घटना रावण द्वारा माता सीता को हरण करके उसे लंका नगर में ले जाने का कथन करती है। यहां कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं:
  1. रावण का योजना:-रावण ने मायावी रूप धारण करते हुए जब लंका नगर के आश्रम में महर्षि विश्वामित्र और श्रीराम-लक्ष्मण के द्वारा आये उनकी पत्नी सीता को देखा। उसने तुरंत उसके सौंदर्य को देखकर उसे हरण करने का फैसला किया।
  2. जटायु की प्रतिबद्धता:-सीता हरण के समय, जटायु, एक वृद्ध गरुड़ (वुल्टर) राक्षसों के बीच युद्ध करते हुए आया। वह रावण की सीता को बांधे हुए रथ के साथ जा रहे थे, लेकिन जटायु ने सीता की रक्षा के लिए लड़ते हुए उनसे युद्ध किया।
  3. हनुमान की खोज:-श्रीराम और लक्ष्मण ने सीता की खोज में हनुमान को भेजा। हनुमान ने लंका नगर में गया और वहां सीता को ढूंढते हुए अनेक परिक्षणों से गुजरा।
  4. सीता की त्रासदी:-सीता ने लंका में रावण की काबिलियत और असली चरित्र को देखा। उसने अपने पति और अयोध्या की स्मृति को संजीवनी बूटी के सहारे जीवंत रखा।
  5. राम का वीरत्व:-राम ने उस समय अपने वीरत्व का परिचय दिया और उन्होंने सीता को उसके प्रति अपनी पूरी समर्था और प्रेम दिखाया।
रामायण में सीता हरण की इस घटना ने महाकाव्य को एक नया मोड़ दिया और इसे महत्वपूर्ण पात्रों के चरित्र विकास के लिए एक महत्वपूर्ण पल बनाया।

रामायण में सीता माता के रक्षा के जटायु की महानता

रामायण में, सीता माता की रक्षा के लिए जटायु की महानता इस बात से पता चलती है कि उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक सीता की रक्षा करने की कोशिश की. जटायु, भगवान राम के महान भक्त थे और सीता को रावण से बचाने के प्रयास में उन्होंने अपनी जान गंवा दी. जटायु ने रावण से युद्ध करते समय हार नहीं मानी और रावण के सारथी को मार डाला, उसके रथ को नष्ट कर दिया, और रावण द्वारा चलाए गए सभी तीरों को टैंक कर दिया. जटायु के पंजों का उपयोग करके रावण के धनुष को भी तोड़ा गया. जटायु में अद्भुत शारीरिक क्षमताएं और स्थायित्व था जो दिव्य हथियारों से बचने के लिए पर्याप्त था
जब लंका का रावण सीता का हरण करके आकाशमार्ग से पुष्पक विमान में जा रहा था, तब जटायु ने रावण से युद्ध किया. किंवदंतियों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि सीता का अपहरण करते समय रावण द्वारा जटायु के पंख काट दिए जाने के बाद वे केरल के चदयामंगलम में चट्टानों पर गिर गए थे. सीताहरण की घटना श्रीराम और लक्ष्मण को सुनाने के बाद घायल जटायु ने प्राण त्याग दिये. इसके बाद श्री राम ने जटायु का अंतिम संस्कार किया. 
जटायु का चरित्र हमें सिखाता है कि हमें सदैव सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए, दूसरों की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए, और कठिन परिस्थितियों में भी साहस और वीरता का प्रदर्शन करना चाहिए. जटायु का चरित्र हमें त्याग की भी शिक्षा देता है !

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