रामचरितमानस प्रथम सोपान (बालकाण्ड) : मंगलाचरण

रामचरितमानस प्रथम सोपान (बालकाण्ड) : मंगलाचरण Ramcharitmanas first step (Balkand): Invocation

श्लोक

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।
मङ्गलानां च कत्र्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ

भावार्थ

वर्णानाम् - वर्णों का अर्थ, ध्वनि, वर्णमाला  
अर्थ - अर्थ, अर्थान्तर  
संघानाम् - संघ, संगठन, समूह  
रसानाम् - रस, भावना, आनंद  
छन्दसाम् - छंद, छंदशास्त्र, मीटर, छंदों का विचार  
मङ्गलानाम् - मङ्गल, शुभ, भले कारण  
च - और  
कत्र्तारौ - कत्र्ता, कवि, गायक  
वन्दे - नमन करता हूं  
वाणीविनायकौ - वाणी और विनायक (गणेश), शब्दों के प्रभु। 
यह श्लोक वाणी और विनायक (गणेश) को नमस्कार करने का अर्थ रखता है जो काव्य, शब्द, और वाणी के ध्वनि तथा अर्थ का संचार करने वाले हैं। यहाँ श्रेष्ठ रचनाओं, व्याकरण, रस, छंद, और वाणी के महत्त्व का संक्षिप्त समर्थन किया गया है।

श्लोक

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । 
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम् ॥ २ ॥

भावार्थ

भवानीशङ्करौ - भवानी (पार्वती) और शंकर (शिव)  वन्दे - नमन करता हूं  
श्रद्धाविश्वासरूपिणौ - श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप में  
याभ्यां - जिनमें  
विना - बिना  
न - नहीं  
पश्यन्ति - देखते हैं  
सिद्धाः - सिद्ध पुरुष  
स्वान्तः स्थम् - अपने आत्मस्थल में  
ईश्वरम् - ईश्वर (भगवान शिव)।  
यह श्लोक मानवीय जीवन में श्रद्धा और विश्वास की महत्ता को विशेष रूप से प्रस्तुत करता है। इसमें कहा गया है कि सिद्ध पुरुष वह दिव्यता को देख सकते हैं जो श्रद्धा और विश्वास में होती है, जो भगवान शिव के अभाव में आत्मा की स्थिति को नहीं देख सकते।

श्लोक

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् ।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ ३ ॥

भावार्थ

वन्दे - नमन करता हूं  
बोधमयं - ज्ञान से भरपूर  
नित्यं - सदा  
गुरुं - गुरु  
शङ्कररूपिणम् - शिव के रूप में  
यमाश्रितः - जिसके आश्रित हैं  
हि - क्योंकि  
वक्रः अपि - वक्र भी (कोरा भी)  
चन्द्रः - चंद्रमा  
सर्वत्र - हर जगह  
वन्द्यते - पूज्य है।  
यह श्लोक बताता है कि जैसे चंद्रमा जिस भी रूप में हो, वह सभी जगहों में पूज्य है, ठीक उसी तरह गुरु भी ज्ञान से भरपूर होते हैं और वे भगवान शिव के रूप में सदा अनुग्रह करते हैं।

श्लोक

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ
विशुद्धविज्ञानौ वन्दे कवीश्वरकपीश्वरौ ।॥ ४ ॥

भावार्थ

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ - सीता और राम, जिनके गुण ग्राम (समृद्धि का केंद्र) हैं और जो पुण्यारण्य (पुण्यमय जंगल) में विहरते हैं।  
विशुद्धविज्ञानौ - शुद्ध और विज्ञानी  
वन्दे - नमन करता हूं  
कवीश्वरकपीश्वरौ - कविओं के ईश्वर और कपिओं के ईश्वर, अर्थात वाल्मीकि और हनुमान।  
यह श्लोक सीता और राम की महिमा को बयां करता है जो पुण्य अरण्य में विहरते हैं, और उन्हें नमस्कार करते हुए वाल्मीकि और हनुमान को ज्ञानी कवि और प्रभावशाली कपि के रूप में स्तुति करता है।

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