अरण्यकाण्ड के छन्द

अरण्यकाण्ड के छन्द verses of aranyakand

छन्द :  
निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।
 श्रीसहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥
 निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥
यह छंद भक्ति और भगवान के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करता है। इसका अर्थ निम्नलिखित है:
"अपने परम प्रियतम को देखकर अपने दृष्टि को फलप्रद बनाकर मैं सुख प्राप्त करता हूं। उस श्रीराम के साथ उसके सहित भगवान के पाद को मन से चाहता हूं। क्रोध को ध्यान से निकालकर और भक्ति में स्थिर रहकर, मैं निर्बाण की प्राप्ति करना चाहता हूं। अपने प्रियतम के पास जाकर वही भगवान मुझे सुख समुंदर में मुक्ति देते हैं।"
छन्द :  
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
 नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥1॥
यह छंद भगवान राम की महिमा और उनके गुणों को बयान करता है। इसका अर्थ निम्नलिखित है:
"हे अनूप, निर्गुण और सगुण रूपी राम के, जिनके गुणों ने हमें प्रेरित किया है। उनके बाहु (हाथ) बहुत शक्तिशाली हैं और वे चंड (राक्षसों) को भूमि पर मारते हैं। उनके सुन्दर मुखारविंद (चेहरा) को देखकर सरोज (कमल) के समान लोचन (आंखें) आनंदित होती हैं। मैं हमेशा भगवान राम को प्रणाम करता हूं, जो कृपालु हैं और जिनके विशाल हाथ भव-भय को दूर करने में सक्षम हैं।"
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।
गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।
 नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥2॥
यह छंद भगवान राम के महिमा और उनके मंत्रजाप के महत्त्व को वर्णित करता है। इसका अर्थ निम्नलिखित है:
"वह बलशाली है, अनंत है, अनादि है, जन्मरहित है, अद्वितीय है, एकमात्र अनुभव से प्राप्त होता है। वह गोपाल को बंधन से मुक्त करने वाला है, द्वंद्वों को हरने वाला है, ज्ञान के अग्नि से भरा हुआ है और पृथ्वी का धारणकर्ता है। जो संत हैं, वे अनंत लोग जो राम मंत्र का जाप करते हैं, उनके मन का संतोष करते हैं। मैं हमेशा भगवान राम को प्रणाम करता हूं, जो अकाम (किसी भी इच्छा से रहित) हैं, प्रियतम हैं और कामादि खल दल को नष्ट करने वाले हैं।"
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥
 सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥3॥
यह छंद ब्रह्म की महिमा और ध्यान द्वारा उस प्राप्त ज्ञान को वर्णित करता है। इसका अर्थ निम्नलिखित है:
"जिस ब्रह्म को श्रुतियाँ निर्दोष, सर्वव्यापी और अनादि कहती हैं, उसकी महिमा को गाते हैं। ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग - इस प्रकार के अनेकों मुनियों ने उसको प्राप्त किया है। वह अपनी कृपा से प्रकट होते हैं और उनकी सुंदरता, जो जगत को मोहित करती है, विश्व में प्रकट होती है। मेरे हृदय के पंकज में, जिसे मेरे अंतरंग और अनंग (कामदेव) की बहुत सी छवियाँ पसंद करती हैं, वही वह ब्रह्म बसते हैं।"
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥4॥
इस छंद का अर्थ निम्नलिखित है:
"जो सर्वज्ञ, सर्वसुलभ, सर्वश्रेष्ठ और निर्मल हैं, जो सम्यक्, समता स्वभाव वाले, सर्वदा शीतल हैं। जो योगी लगातार ध्यान करके मन को नियंत्रित करते हुए भगवान के ध्यान में लगे रहते हैं। वह राम, जिनका निवास संतों और सेवकों के साथ है, वे त्रिभुवन के धनी हैं। वह भगवान राम मेरे हृदय में निवास करते हैं, जिनकी कीर्ति संसार को पवित्र करती है।"
छन्द :  
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥
 सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥
यह छंद श्री नारद जी के महिमा गान करता है और उनके द्वारा भगवान के गुणों की प्रशंसा करता है। इसका अर्थ निम्नलिखित है:
"नारद और सेष ने कहा, सुनते हैं और भगवान के पाद पंकज में लिपटे हैं, ऐसे ही दयालु और दीनबंधु भगवान, अपने भक्तों के गुणों का मुख से कहते हैं। नारद जी बारह बार नामस्मरण करते हुए ब्रह्मलोक में गए, जो धन्य हैं, तुलसीदास जिन्होंने हरि के भजन में रंग रचाया है।"

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