किष्किन्धा काण्ड चौपाई अर्थ सहित

किष्किन्धा काण्ड चौपाई अर्थ सहित Kishkindha Kand Chaupai with meaning

रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में 1 श्लोक, 30 दोहे, 1 सोरठा, 2 छंद और 30 चौपाइयां हैं. किष्किंधा कांड  के चौपाई 6-10 अर्थ सहित हैं:
चौपाई 
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ||१||
निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना ||
इसका अर्थ है

"जो मित्र दुख में दुखी होता है, उसे देखकर ही सभी पाप भारी हो जाते हैं। अपना दुख गिरि की तरह समझकर जानना चाहिए, क्योंकि मित्र का दुख मेरु पर्वत के समान होता है॥1॥"
इस चौपाई में तुलसीदास जी दुखी मित्र के साथ सहानुभूति की बात कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जब मित्र दुखी होता है, तो उसका दुख देखकर ही सभी पापों का भार बढ़ जाता है। साथ ही, यह सिखना चाहिए कि अपना दुख
तो समझकर ही, दूसरों के दुःख को भी समझना चाहिए, क्योंकि मित्र का दुःख मेरु पर्वत के समान होता है।
जिन्ह कें असि मति सहज न आई, ते सठ कत हठि करत मिताई ||२||
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा, गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा ||
इसका अर्थ है

"जिन्हें अपनी बुद्धि सहज नहीं मिलती, वे लोग सठ कत और हठ में रुचि रखते हैं। सही मार्ग को छोड़कर वे लोग कुपथ मार्ग का अनुसरण करते हैं, जिससे गुण प्रकट होते हैं और अवगुण दूर होते हैं, लेकिन वास्तविकता में गुण और अवगुण दोनों ही प्रकट होते हैं और दुर्बल होते हैं।"
इस दोहे में तुलसीदास जी कह रहे हैं कि जिन्हें सहज रूप से बुद्धि नहीं मिलती, वे लोग सठ कत और हठ में रुचि रखते हैं और सही मार्ग की बजाय अनुष्ठान के माध्यम से गुण प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। तुलसीदास जी यहां बता रहे हैं कि सच्चे मार्ग पर चलने के बजाय ऐसा करने से गुण प्रगट होते हैं, लेकिन असलीता में गुण और अवगुण दोनों ही प्रकट होते हैं और व्यक्ति दुर्बल होता है।
देत लेत मन संक न धरई, बल अनुमान सदा हित करई ||३||
बिपति काल कर सतगुन नेहा, श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ||
इसका अर्थ है

"देता हूँ और लेता हूँ, पर मन को कभी बंधन में नहीं डालता हूँ। बल का अनुमान कभी नहीं करता हूँ, सदा हित का कारण बनता हूँ॥3॥ दुख-सुख, काल-क्षण, सभी परिस्थितियों में सत्गुण का प्रेम करता हूँ, यह श्रुति और साधु मित्र कहते हैं।"
इस दोहे में तुलसीदास जी बता रहे हैं कि वह दान करने और लेने का भाव रखते हैं, परंतु उनका मन कभी बंधन में नहीं डालता है। उनका बल का अनुमान कभी नहीं होता है और वह सदा हित के लिए कारण बनते हैं। उनका मानना है कि दुख-सुख, काल-क्षण, सभी परिस्थितियों में सत्गुण का प्रेम करना चाहिए, और इसे श्रुति और साधु मित्र भी कहते हैं।
आगें कह मृदु बचन बनाई, पाछें अनहित मन कुटिलाई ||४||
जा कर चित अहि गति सम भाई, अस कुमित्र परिहरेहि भलाई ||
इसका अर्थ है:
"आगे बढ़कर मृदु वचन बोलो, पीछे अपभ्रंशक मन को कुटिल न करो॥4॥ जाकर चित में आहि गति समान है, ऐसे कुमित्र को छोड़ना ही भलाई है।"
इस दोहे में तुलसीदास जी बता रहे हैं कि आगे बढ़कर हमें मृदु वचन बोलना चाहिए, परंतु पीछे जा कर मन को कुटिल नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति हमें नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है, उसे त्यागकर भलाई की दिशा में बढ़ना चाहिए।
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी, कपटी मित्र सूल सम चारी ||५||
सखा सोच त्यागहु बल मोरें, सब बिधि घटब काज मैं तोरें ||
इसका अर्थ है

"सेवक सठ, नृप, कृपण, और कुन्तुनी राजकुमारी, कपटी मित्र, सूली समान चालवाला है॥5॥ मेरे बला, सखा, इस प्रकार के लोगों को छोड़कर सोच को त्याग, सभी प्रकार के कार्यों में मेरी आत्मा को समर्पित कर॥"
इस दोहे में तुलसीदास जी विभिन्न प्रकार के लोगों की चरित्र स्थिति को वर्णन कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि सच्चे सेवक, नृप, कृपण, और कुन्तुनी राजकुमारी, कपटी मित्र, और सूली समान चालवाले किसी के साथ समर्पित नहीं होते। उनका सुझाव है कि इन तरह के लोगों को छोड़कर सोच को त्यागें और सभी प्रकार के कार्यों में समर्पित रहें।
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा, बालि महाबल अति रनधीरा ||६||
दुंदुभी अस्थि ताल देखराए, बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए ||
इसका अर्थ है

"सुग्रीव ने कहा, 'हे रघुकुलनायक राम! वह बालि बहुत शक्तिशाली और योधापुरुष था, बड़ा रणधीर था॥6॥ दुंदुभी नामक राक्षस ने अपनी अस्थि और ताल को दिखाकर बिना किसी प्रयास के ही रघुनाथ को ढहा दिया।"
इस चौपाई में सुग्रीव रामचंद्र जी से कह रहे हैं कि बालि महाबल और रणधीर था, और उसने दुंदुभी नामक राक्षस को बिना किसी प्रयास के ही अपनी शक्ति के द्वारा ढहा दिया।
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती, बालि बधब इन्ह भइ परतीती ||७||
बार बार नावइ पद सीसा, प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा ||
इसका अर्थ है

"जब सुग्रीव ने बालि के अद्वितीय बल को देखा, तो उसमें अत्यन्त प्रीति हुई। बालि को बड़े से बड़ा दुःख हुआ, और उसने दुबारा इन्हें पहचाना॥7॥ बार-बार श्रीरामचंद्र जी के पादों को नामस्कार किया और मन में हर्ष हुआ, कपि सेना ने प्रभु की आज्ञा का आदर किया।"
इस चौपाई में सुग्रीव ने बताया है कि उन्होंने बालि के अद्वितीय बल को देखकर अत्यंत प्रेम महसूस किया। बालि ने उन्हें पहचान लिया और उसका दुःख बड़ा हुआ। सुग्रीव ने फिर बार-बार श्रीरामचंद्र जी के पादों को नामस्कार किया और कपि सेना ने प्रभु की आज्ञा का आदर किया।
उपजा ग्यान बचन तब बोला, नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ||८||
सुख संपति परिवार बड़ाई, सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ||
इसका अर्थ है

"जब सुग्रीव ने ज्ञान और बचन का फल प्राप्त किया, तब उसने कहा, 'हे नाथ! आपकी कृपा से मेरा मन शान्त हो गया है॥8॥ सुख, संपत्ति, और परिवार को बड़ाई दी है, और अब मैं सभी को त्यागकर सेवा करने के लिए तैयार हूँ।"
इस चौपाई में सुग्रीव ने बताया है कि जब उन्होंने ज्ञान और बचन का फल प्राप्त किया, तब उनका मन शान्त हो गया है और उन्होंने सुख, संपत्ति, और परिवार को बड़ाई दी है। अब उन्होंने सभी चीजों को त्यागकर भगवान की सेवा करने का निश्चय किया है।
ए सब रामभगति के बाधक, कहहिं संत तब पद अवराधक ||९||
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं, माया कृत परमारथ नाहीं ||
इसका अर्थ है

"इन सबको राम भक्ति के बाधक मानकर, संत कहते हैं कि तब प्राप्त होने वाले पद को अवरुद्ध कहा जाता है॥9॥ सत्रु, मित्र, सुख, दुख - इन सबको जगत में माया के द्वारा किया गया है, परमार्थ की प्राप्ति के लिए नहीं।"
इस चौपाई में संत कहते हैं कि इन सभी चीजों को राम भक्ति के बाधक मानकर उन्हें त्याग देना चाहिए। सत्रु, मित्र, सुख, दुख - ये सभी माया के द्वारा बनाए गए हैं और इन्हें पारमार्थिक लाभ की प्राप्ति के लिए नहीं बनाया गया है।
बालि परम हित जासु प्रसादा, मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा ||१०||
सपनें जेहि सन होइ लराई, जागें समुझत मन सकुचाई ||
इसका अर्थ है

"बालि के परम हित के लिए जिनके प्रसाद से मिलेगा, वह राम, तुम्हारे समान बिषादा पाएगा॥10॥ जैसे सपने में हुई सुधी होती है और व्यक्ति जागते हुए उसे सकुचाई समझता है, वैसे ही बालि की लड़ाई भी होगी।"
इस चौपाई में सुग्रीव कह रहे हैं कि जिनके प्रसाद से बालि का परम हित होगा, वह राम हैं, और उनके समान बिषादा पाएगा। उन्होंने बताया है कि बालि की लड़ाई सपने की तरह होगी, जिसे जागते हुए सुधार सका जा सकता है।
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती, सब तजि भजनु करौं दिन राती ||११||
सुनि बिराग संजुत कपि बानी, बोले बिहँसि रामु धनुपानी ||
इसका अर्थ है

"अब प्रभु, ऐसे ही कृपा करें, कि मैं सभी बाधाओं को छोड़कर दिन-रात आपका भजन करूँ॥11॥ सुनकर बिराग और संजुत कपि ने धनुपानी राम जी की कहानी को बहुत रमणीयता से बिहँसी भाषा में व्यक्त किया।"
इस चौपाई में सुग्रीव रामचंद्र जी से प्रार्थना कर रहे हैं कि वह अब उन पर कृपा करें और उन्हें बाधाओं से मुक्ति दें, ताकि वह दिन-रात उनका भजन कर सकें। सुग्रीव का धनुपानी कपि ने राम जी की कहानी को सुनकर बहुत रमणीयता से बिहँसी भाषा में व्यक्त किया।
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई, सखा बचन मम मृषा न होई ||१२||
नट मरकट इव सबहि नचावत, रामु खगेस बेद अस गावत ||
इसका अर्थ है
"जो कुछ मैं कहता हूँ, वह सब सत्य है, मेरे साथी! मेरे बोल का कभी भी असत्य नहीं होता॥12॥ जैसे नटकर नचाते हैं, वैसे ही खगेस (गरुड़) बेद गाते हैं और मरकट रूपी भगवान श्रीराम के साथ सभी जीवों की सेवा करता है।"
इस चौपाई में सुग्रीव कह रहे हैं कि जो कुछ भी मैं कहता हूँ, वह सत्य है, उनके बोल का कभी भी असत्य नहीं होता। यहाँ उन्होंने बालि के साथ सत्य के लिए संघर्ष की ओर संकेत किया है और भगवान श्रीराम की सेवा को उपमहाद्रुम रूपी मरकट के समान समझा है।
लै सुग्रीव संग रघुनाथा, चले चाप सायक गहि हाथा ||१३||
तब रघुपति सुग्रीव पठावा, गर्जेसि जाइ निकट बल पावा ||
इसका अर्थ है

"सुग्रीव के साथ लड़ते हुए रघुनाथ ने धनुष लेकर हाथ में ग्रहण किया॥13॥ तब रघुपति ने सुग्रीव को दूत बनाकर उसे भगवान श्रीराम के पास भेजा, जिससे सुग्रीव ने उसके सामने बल प्राप्त किया।"
इस चौपाई में सुग्रीव के साथ रघुनाथ (भगवान श्रीराम) ने मिलकर धनुष लेकर लड़ाई लड़ते हुए रघुनाथ ने धनुष को हाथ में ग्रहण किया। इसके पश्चात सुग्रीव ने रघुपति को उसके बल की प्राप्ति के लिए भगवान श्रीराम के पास भेजा, जिससे रघुपति ने सुग्रीव को अपने सामने बल प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की।
सुनत बालि क्रोधातुर धावा, गहि कर चरन नारि समुझावा ||१४||
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा, ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा ||
इसका अर्थ है

"बालि ने अपने क्रोध से सुनकर धावा बोला, और वह नारी के चरणों को पकड़कर समझाया॥14॥ पति के बिना जिन्होंंने सुग्रीव से मिलाया हो, वे दोनों बंधु बहुत तेज और बलशाली हैं।"
इस चौपाई में बालि क्रोधित होकर उत्तराधिकारी सुग्रीव के पास धावा बोलते हैं और नारी के चरणों को पकड़कर समझाते हैं कि उन्हें धरती से उठाना चाहिए। सुग्रीव और राम दोनों ही बहुत तेज और बलशाली हैं, और ये बंधु बनकर मिलकर बालि के प्रति स्वाधीनता प्राप्त करते हैं।
कोसलेस सुत लछिमन रामा, कालहु जीति सकहिं संग्रामा ||१५||
इसका अर्थ है
"कोसल के सुत लक्ष्मण और राम, समय को जीतकर युद्ध में समर्थ हैं॥15॥"
इस चौपाई में तुलसीदास जी कह रहे हैं कि कोसल के सुत लक्ष्मण और राम, युद्ध में समर्थ होकर समय को जीत रहे हैं। इससे सुग्रीव को यह सिद्ध होता है कि राम और लक्ष्मण के साथ मिलकर उन्हें बालि के खिलाफ समर्थ भी होने का यह संकेत मिलता है।
चौपाई 
अस कहि चला महा अभिमानी, तृन समान सुग्रीवहि जानी ||
भिरे उभौ बाली अति तर्जा , मुठिका मारि महाधुनि गर्जा ||१||
इसका अर्थ है
"सुग्रीव ने बोला, 'तुम बहुत अभिमानी हो, तुम्हें भी तृण के समान समझता हूँ। बाली ने बहुत उत्साह से सुग्रीव के पास आकर उसे तरजा दिया, मुठिया मारकर महानदी में गर्जा॥1॥"
इस चौपाई में सुग्रीव बाली से बोल रहे हैं कि वह उसे तृण समान समझता है और उसका अभिमान अधिक है। बाली ने उत्साह से सुग्रीव के पास आकर उसे तरजा दिया, मुठिया मारकर और महानदी में गर्जा। इससे युद्ध में उत्साह बढ़ता है।
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा, मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा ||
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला, बंधु न होइ मोर यह काला ||२||
इसका अर्थ है

"तब सुग्रीव भयभीत होकर भागा, बाली ने मुष्टि से वज्र के समान प्रहार किया॥2॥ मैंने जो रघुबीर (श्रीराम) का यह कहा, वह सत्य हो गया कि मेरा यह कारण बंधु नहीं हुआ।"
इस चौपाई में सुग्रीव ने बाली की आशंका में भाग लिया और बाली ने उसे मुष्टि से वज्र के समान प्रहार किया। सुग्रीव यह कह रहा है कि जिस प्रकार रघुबीर की कृपा से मैंने तुच्छ कारण से बंधुत्व नहीं प्राप्त किया, वह सत्य हो गया।
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ, तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ ||
कर परसा सुग्रीव सरीरा, तनु भा कुलिस गई सब पीरा ||३||
इसका अर्थ है

"तुम दोनों एक समान रूप में हो, इस भ्रांति से मैं नहीं मारा जाऊँगा। सुग्रीव ने अपने शरीर पर कुलिस (कुल्हाड़ी) मारी, जिससे उसका तन पूरी तरह से कट गया और सभी पीड़ाएँ उससे हट गईं॥3॥"
इस चौपाई में सुग्रीव बाली से कह रहा है कि उन दोनों का रूप एक समान है और उसकी इस भ्रांति में किसी ने उसे मारा नहीं जा सकता है। सुग्रीव ने अपने शरीर पर कुलिस मारी, जिससे उसका तन पूरी तरह से कट गया और सभी पीड़ाएँ उससे हट गईं।
मेली कंठ सुमन कै माला, पठवा पुनि बल देइ बिसाला ||
पुनि नाना बिधि भई लराई, बिटप ओट देखहिं रघुराई ||४||
इसका अर्थ है

"सीता ने अपने मीले हुए पति राम के लिए सुमनों से बनी हुई माला को पुनः बल देकर भेजा। फिर वहां बहुत तरह की लड़ाई हुई, जिसमें राम ने बिटप ओट को देखा॥4॥"
इस चौपाई में सीता ने राम के लिए सुमन से बनी माला को पुनः बल देकर भेजा। फिर वहां विभिन्न तरीकों से लड़ाई हुई, जिसमें राम ने बिटप ओट को देखा। यह घटना "रामायण" के युद्ध काण्ड में समाहित है।
चौपाई 
परा बिकल महि सर के लागें, पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें ||
स्याम गात सिर जटा बनाएँ, अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ ||१||
इसका अर्थ है

"सीता ने सर्व प्राणियों के लिए भयभीत होकर माटी में समा जाने का संकल्प किया, पुनः उठकर प्रभु श्रीराम के सामने बैठीं। श्याम रंग के श्रीराम ने अपने सिर पर झटाईयों की रचना की और अरुण (सूर्य) के समान नेत्रों से तीर-धनुष चढ़ाया॥1॥"
इस चौपाई में सीता ने अपने प्राणियों के लिए भयभीत होकर माटी में समा जाने का संकल्प किया था, लेकिन फिर उठकर प्रभु श्रीराम के सामने बैठीं। श्रीराम ने अपने श्याम रंग के सिर पर झटाईयों की रचना की और उनके अरुण (सूर्य) नेत्रों से तीर-धनुष चढ़ाया।
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा, सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा ||
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा, बोला चितइ राम की ओरा ||२||
इसका अर्थ है

"बार-बार चित करता हूँ, अपने मन को प्रभु के चरणों में समर्पित करता हूँ। इस प्रकार, सुफल जन्म मिला है, क्योंकि मैंने प्रभु को पहचाना है। मेरे हृदय में प्रेम और मेरे मुख से कठोर वचन होते हैं, लेकिन मैंने राम की ओर मन को समर्पित किया है॥2॥"
इस चौपाई में तुलसीदास जी बता रहे हैं कि अपने मन को बार-बार प्रभु राम के चरणों में लगाना और उसे समर्पित करना, इससे उन्हें सुफल जन्म मिलता है और वह प्रभु को पहचानते हैं। उनके हृदय में प्रेम है और उनके मुख से कठोर वचन भी होते हैं, लेकिन वे हमेशा राम की ओर मन को समर्पित रखते हैं॥2॥
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई, मारेहु मोहि ब्याध की नाई ||
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा, अवगुन कबन नाथ मोहि मारा ||३||
इसका अर्थ है

"प्रभु राम, आप धर्म के लिए अवतारित हुए हैं, आप ही मुझे मोह और ब्याधि से मार सकते हैं। मेरे लिए धर्म के हेतु राम बैरी हैं, लेकिन सुग्रीव मेरे लिए प्रिय है, क्योंकि राम नाथ, जिनका मैं दुष्ट और अवगुणी हूँ, मुझे मार रहे हैं॥3॥"
इस चौपाई  में तुलसीदास जी राम के धर्म के लिए अवतारित होने की महिमा को स्तुति करते हैं और यह कहते हैं कि राम ही उन्हें मोह और ब्याधि से मुक्ति दिला सकते हैं। उन्होंने अपने अवगुणों के कारण राम से द्वेष का भाव रखते हुए भी, सुग्रीव को अपने प्रिय कहा है, क्योंकि सुग्रीव ने उन्हें सत्कार किया है॥3॥
अनुज बधू भगिनी सुत नारी, सुनु सठ कन्या सम ए चारी ||
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई, ताहि बधें कछु पाप न होई ||४||
इसका अर्थ है

"अनुज, बधू, भगिनी, सुत, नारी, सुनु, सभी साथ हो ऐसा चार गुण हैं। इन सबको देखकर जिनमें किसी भी प्रकार की कुदृष्टि नहीं होती, उनमें कुछ भी पाप नहीं होता॥4॥"
इस चौपाई में तुलसीदास जी हमें सिखा रहे हैं कि हमें अपने नाते-निबंधनों, सामाजिक रिश्तों, और परिवार के सदस्यों के साथ सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। इन सभी संबंधों में एक समर्थन और सहयोगी भावना रखना हमें पाप से बचा सकता है।
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना, नारि सिखावन करसि न काना ||
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी, मारा चहसि अधम अभिमानी ||५||
इसका अर्थ है

"मुढ़ तोहि अत्यंत अभिमानी है, और वह नारी सिखावने में कभी ध्यान नहीं देता है। मुझे अपनी बाहों की शक्ति पर आत्मविश्वास है, और मैं उस अत्यंत ही अधम अभिमानी को चुपचाप मारता हूँ॥5॥"
तुलसीदास जी यहाँ एक व्यक्ति की मूढ़ता और अभिमान का वर्णन कर रहे हैं। एक व्यक्ति जो अत्यंत अभिमानी है और जिसे शिक्षा देने का कोई रुचि नहीं है, उसे वे मूढ़ कह रहे हैं। उन्होंने अपनी बाहों की शक्ति पर भरोसा करके उस अधम अभिमानी को मारने का संकेत किया है॥5॥
चौपाई 
सुनत राम अति कोमल बानी, बालि सीस परसेउ निज पानी ||
अचल करौं तनु राखहु प्राना, बालि कहा सुनु कृपानिधाना ||१||
अर्थ है

"राम की बहुत कोमल बानी को सुनकर, बाली ने अपने सीस पर राम का पानी (पादुका) रखा। राम के कृपानिधान (अनन्त कृपा स्वरूप) कहते हुए, उसने कहा, 'हे राम, मैं अचल रूप से तनु रखता हूं, कृपा करके मेरे प्राण को बचाओ॥1॥"
यह चौपाई सुग्रीव और बाली के बीच हुए युद्ध के संदर्भ में है, जब सुग्रीव ने बाली के सामने आकर अपने प्राणों की रक्षा के लिए राम की कृपा की प्रार्थना की थी। बाली ने उसकी बातों को सुनकर राम का पानी (पादुका) अपने सीस पर रख लिया और राम की कृपा का आशीर्वाद मांगा॥1॥
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं, अंत राम कहि आवत नाहीं ||
जासु नाम बल संकर कासी, देत सबहि सम गति अविनासी ||२||
इस चौपाई का अर्थ 

"जन्म-जन्म मुनि जतनु कराहीं, उनका अर्थ है कि साधु-संतों ने बहुतंत्र तक तपस्या की है, प्रयास किया है। अंत राम कहि आवत नाहीं, इसका अर्थ है कि वे सब कहते हैं कि राम का साक्षात्कार और परमात्मा के साथ मिलन ही सबसे अच्छा है, लेकिन वह राम अन्तर्यामी है और उसका सीधा दर्शन होता नहीं।
जासु नाम बल संकर कासी, इसका अर्थ है कि जिनका नाम है, वही शक्तिशाली है, संकर कासी हैं। देत सबहि सम गति अविनासी, इसका अर्थ है कि वह सबको समर्पित हैं और उनकी गति अविनाशी है, यानी वह सदैव अमर रहते हैं।"
यह चौपाई तुलसीदास जी के "रामचरितमानस" से ली गई है, जिसमें उन्होंने भगवान राम के गुणों की महिमा का वर्णन किया है।
मम लोचन गोचर सोइ आवा, बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा ||३||
"मेरे दृष्टि को वही भगवान राम प्राप्त होते हैं, जो बार-बार अपने भक्तों के लिए स्वयं को रूपित करते हैं।"
यह तुलसीदास जी के "रामचरितमानस" से है और इसमें भक्ति भाव से भगवान राम के दर्शन की प्राप्ति की प्रेरणा है। यह दोहा भक्ति और प्रेम के साथ ईश्वर के प्रति आसीर्वाद की प्राप्ति का संदेश देता है।
चौपाई 
राम बालि निज धाम पठावा, नगर लोग सब ब्याकुल धावा ||
नाना बिधि बिलाप कर तारा, छूटे केस न देह सँभारा ||१||
यहां चौपाई का अर्थ है

राम बालि को उसके अपने धाम में पठाते हैं, और नगर के लोग सभी उत्सुकता से उसकी ओर दौड़ते हैं। नाना विधि से हनुमान तारा से शोक व्यक्त करते हैं, और उनके केश बिना उनके शरीर को संभालने का विवेचन करते हैं।
इस चौपाई में हनुमान जी भक्ति और समर्पण की भावना को प्रकट करते हैं, और इसे पठकर भक्तों को राम की भक्ति का मार्ग प्रदर्शित होता है।
तारा बिकल देखि रघुराया , दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ||
छिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा ||२||
इस चौपाई का अर्थ है

तारा ने विकल भाव से रघुकुल राजा राम को देखा, और उन्होंने अपने दीन भावना में हरि का ग्यान प्राप्त कर लिया, माया से मुक्त हो गए। वह अग्नि, जल, पावक, गगन और समीरा की भाँति सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, और सर्वाधिक शक्तिशाली हैं, और उन्होंने पंच तत्वों से युक्त अत्यंत नीचे रचित सरीर धारण किया है।
यह चौपाई हनुमान जी के वीरता, ज्ञान, और भक्ति को बयान करती है, जिनसे उन्होंने भगवान राम की सेवा करने का अपना समर्थन प्रदर्शित किया।
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा, जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ||
उपजा ग्यान चरन तब लागी, लीन्हेसि परम भगति बर मागी ||३||
इस चौपाई का अर्थ है

तुम्हारा प्रगट स्वरूप मेरे सामने है, परंतु मैं नित्य जीवन में तुम्हें कौनसी बात के लिए रोक रहा हूँ, यह सोचकर ही तुम्हारे सामने सोता हूँ। जब से तुम्होंने भगवान के पादों का ज्ञान प्राप्त किया है, तब से ही तुम्हारे मन में उठा ग्यान, और तुमने परम भक्ति की आग में लीन हो लिया है, जो केवल उसी को माँगता है।
इस चौपाई में हनुमान जी की भक्ति, ज्ञान, और समर्पण की भावना को व्यक्त करती है, और यह दिखाती है कि भक्त कैसे भगवान के सामने अपनी अनासक्ति और प्रेम के साथ सोता है।
उमा दारु जोषित की नाई, सबहि नचावत रामु गोसाई ||
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा, मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा ||४||
इस चौपाई का अर्थ है

उमा (पार्वती) ने दारु वाणी को जोषित किया (प्रेरित किया), और सभी लोग राम गोसाई की पूजा के लिए नृत्य करते हैं। तब सुग्रीव ने दीन रूप में आकर मदिरा पीने का अभ्यास किया, और उन्होंने सभी को अपने विधिबद्ध कृत्यों को पूरा करने के लिए प्रेरित किया, जैसे मृतकों के लिए कर्म किया जाता है।
इस चौपाई में सुग्रीव का चित्रण किया गया है, जो भगवान राम के साथ दोस्ती करने के लिए तैयार हो जाता है और उसके मार्गदर्शन में जीवन का उद्दीपन करता है।
राम कहा अनुजहि समुझाई, राज देहु सुग्रीवहि जाई ||
रघुपति चरन नाइ करि माथा, चले सकल प्रेरित रघुनाथा ||५||
इस चौपाई का अर्थ है
राम ने अंगद से कहा, "समझा ले, तुम अनुज सुग्रीव को कहो कि वह राजा बने और उसकी योजना को पूरा करें।" फिर राम ने अपने माथे पर रघुपति के पादों को चिरकर, राघव के प्रेरित सभी वानरों के साथ चलने का निर्णय लिया।
इस चौपाई में हनुमान जी राम की आज्ञा के अनुसार सुग्रीव को राजा बनाने का सुझाव देते हैं, जिससे वह अपने योजना को पूरा कर सकता है। राम ने भी इस महत्वपूर्ण स्थिति में सभी वानरों के साथ आगे बढ़ने का निर्णय किया है।

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