मासपारायण, बीसवाँ विश्राम 227-236

मासपारायण, बीसवाँ विश्राम 227-236 Maasparayan, twentieth rest 227-236

चौपाई
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।
एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।।
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।।
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही।।
समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।।
बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई।।
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।।
यह चौपाई भगवान राम के जीवन से जुड़ी हुई है और इसमें बहुतेरी शिक्षाएं छिपी हैं। इसमें भरत की बुद्धि और समझ की चर्चा है जब उन्होंने राजा दशरथ के अंतिम इच्छानुसार अयोध्या की राजधानी स्थान पर राम के बजाय अपने भाई को राज्य का प्रभु मानकर समझने की कोशिश की।
चौपाई का अर्थ है: "बहुत सोच-विचार करने पर भी सीता के वनवास का कारण कौन समझ पाता है? एक व्यक्ति आकर कहता है कि चालाकी से चतुरंग नहीं होती। राम ने सुनकर कहा, 'जो पिता और बंधुओं का सोचता है, उसे समझना चाहिए। भरत को समझना चाहिए कि प्रभु की चिंता में हमेशा ही हित नहीं मिलता। फिर भरत ने बुद्धिमान समझकर कहा, 'हे प्रभु! लक्ष्मण को तुम्हारे हृदय की खबर रखनी चाहिए, क्योंकि समय पर नीति का विचार करना बहुत जरूरी है। बिना पूछे कुछ न कहूँ, ऐ प्रभु! क्योंकि सेवक को समय पर नहीं ढील देनी चाहिए। तुम्हारी सम्पूर्ण जानकारी वाले होकर, स्वामी! आपको समझकर मैं कहता हूँ कि आगे क्या करना चाहिए।'"
इस चौपाई में भरत, लक्ष्मण, और राम के बीच विवेकपूर्ण वार्ता दर्शाती है, जो जीवन में समझदारी और सही नीति का महत्व बताती है।
दोहा-
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।
इस दोहे का अर्थ है: "नाथ (ईश्वर) का सुहृद (मित्र), सुठि (सत्य), सरल (सीधापन), चित (चेतना), सील (शील), और सनेह (प्रेम) का निधान होता है। सब पर प्रेम और प्रतीति रखते हुए अपने को सबके समान जानो।"
इस दोहे में बताया गया है कि ईश्वर का सत्य, सरलता, चेतना, और प्रेम हर किसी के जीवन में महत्त्वपूर्ण होता है। और सभी को समान दृष्टिकोण से देखना चाहिए, सभी में एक समान भावना और प्रेम रखना चाहिए।
चौपाई
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।
भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना।।
तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।।
कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी।।
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।।
कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।।
जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।
भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।।
इस चौपाई में भगवान राम के जीवन से जुड़ी घटनाओं का वर्णन है। यहां बताया गया है कि भगवान राम के पद प्रेम और नीति का विशेष महत्व होता है और उन्होंने अपने प्रिय भाई भरत को राज्य का प्रभु मानने का निर्णय लिया था।
चौपाई का अर्थ है: "जीवन में बिषयों को प्राप्त होने पर भी प्रभुता की प्राप्ति होती है। मूर्खता और मोह से मनुष्य का बस जाना चाहिए। भरत नीति में रत था और उन्होंने सच्चे साधु और ज्ञानी राम के प्रेम को पूरे जगत् को जाना। राम के पद को प्राप्त करने के लिए वह आज्ञा का पालन करते हुए धर्म और मर्यादा को बख्शी।
कुबंध ने कुटिल योजनाओं के साथ राम को वनवास में जाने का एक मौका देखा। कुम्भकर्ण ने मन में योजना बनाई और वह राजा अकंटक को बुलाया। उन्होंने अनेक प्रकार की चालें चलीं, लेकिन उन्हें दोनों भाइयों को मिलाने में सफलता नहीं मिली।
राम कोई छल कपट नहीं करते थे, वे रथ में सवार होते थे और भालू जैसे घने वन में रहते थे। भरत ने अपने दोस्त को सहायता दी और जगत् में मतवाले लोग राजसत्ता को पाते हैं।"
यह कविता भगवान राम और उनके भाइयों के जीवन में उनके नैतिकता और न्याय की महत्ता को बताती है।
दोहा-
ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।।
इस दोहे में ससि, गुरु, तीन गामी, नघुषु, चढ़े, भूमिसुर, लोक, बेद, तें, बिमुख, भा, अधम, न, बेन, और समान शब्द हैं।
इस दोहे का अर्थ है: "साँप को देखकर गुरु, तीन गामी और नघुषु (नागराज) भूमिसुर को भी चढ़ते हुए जाना चाहिए। लोग वेदों के पाठ में अधिक रुचि रखने वाले होने के बावजूद अधम (साधारण) और निर्बल लोग भी समान होते हैं।"
इस दोहे में यह बताया गया है कि विद्वान, शिक्षित और अनगिन्यता के धनी व्यक्ति को भी सबका सम्मान करना चाहिए, क्योंकि सभी में समानता होती है।
चौपाई
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।।
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।
एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।।
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।
यह चौपाई भगवान राम और उनके भाई भरत के बीच की बातचीत को दर्शाती है।
चौपाई का अर्थ है: "सुरनाथ भगवान राम ने बहुत बाहुओं वाले थे, उन्होंने कभी भी अपनी राजसत्ता में कलंक नहीं दिखाया। भरत ने सही उपाय किया, उन्होंने न दुश्मन का ऋण रखने का फैसला किया। उन्होंने कभी भी अपनी भलाई के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि उन्होंने राम को निर्दयता से जाना।
उन्होंने बहुत सोच-समझकर इसे अनूठा माना। राम की ललकार देखकर उनका मुख देखा। इतना कहते हुए वे नीति के रस में भूल गए, लड़ाई के रस में पलकों की भीगी हुई बूँदें समझी। वे अपने पद को शीश झुकाकर राम के सामने रखे और सच्चाई से बोले। मेरा नाथ अनुचित नहीं मानते, भरत! तुम मेरे लिए उपाय नहीं छोड़ो।
कहो, किसके साथ रहकर मैं अपने मन को मारूं? मेरे नाथ, मेरे हाथ में धनुष लिए हैं।"
इस चौपाई में भरत की नीतिपरक सोच और राम के प्रति उनकी प्रतिष्ठा दिखाई गई है। यह दोनों भाइयों के बीच की गहरी समझ।
दोहा-
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।।
इस दोहे का अर्थ है: "रामचंद्रजी का जन्म रघुकुल में हुआ था, और वे सभी को अनुग्रह करते थे। वे उन्हें धूल के समान समझते थे, जो भी ऊँचाई पर हो, वह नीचे को उठाने के लिए नहीं लाते थे।"
इस दोहे में कहा गया है कि श्रीरामचंद्रजी रघुकुल में जन्मे थे और उन्होंने सभी को अनुग्रह किया था। उन्होंने सभी को समान धूल के समान माना था और किसी को भी नीचे गिराने के लिए नहीं लात मारी थी।
चौपाई
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।।
आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।।
राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।
तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।।
जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
यह चौपाई भगवान राम और उनके भाई भरत के बीच के दृश्य को वर्णित करती है।
चौपाई का अर्थ है: "उठकर जोर लगाते हुए राज्य की मांग करो। मन और वीरता का रस जागरूक करो। जटाओं को बाँधकर सिर को कटी और भारी हाथ में सारसन और धनुष बांधो।
आज जैसे राम के सेवक हैं, वैसे ही भरत को समर शिक्षा दे दो। अगर राम का अनादर करोगे, तो दोनों भाई लड़ाई के बिस्तर पर सोएंगे।
बिना सहायता के समस्त समाज को ठीक से नहीं संभाल सकते। मैं अपने पिछले आज को खोलकर सबको दिखाऊँगा।
जैसे मृगराज हिरण को दल में से निकालते हैं और उसे बांधकर ले जाते हैं, वैसे ही भरत सेना को संग लेकर आएगा। सानुज (लक्ष्मण) को निपात के लिए तैयार करो।
अगर संकट आता है, तो मैं राम की सहायता के लिए आऊँगा और रण में मदद करूँगा।"
यह चौपाई भरत की समझदारी, उनकी तैयारी और वीरता को दर्शाती है, जो राजनीतिक और सामरिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण होते हैं।
दोहा-
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।
इस दोहे का अर्थ है: "अत्यंत क्रोधित होकर लखना ने शपथ खाकर सुना, जिससे सभी लोग भगवान को भरोसे भाग जाते हैं। सभी लोकपति वह लोगों को भयभीत करते हुए भाग रहे थे।"
इस दोहे में बताया गया है कि लखना ने बहुत गुस्से में शपथ खाकर बोला, जिससे सभी लोग भगवान से भागने लगे। यहाँ लोकपति सभी लोगों को डराने के लिए भाग रहे थे।
चौपाई
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।।
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।।
कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।
सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।
यह चौपाई भगवान राम के भाई लक्ष्मण के बीच की बातचीत को दर्शाती है।
चौपाई का अर्थ है: "जगत् में भय से मग्न हो गया है, आकाश में बादल जम गए हैं। लक्ष्मण, तुम्हारी वीरता और बल सबको चमकाती है। तुम्हारा प्रताप और प्रभाव सर्वजन के लिए है। कौन है जो तुम्हें समझ सके या तुम्हारी महिमा को जान सके।
उचित और अनुचित कार्य को भलीभांति समझो, सबको ठीक से समझा दो। जल्दबाजी करके पछताना नहीं चाहिए। जो वेदों और बुद्धि कहती है, वह सबसे बुद्धिमान नहीं होता।
जब तुमने सुरों के वचन सुने, तब तुमने राम और सीता का सम्मान किया। तुम्हारी नीति और उपदेश भले हैं। सभी राजा के लिए यह कठिन होता है।
जो ऐसा अचल नृप राज्य करता है, वही सत्संगति में भी होता है। तुम सुनो, लक्ष्मण, तुम्हारी बुद्धिमत्ता को भरत के सामने नहीं लाओ। इस प्रपंच (संसार) में इस बात की कोई दिशा नहीं है जो तुम्हें न सुने।"
यह चौपाई लक्ष्मण की विवेकपूर्ण बातचीत और उनकी सहानुभूति को दर्शाती है।
दोहा-
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।
इस दोहे का अर्थ है: "भरत ने राज्य को नहीं स्वीकार किया, बल्कि हरि के पाद को पाकर धन्य हो गया। कभी किंकिणी को छीनकर सिंधु बिना सींचता है।"
इस दोहे में बताया गया है कि भरत ने राज्य को स्वीकार नहीं किया और हरि (भगवान राम) के पादों को पाकर बहुत धन्य हो गया। कभी सिंधु की किंकिणी को छीनकर वह बिना सिंधु को सींचता है, जिससे यह बताया जा रहा है कि वे निष्कलंक होकर धर्म का पालन करते थे।
चौपाई
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।
लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।
यह चौपाई भगवान राम के भाई भरत के मन की भावना को व्यक्त करती है।
चौपाई का अर्थ है: "अंधकार की तरह अंधेरे में अंधेरा होता है, आकाश में बादलों की मिलावट होती है। गोपीयों का पानी बूढ़ा होता है, परन्तु वह स्वभाव से छमा और पवित्रता को छोड़ नहीं सकता। भाई भरत, तुम्हें तिमिर की तरह अंधकार को मिटाना चाहिए और उसे मक्खी की तरह उड़ाना चाहिए।
लक्ष्मण, तुम्हारी शपथ तुम्हारे पिता की ओर से आई है, और भरत तुम्हारे समान सुबंधु नहीं हैं। सगुन और अवगुण जल की तरह होते हैं, जो मिलकर प्रपंच को बनाते हैं। भरत, तुम्हारे गुण और दोषों का विचार करके हंस रबिबंस तड़ागा बन गये हो। तुमने जन्म के समय गुण और दोषों का विभाग किया है।
तुम्हें गुणों को पकड़कर अवगुणों को छोड़ देना चाहिए, ताकि तुम्हारा जैसा ज्ञान प्राप्त करके तुम दुनिया को प्रकाशित कर सको। भरत, तुम्हारा गुण सच्चाई और सदाचार से भरा हुआ है, और तुम्हे प्रेम के सागर में मग्न होना चाहिए, जो रघुकुल का राजा है।"
दोहा-
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।
इस दोहे का अर्थ है: "जब बिबीक्षा करते सभी पंडित रामचंद्रजी की बातों को सुनकर, तो भरत उनके प्रति प्रेम और सम्मान में भर गया। रामचंद्रजी ही उस प्रभु की कृपा के स्रोत हैं, जो सबको प्रशंसा देते हैं।"
इस दोहे में कहा गया है कि जब भरत ने रामचंद्रजी की बातों को सुनकर सभी पंडितों द्वारा बोली गयी रामचंद्रजी की प्रशंसा को देखा, तो उनके प्रति प्रेम और सम्मान में भर गया। यहाँ उनके बारे में कहा गया है कि वे ही वो प्रभु हैं, जो सबको अपनी कृपा से प्रशंसा देते हैं।
चौपाई
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।
इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।
सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।
चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
यह चौपाई रामायण के भरत के प्रति समर्पित है। इसमें कहा गया है कि जब तक भरत नहीं थे, तब तक जगत् में कोई भी धर्म, संस्कृति या जीवन की पूर्णता नहीं थी। भरत के गुणों की महिमा को कवि नहीं गा सकते, बिना उन्हें जाने, रामचंद्र को कोई भी समझ नहीं सकता। इस चौपाई में वर्णित है कि भरत ने सबकी सहायता की, मंदाकिनी नदी को शुद्ध किया, लोगों को नदी के किनारे लाया, और माता को गुरु और सचिव बनाया। भरत ने सीता-राम के साथ जाने का निर्णय किया, उनके साथ निषादराज गुह के छोटे भाई भी थे। उन्होंने सभी कार्यों को समझा और अपनी माँ को भी कहा कि "राम, लक्ष्मण, और सीता की कथा सुनकर मेरी आत्मा जाग उठी, और मैंने अपने घर छोड़ दिया।"

दोहा-
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
इस दोहे का अर्थ है: "माताओं, मातृभावना वाली महिलाओं को मैंने माना है, इसलिए वे जो कुछ भी मुझसे करती हैं, वह बहुत ही कम होता है। मैं अपनी अधिकारी प्रवृत्ति को समझता हूँ और पाप और अवगुणों को छोड़कर उन्हें सम्मान देता हूँ।"
यहाँ व्यक्त किया गया है कि जिन महिलाओं ने आपको पाला-पोसा है, उन्हें सम्मान देना चाहिए, और उनके द्वारा किया जाने वाला कुछ भी कार्य अधिकारिक प्रवृत्ति के मुकाबले बहुत ही थोड़ा होता है। व्यक्ति को अपनी अच्छी प्रवृत्ति को समझना चाहिए और पाप और दोषों को छोड़कर अधिकारिक प्रवृत्ति को समझना चाहिए।

चौपाई
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।
मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।
जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।।
अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।
भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।
देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।
यह चौपाई भरत के भावनात्मक अंदाज में उनके भाई राम, लक्ष्मण, और सीता के प्रति विश्वास और प्रेम को दर्शाती है।
चौपाई का अर्थ है: "अगर भरत को जन्म नहीं होता, तो धरती सभी धर्मों को धारण करती है। भरत, तेरे गुणों की कविता कब कुलों में अगम्य है, और तुझे बिना राघव कौन समझ सकता है।
लक्ष्मण, राम और सीता के बारे में सुरों की वाणी सुनकर अत्यंत सुख मिलता है, लेकिन उनका वर्णन करना असंभव है। यहाँ भरत ने सभी के साथ अपना सहायता करने का निर्णय किया है। वह मंदाकिनी नदी में नहाते हैं।
वह सभी को नदी के किनारे ले जाते हैं, माता और गुरु को आशीर्वाद देते हैं। भरत वहां जा रहा है, जहां राम, सीता और लक्ष्मण हैं, और उसके साथ निषाद नाथ भी हैं।
माता को समझाकर वह यथार्थ कार्य करना चाहता है, और वह अनंतकाल तक उनकी सेवा करना चाहता है। राम, लक्ष्मण, और सीता के नाम सुनकर, मेरी नाव खुद से उठ जाती है, और मैं यहाँ से चला जाता हूँ।"
दोहा-
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
इस दोहे का अर्थ है: "जब आप किसी अच्छे और मंगलमय गुण को देखते हैं और सुनते हैं, तो कहने वाला निषादु (दुर्जन) भी उसे गुणी कहता है। फिर भी, ऐसा सोचकर हर्षित होने से पहले सोचें क्योंकि अक्सर अच्छे काम का परिणाम दुःखपूर्ण भी होता है।"
इस दोहे में कहा गया है कि जब हम किसी अच्छे और मंगलमय गुण को देखते हैं और सुनते हैं, तो जो व्यक्ति दुर्जन होता है, वह भी उसे गुणी कहता है। लेकिन हमें इस बात को समझना चाहिए कि कभी-कभी अच्छे कार्य करने के बाद भी उसका परिणाम दुःखपूर्ण हो सकता है।

चौपाई
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।
भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।
राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।
भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।
यह चौपाई भरत के भावनात्मक भावों को दर्शाती है जब वे राम के वापस आने के लिए तैयार हो रहे हैं।
चौपाई का अर्थ है: "सेवक जानते हैं कि सत्य क्या है। वे आश्रम के निकट जाने के लिए तत्पर हैं। भरत, जैसे ही वे वन में पहुँचते हैं, वे जनता को देखते हैं और उन्हें खुशी और शुद्धि का संदेश सुनाते हैं।
इससे जनता की चिंता और त्रिभुज तापों द्वारा दुःखित होती है। जैसे ही सूर्य देश में आता है और सुख लाता है, वैसे ही भरत उसी रूप में जनता के लिए अनुहारी होते हैं।
राम के बन में धन-संपत्ति विलीन हो जाती है, जनता खुश होकर सूर्य की तरह जानती है। सचिव, बिरागु, बिबेकी और नरेशू, वे सभी देश के लिए शुद्ध और सुहावना करने वाले होते हैं। भट, जम और नियम राजधानी के लिए, सांति, सुमति और सुंदर रानी के लिए होते हैं। सभी अंग संपन्न होते हैं और वे राम के प्रशाद में सन्मान और आश्रय लेते हैं।"
दोहा-
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
इस दोहे का अर्थ है: "बुद्धिमान राजा जो अपने मोह को जीतते हैं और साथी समूह के साथ विवेकपूर्वक निर्णय लेते हैं, वे संपत्ति और सुख को बढ़ाते हैं और अविघ्नित राज्य का आनंद उठाते हैं।"
इस दोहे में बताया गया है कि बुद्धिमान राजा जो अपने मोह को जीतते हैं और साथी समूह के साथ समझदारी से निर्णय लेते हैं, वे समृद्धि और सुख को बढ़ाते हैं और अविघ्नित राज्य का आनंद उठाते हैं।
चौपाई
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।
खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।।
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।
चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।
अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।
बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।
यह चौपाई वन्य और प्राकृतिक वातावरण का वर्णन करती है और जनता के खुशहाली को बताती है।
चौपाई का अर्थ है: "वन्य प्रदेश में गहरे जंगल हैं, जनता नगरों और गाँवों को गणना करती है। अनेक प्रकार के अद्भुत पक्षी, जानवर और प्राणियों को जनता बताने में सक्षम नहीं होती।
पंखी और हरिण बाघ और बारहसिंह की सराहना करती है। भेड़, मृग, सरस, और महिष के साथ मिलकर, मनुष्य एक साथ होकर चतुरंगी सेना बनाते हैं।
झरने बहते हैं, मत्त हाथी गर्जते हैं। मनुष्यों का हृदय विभिन्न प्रकार की शस्त्रों के साथ बजता है।
चकोर, चातक, सुक, पिक, और अन्य पक्षी गाते हैं, और मनुष्य हर्षित होते हैं। मोर नृत्य करते हैं, और सूर्य, मंगल, और खुशियों का अनुभव होता है।
वक्त पर घास और पेड़ सफलतापूर्वक बढ़ते हैं, समाज की सभी तबीयत खुशहाली की ओर बढ़ती है।"
दोहा-
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
इस दोहे का अर्थ है: "भरत ने रामचंद्रजी की सुंदर पर्वतों की शोभा को देखकर अत्यंत प्रेम से उनका ह्रदय देखा। वे तापसों द्वारा तप करने का फल प्राप्त करते हैं, वैसे ही भरत भी उन्हीं सिरानों की नेम में सुखी हो रहे थे।"
इस दोहे में बताया गया है कि भरत ने जब रामचंद्रजी की पर्वतों की सुंदरता को देखा, तो वे उन्हें बहुत प्रेम से अपने ह्रदय में रखा। जैसे तापस तप करने के बाद अपने सिरानों के नेम में सुखी होते हैं, वैसे ही भरत भी रामचंद्रजी के सुंदर पर्वतों की नेम में सुखी हो रहे थे।

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