रामचरितमानस अयोध्या कांड संपूर्ण अर्थ सहित


रामचरितमानस अयोध्या कांड संपूर्ण अर्थ सहित

श्री रामचरित मानस अयोध्या कांड

प्रत्येक कांड में श्लोक, दोहा,  सोरठा, छंद एवं चौपाइयों की संख्या

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के अयोध्या कांड में कुल 314 दोहे हैं. अयोध्या कांड में 1 श्लोक, 314 दोहा, 13 सोरठा, 13 छंद और 326 चौपाई हैं. अयोध्या कांड में श्रीराम वनगमन से लेकर श्रीराम-भरत मिलाप तक के घटनाक्रम आते हैं.

प्रथम सोपान अयोध्या कांड

श्लोक
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्।।1।।
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।।2।।
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।3।।
यह स्तुति भगवान शिव की है
जिन्हें विभूषित करती हैं माता पार्वती, जो उनके मस्तक पर बालों के समुद्र से श्रृंगार करती हैं। उनकी भूषा के रूप में शिवजी के माथे पर चंदन का रस और उनके गले पर शिशुकीट का रस लगता है। वे सबका स्वामी हैं, हमेशा सर्वदा, सभी जगह होते हैं, शर्वा, सर्वगता, शिवा, चंद्रमा की तरह चमकते हैं, श्रीशंकर हैं, मुझे सुरक्षित रखें। यहाँ तुलसीदास जी श्री रामचंद्रजी की स्तुति करते हैं, जो कि अनुकरणीय समर्थ, श्री रामचंद्रजी के चेहरे की शोभा मुझे सदा प्रसन्न रखे। जो कभी राज्याभिषेक में नहीं गई, वैसे ही मैं भी नहीं जाऊं, और जो कभी वनवास के दुख में नहीं रहे, वैसे ही मुझे भी वनवास का दुःख ना प्राप्त हो। जो सीताजी ने नीली साड़ी, काले रंग का कोमल शरीर और वाम भाग में सीता के रूप में उपहार दिया, उन रामचंद्रजी की मांगलिक धर्मपत्नी को मैं सदा नमस्कार करता हूं। मैं रामजी को नमस्कार करता हूं, जिनके हाथ में बड़ा सा धनुष और चारु तीर छलांग रहे हैं, रघुकुल नाथ श्री रामचंद्रजी को।
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
इसका अर्थ है:-
"श्री गुरु के चरणों के रज में अपने मन, मुख, और मन को शुद्ध कर। रघुकुल के बिमल जैसे जो दायक फल चारों ओर प्रकट होते हैं, उसी प्रकार मैं भी उनकी महिमा गाता हूँ।" यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी गुरु के पावन चरणों का आदर करते हैं और उनकी महिमा को स्तुति करते हैं, जिनसे हमें ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त होता है। गुरु को उनके उपहार की तरह समझा गया है, जिनसे हमें सही राह दिखाई जाती है और हमें जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है।
चौपाई
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।
मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।
राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।
चौपाई अर्थ है
यह चौपाई भगवान रामचंद्रजी के विवाह की सुखमयी घटना को वर्णित करती है। इसमें बताया गया है कि जब भगवान राम अपने घर वापस लौटे, तो उस समय बहुत से नव मंगल उत्सव मनाए गए। सभी लोग सुखी थे, जैसे कि सुखद मेघ वर्षा करते हैं और भूमि को सुखदायक बनाते हैं। धन, सिद्धि, संपत्ति और नदियाँ सुखदायक थीं, जैसे कि समुद्र के जल में उतरने वाली अवध नदी भी आई थी। सभी लोग खुश थे और इस आनंद में रामचंद्रजी का मुख चाँद की तरह चमक रहा था। सभी माताएँ, सखियाँ और सहेलियाँ खुश थीं और सभी का मनोरथ पूरा हो गया। रामजी का रूप गुणवान और सुंदर था, और सभी खुश होकर उन्हें देखने और सुनने के लिए रुवाने लगे।
दोहा
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।
आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।
इसका अर्थ है
यह दोहा भगवान राम की भक्ति और उनकी कृपा को स्तुति करता है।
"सब के हृदय में जो आशा है, वह कहते हैं महेश (भगवान शिव)। परंतु वह जूबराज पद (भगवान राम का पद) नरों को दे देते हैं।" इस दोहे में बताया गया है कि सभी मानवों के हृदय में अलग-अलग इच्छाएं होती हैं, लेकिन वे इच्छाएं भगवान शिव को समर्पित की जाती हैं। और भगवान शिव फिर भी उन्हें भगवान राम के पद (उच्चतम धार्मिक स्थान) को प्राप्त करने की कृपा करते हैं।
चौपाई
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।
सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।
तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।
मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।
नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।
यह चौपाई अर्थ है

 भगवान राम के बारे में बताती है: "एक समय समाज के सब लोगों के साथ, राजसभा में श्रीराम रघुराज विशेषतः विशाल बैठे थे। सभी लोग उन्हें भगवान के समान सुकृति का स्वरूप मानते थे और राम के सुजसु सुनकर उनमें अत्यंत हर्ष उत्पन्न होता था। सभी राजा और अन्य लोग उनसे कृपा की आशा करते रहते थे और लोगों को भी प्रीति और नेतृत्व प्रदान करते थे। तीनों लोकों में भगवान राम के समान कोई भी अद्भुत नहीं था, उनके पिता दशरथ भी इस समान नहीं थे। राम, मंगल का मूल हैं, जो कुछ भी कहा जाए, वह सब तोर्णे वाला है। उनकी चेहरे की सुंदरता से राजा और सुभाषित को लीन लेती थी, उनके मुकुट की तरह बदन को देखकर सभी लोग समान थे। उनके केस बहुत ही काले और मधुर थे, उनके मुख को देखने से ही जन्म-मरण का रहस्य अनुभव हो जाता था। राजा जूबराज से राम को कहते हैं, 'हे राम, मैं आपको देखने के लिए क्यों न देऊं? जीवन और जन्म लाखों लोगों के लिए तो छोड़ दूंगा, परंतु आपकी अनुग्रह को कैसे छोड़ूँ?'यह चौपाई भगवान राम के महिमा में लिखी गई है और उनके महत्त्व को दर्शाती है।
दोहा
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
इस दोहे में कहा गया है

"यह सुंदर विचार दिया गया है, जिससे राजा को अच्छा समय मिला है। प्रेम से भरी हुई आँखों और खुशी से भरे हुए मन के साथ उसे सुनाना चाहिए।" यह दोहा उत्कृष्ट विचारों को समर्पित करता है और यह संकेत करता है कि किसी भी महत्त्वपूर्ण समय में सच्चे प्रेम और खुशी से भरी हुई भावनाओं को बयान करना चाहिए। यह समय विचारने और साझा करने का सुअवसर हो सकता है, जो किसी भी समय में महत्त्वपूर्ण हो सकता है।
चौपाई
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।
बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
यह चौपाई अर्थ है

 श्रीराम के बारे में है:"मुनिनायक ने वह विचार किया और सुनाया, राम सब प्रकार से समर्पित और सभी के लायक हैं। वे सेवकों, सचिवों और सभी निवासियों के अरि (शत्रु), मित्र और उदासी हैं। सभी राम को प्रिय मानते हैं, जैसे मुझे मानते हैं, और प्रभु उनसे अशीर्वाद और आशीर्वाद की भाँति अपनी शरण में लेते हैं। ब्राह्मणों सहित उनका परिवार उन्हें पूजता है, और सभी उनकी भव्यता को स्वीकार करते हैं। जो भी लोग गुरु के चरणों का रेनु (भक्ति भाव) धारण करते हैं, उन्हीं लोगों को सम्पूर्ण भव्यता मिलती है। मैं दूसरों से उसी तरह अनुभव नहीं कर सकता जैसे खुद को। सभी लोग राजा को पूजते हैं और मैं भी पूजता हूँ। अब मेरी एकमात्र इच्छा है, मेरे मन में सिर्फ यही अभिलाषा है कि आपको पूजा करूं और आपका आशीर्वाद प्राप्त करूं। इस प्रसन्नता और सहज सन्तोष को देखकर मुनि नरेश कहते हैं कि यह राजा को देह दीजिए।"
दोहा
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।
 इसका अर्थ है

"अरे राजन! जिनका नाम सभी द्वारा प्रशंसित है, वही सबसे बड़ा दाता है। उसके फलों का अनुसरण करने वाले महाराज, उनकी प्राप्ति के लिए मन में इच्छाएं करते हैं, आप ही वह दाता हैं।"
चौपाई
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।
 इस 
चौपाई का अर्थ है
"सभी तरह से गुरु प्रसन्न होने पर मनुष्य जीवन को समृद्धि से जानता है। राजन! जो आप नाथ राम को प्रसन्न करते हैं, उन्हीं से कृपा करके समाज को शांति दी जाती है। मुझे बहुत अच्छा लगता है जब लोग मेरे सच्चे दर्शन करते हैं। उन्होंने सब की प्राप्ति की आशा की है। इस प्रकार लालसा को अपने मन में धारण किया जाता है। मैं फिर नहीं सोचता कि विचार करूं या छोड़ दूं, जिसका पछतावा बाद में हो। सुनकर मुनि दशरथ के शब्दों को अत्यंत सुहावने लगे, उन्होंने जो आनंद और हर्ष मन में पैदा किया। राजा ने सुना कि वे जिनका भजन नहीं करते, उन्हें पीछे हटते हैं। वे जो पवित्र हैं, प्रेम में लिप्त हैं, वे ही मेरे स्वामी हैं।"
दोहा
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।
इसका अर्थ है
"राजन! तुम विलम्ब न करो, समाज को सजाओ, सुमंगल हो जाएगा जब राम जुबराज होंगे।"
यह कविता भगवान राम की महिमा और उनके प्रति श्रद्धाभावना को दर्शाती है।
चौपाई
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।
जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।
बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।
नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।
इस चौपाई का अर्थ है
"जब राजा दशरथ मन्दिर में प्रवेश किया, तो सुमंत्र ने सेवकों और सचिवों को बुलाया। सुमंत्र ने जयजीव से कहा, 'सभी तीनों राजा श्रीराम के शिरस्त्राण नहीं करें, वे भूपति ने सुमंगल बातें सुनाई। अगर पांचों नेताओं की मत में से किसी को भी ठीक न लगे, तो राम के हृदय में हर्ष बढ़ाओ। मंत्री ने खुश होकर यह प्रिय बातें सुनीं, और जनता ने उनके विचारों को स्वीकार किया। जनता ने सचिव से निवेदन किया कि वे अपनी शक्ति से जगतपति को बहुत से करोड़ों वर्षों के लिए बारिश करें। जगत में मंगल, भले कार्य की योजना बनाओ, ताकि नाथ जल्दी से अपना अवतार न लें।' राजा ने सचिव की बातें सुनकर आनंदित होकर उनकी शुभाशीषों को स्वीकार किया।"
दोहा
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।
राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।
इस दोहे का अर्थ है

"राजा से कहो, 'मुनिराज! जो भी अच्छा और उपयुक्त लगे, वही करें। राम जी का राज्याभिषेक शीघ्र करें, जो कुछ उपयुक्त हो।'"
चौपाई
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।
औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।
मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।
सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।
पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।
इस चौपाई का अर्थ है
"मुनियों को हर्षित करने के लिए मैं मृदु भाषण में कहता हूं। सब संतान साथ-साथ सुतीर्थ के पानी में आ जाते हैं। विभिन्न औषधियों के मूल, फूल और फल मिलते हैं, जिनके नाम गुणगान विशेष किए जाते हैं। चामर, अंतिम वस्त्र, बहुत से प्रकार के आसन, चरणों की पट्टियाँ और अनगिनत जातियों की बाल-बालियां होती हैं। मनोबल से नगरों में अनेक प्रकार की मंगल वस्तुएं होती हैं, जिन्हें राजा को राज्याभिषेक में प्रयोग करना चाहिए। सभी वेद-विधानों को जानकर उन्हें सम्पूर्ण तरीके से आचरण करना चाहिए और नगरों की विभिन्नता को बनाए रखना चाहिए। फल और सब्जियों को सफलतापूर्वक बोएं, नगर के चारों ओर फिराएं, मनोहारी बाग और छोटे सुंदर चौकों को तैयार करें, और नगर को शीघ्र ही बाजार की तरह सजाएं। गणपति को, गुरुजनों को, और परिवार के इष्टदेवता को पूजें, और समाज की सेवा करने के लिए हर संभव प्रयास करें।"
दोहा
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।
यह दोहा अर्थ है

"ध्वज और पताका फहराने के लिए, कलस तथा तुरग, रथ और नाग को सजाने के लिए, सबका सिर मुनिजनों के आज्ञानुसार अपने-अपने कार्यों में लगा दो।"
चौपाई
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।
बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।
राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।
भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।
रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
इस चौपाई का अर्थ है
"जो मुनियों ने जैसा आदेश दिया, उसे उन्होंने पहले ही कार्य में किया। ब्राह्मण, साधु, और देवताओं की पूजा करते हुए राजा राम ने उनके हित में मंगल कार्य किया। जब राम ने अभिषेक सुना, तो अवध में बजे गहारे गहारे आवाज़। राम सीता को अपने शरीर में साथ जाने के लिए सबको बुलाए, जिससे मंगलमय वातावरण बना। सब एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक बातें कह रहे थे, जबकि भरत का आगमन हो रहा था जो कि बहुत दिनों के बाद हुआ। उसके प्रियतम भई श्रीराम के पास जाने में सभी को बहुत सुख मिला। भरत को श्रीराम की प्रियता इस जगह में कोई और फल नहीं पा सकती। राम ने भरत को दिन-रात सोचते रहते हुए अपने मित्र के रूप में देखा, जैसे कि अंधेरे कमरे में एक बंधु दूसरे को समझते हैं।"
दोहा
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।
सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।
इस दोहे का अर्थ है

"इस अवसर पर बहुत अच्छे समाचार सुनकर रामनगरी में विराजमान राम बिहारी बहुत सुन्दर लग रहे हैं। सभी लोग उन्हें देखते हुए अद्भुत खुशी में बढ़ते हैं और मधुरता के बीच खेलते हैं।"
चौपाई
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।
आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।
इस चौपाई का अर्थ है
"पहले जो व्यक्ति उनके वचनों को सुनाता है, उन्हें विभूषित वस्त्र और अनेक भूषण प्राप्त होते हैं। प्रेम से तन और मन अनुरागी हो जाते हैं। सभी लोग मंगलकारी रुपणी को बहुत पसंद करते हैं। सुमित्रा नगरी बहुत ही सुंदर है और विविधता से भरी हुई है। राम, जो कि महान हैं, अपनी दानशीलता से ब्राह्मणों को बहुत शान्ति और संतोष प्रदान करते हैं। सुरों और नागों को पूजा जाता है, और इस तरह के बलियों को बहुत अर्पित किया जाता है। जिस तरह राम का कल्याण होता है, वैसे ही कृपा करके उन्हीं को बर्दान दिया जाता है। इन नगरी में मंगलमय कोकिला गाती है, और हर ओर वन्य जानवरों का संगीत सुनाई देता है।"
दोहा
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।
इस दोहे का अर्थ है

"राम के राज्याभिषेक की सूचना सुनकर पुरुष और स्त्रियाँ हृदय से आनंदित हो गए। सभी मिलकर उनके शुभ समाचारों को अनुकूलता से सोच रहे थे।"
चौपाई
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।
तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।
आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।
इस चौपाई का अर्थ है
"तब बसिष्ठ ने नारों को बुलाया और उन्हें राम की धामनी शिक्षा दी। गुरु की आगमन सुनकर रघुनाथ ने उनके पैरों को नमस्कार किया। उन्होंने सम्मान के साथ गुरु को अर्घ्य दिया और उन्हें घर में लाने के लिए 16 प्रकार से पूजा की। उन्होंने सीता जी के साथ गुरु के चरणों को पकड़ा और राम ने कमल को जोड़कर भक्ति भरी भाषण किया। सेवकों ने स्वामी के आगमन को सम्मानित किया, जो मंगल की मूल और अमंगल को नष्ट करता है। फिर भी यह उचित था कि सभी स्वामी के आज्ञानुसार काम करें। स्वामी ने अपनी उच्चता छोड़ी और प्रेम से सेवकों को आज्ञा दी। सेवकों ने स्वामी की सेवा की।"
दोहा
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।
राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।
इस दोहे का अर्थ है
"मुनि ने रघुकुल के प्रेम और साने बोलों को सुनकर राम की प्रशंसा की। वह कहते हैं कि हे हंसों के श्रेष्ठ! तुम किस प्रकार से न कहो कि राम वंश का अवतार हैं।
चौपाई
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।
भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।
गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।
करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।
इस चौपाई का अर्थ है

"राम के गुण, सील और उनकी सुन्दरता की प्रशंसा करते हुए मुनि बोले। राजा को अभिषेक करने का तुमसे इच्छा है, हे राजन्! राम से सब कुछ संयमित करने का आदेश करो। जैसे कि गुरु ने सिखाया था, राजा ने अपना वचन दिया था। जो काम ठीक से संभाला जाएगा, उसे वह इस तरह से निबाहेगा। गुरु द्वारा शिक्षा दी गई बातों को समझते हुए राजा उसे अपने हृदय में स्थान देते हुए विस्मित हो गए। जो भाई एक संग जन्मे थे, वे बीच-बीच में खाना-खेलना करते थे। उनका एक साथ जीवनयात्रा किया गया था। राम का वंश एकमात्र अपरिपक्व था। भाई ने उसे बड़ा किया और अभिषेक किया। प्रभु की प्रेम भक्ति ने उन्हें संतोषित किया, परन्तु मन के कुटिलता ने उन्हें पीड़ित किया।"
दोहा
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।
सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।
इस दोहे में कहा गया है

"तब वह समय आया जब लखना में प्रेम और आनंद से भरा हुआ था। उसने प्रिय के सम्मान में रघुकुल के चंद्रमा के तुल्य बातें कहीं।"
चौपाई
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।
भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।
हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।
कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।
कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।
सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।
सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।
इस चौपाई में कहा गया है
"बिना किसी संकोच के विभिन्न तरीकों से बाजा बजाने के नियम थे, लेकिन सबको अपनी खुशी का ज़िक्र नहीं करना चाहिए। भरत के आगमन को सबने मनाया, उनके आगमन पर सबके चेहरे फलों की भाँति खिल गए। बाजार, गलियां और घरों में सभी लोग एक-दूसरे से बातें करते और सभी अपनी अनुकूलता को प्रकट करते थे। बड़ा भव्य कार्यक्रम होने वाला था, जिसमें राम और सीता समेत बैठने वाले सिंहासन की बात हो रही थी। सबने चाहा कि वो काम जल्दी हो जाए। सब लोग यह पूछ रहे थे कि कब होगी वह काली समाप्त, जो देवी कौशल्या का चोरी जाना जाता था। सुग्रीव ने बिनय की बातें कहीं और बारह बार चरणों को पर्णाम किया।"
दोहा
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।
रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।
यह दोहा यह कहता है

कि जब हमारी मुश्किलें बड़ी दिखाई दे, तो हमें उस व्यक्ति का साथ देना चाहिए जो हमारे लिए सबसे अच्छा है, तथा जब भगवान राम वन को राज्य छोड़ कर समस्त सुरकार्य करने गए थे।
चौपाई
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।
देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।
जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।
बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।
ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।
हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।
इस चौपाई  में कहा गया है

 कौसल्या जी ने देवताओं की बिनती को सुना, परन्तु वे निराश हो गईं। उन्होंने देवताओं को देखा और फिर उन्हें कहा कि माता का वह भाग्यशाली बच्चा नहीं है। उन्होंने राम को इस जानकारी को बताया जो इस संसार के प्रभु हैं। जीवन के कर्मों के अनुसार सुख और दुःख मिलते हैं, और उन्होंने अवध में देवताओं के हित के लिए जाने का निर्णय किया। देवताओं ने उनके चरणों को बार-बार पकड़ा, पर वह अंदर बिचार करने चली गई। उन्होंने ऊँची स्थिति को त्यागकर नीचे की स्थिति को धारण किया। उन्होंने अपने कार्यों का विचार किया और कवि वाल्मीकि जी ने जो सुख के लिए उनसे कहा था, वह किया। धरती पर आकर दशरथपुरी में उनका स्वागत हुआ, पर दुःख की घटना घटी जिससे दशरथ को बहुत दुःख हुआ।
दोहा
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।
यह दोहा यह कहता है
कि मंथरा ने मंदबुद्धि और बुरी सोच के साथ किसी को द्वेष और बुराई में प्रेरित किया। उसने विशेष रूप से किसी व्यक्ति को अपनी चालाकी से विपरीत संदेश दिया, जिससे उस व्यक्ति को बड़ा नुकसान हुआ। इससे साफ दिखता है कि बुरी सोच और द्वेष से भरी हुई विचारधारा की बुराई की खातिर कितना बड़ा परिणाम हो सकता है।
चौपाई
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।
पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।
करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।
ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।
तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।
इस चौपाई में बताया गया है 

कि मंथरा ने अपनी चालाकी और मकरी चाल से अयोध्या नगर में मनमोहक और शुभ सौंदर्य भरे उत्सव का नकली रूप बनाया। वह लोगों से पूछताछ की और उन्हें राम का तिलक दिखाया, जिससे उनका मन उदास हो गया। मंथरा ने अपनी चालाकी और घातक बुद्धि से राम के अनुयायियों को विचलित करने की कोशिश की, जिससे उनका आँसू रोक नहीं सका। माता कैकेयी ने उसे अपने वचनों का पालन करने को कहा, लेकिन वह अपने पापी और चालाकी भरे स्वभाव को नहीं छोड़ सकी। वह चाहती थी कि लखन को भी अपनी और खींच ले, लेकिन लखन ने उसकी कुंडलित स्थिति को समझकर उससे दूर रहा। इससे पता चलता है कि मंथरा का वास्तविक स्वभाव कितना दुष्ट और कपटी था।
दोहा
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।
लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।
यह दोहा यह कहता है
मंथरा ने माता कैकेयी से उसके लक्ष्य तथा भरत, लक्ष्मण और राम को नुकसान पहुंचाने के लिए कुशल राम के बारे में बुरे विचार और अशुभ सोच प्रकट की। वह माता कैकेयी को उन चारों भाइयों के अन्यायपूर्ण रूप से बुरा भाव और दुश्मनी के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करती है। 
चौपाई
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।
देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।
नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।
पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।
यह चौपाई बताती है कि 
मंथरा ने कैकेयी से कहा कि उन्हें राम को छोड़ने के लिए कुछ करना चाहिए, जो उन्हें बहुत बल देगा। इसमें कैकेयी को बड़ा विचार करने की सलाह दी जा रही है। उसने कहा कि राम ने अपने कुसल को छोड़ दिया है, जो सभी को उसका सम्मान देता है। वह कौसल्या को बहुत दाहिनी मानती है और उसे उसके गर्व और उत्साह का अहंकार नहीं दिखाई देता। वह उसके मन में वही सौंदर्य देखती है जो राम के मन में है। उसे लगता है कि कैकेयी ने अपने पुत्र को दूर भेज दिया है, इसलिए उसे कुछ प्रिय स्थानों पर जाने की जरूरत नहीं है। वह भूपति की चतुराई और बड़ेपने को नहीं मानती। उसने रानी के प्रिय शब्दों को सुनकर अपना मन मलिन माना और अब बस चुपचाप विचार करने की सलाह दी। फिर उसने कहा कि कभी घर में कोई घरेलू जगह भी नहीं होती, तो तुम्हें घर की ओर झुककर जाना चाहिए।
दोहा
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।
यह दोहा यह कहता है
कि मंथरा बहुत चतुराई से अपने प्रयासों को जानती है और अपने तंत्रों को फिर से बढ़ावा देती है। उसने चेरकर भरती माता के मुस्कुराहट को विशेष रूप से समझा। उसने कूबर की तरह चालाकी और कपटी होकर सब कुछ समझ लिया।

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