रामचरितमानस भावार्थ सहित अयोध्या काण्ड

रामचरितमानस भावार्थ सहित अयोध्या काण्ड Ayodhya incident with Ramcharitmanas meaning

चौपाई
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।
कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।
जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।।
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।।
लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।
यह चौपाई भगवान राम के जीवन से जुड़े हुए हैं, जो तुलसीदासजी के "रामचरितमानस" से हैं। इसका अर्थ है:-
"जैसे जो भी विधि सीता और लक्ष्मण सुख प्राप्त करते हैं, वही रघुनाथ (भगवान राम) कहते हैं। पुरातन कथाओं और कहानियों को सुनकर लक्ष्मण सीता को अत्यधिक सुखी मानते हैं। जब भी राम अयोध्या की बात करते हैं, तब-तब उनकी आंखों में आंसू भर आते हैं। माता, पिता, परिजन और भाई का स्मरण करते हैं, भरत के प्रेम में अनुरूप सेवा करते हैं। उन्होंने धीरज और कृपाशीलता का सागर बनकर दुखों को सहा, धीरता से संभालकर कठिन परिस्थितियों का सामना किया। सीता और लक्ष्मण को देखकर वे सुखी होते हैं, जैसे मनुष्य अपने पुरुषों की अनुसरण करते हैं। रघुनंदन (राम) को देखकर प्रियजन, बंधुजन, भक्त और धीर व्यक्ति का हृदय चंदन की भाँति महक उठता है। लक्ष्मण और सीता द्वारा सुनी गई यह कथाएं पवित्र होती हैं और वह सुखी होते हैं।"
यह दोहा रामायण के प्रेम, समर्पण, और धर्म को बयान करते हैं और भक्ति के माध्यम से भगवान के प्रति श्रद्धा को दर्शाते हैं।
दोहा-
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।
इसका अर्थ है:

"राम, लक्ष्मण, और सीता के साथ प्रेमभरे पर्वत निकेत में बहुत सुन्दर दिखते हैं, जैसे अमरपुर में ब्रह्मा और जयंती के साथ विष्णु वास करते हैं।"
यह दोहा भगवान राम, सीता, और लक्ष्मण के समर्पित प्रेम और उनके आपसी संबंधों को व्यक्त करता है। इसमें उनके सहयोग और साथीपन का उत्कृष्ट उदाहरण दिया गया है। उनके साथ रहने से परिवार का सुख और समृद्धि होती है, जैसे अमरपुर में देवताओं का स्थान होता है।
चौपाई
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।।
कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।
फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।।
मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।
राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।।
देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।
ये चौपाई तुलसीदासजी के "रामचरितमानस" से हैं। इसका अर्थ है:

"राम, सीता और लक्ष्मण को जो देखता है, वह उनके साथ रहने की कैसी विशेषता है, जैसे आंख का गोला जो अपने आप में सम्पूर्ण है। लक्ष्मण भगवान राम और सीता की सेवा करते हैं जैसे विवेकी पुरुष अपने शरीर की सेवा करता है। इस प्रकार भगवान राम सुख से अयोध्या में बसते हैं, जैसे पक्षी, मृग, देवता और तपस्वी अपने लिए करते हैं। कहो उन्हें की अयोध्या के जंगल में बहुत सुंदर हैं। सुमंत्र, तुम सुनो, जैसे अवध में है। तब निषाद अशोक वन में ले जाया गया, और मिनिस्टर्स सहित उनके रथ को देखते हुए आए। मंत्री विचार कर निषादों को देख रहे थे, जैसे डर कर दुखी हुए हैं। राम, सीता और लक्ष्मण को बुलाते हुए वह धरती पर गिर गए भार से भरे हुए। देखते हुए दक्षिण की ओर, वह घोड़े बिना अशोक वन के माध्यम से आए हुए पक्षी की भाँति उन वृक्षों में अश्रुपूर्ण बिहगों को देखते हुए थे।"
दोहा-
नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।
इसमें बताया गया है कि निषाद समुदाय के लोग, जो अपनी गरीबी और सामाजिक स्थिति के कारण अत्यंत चिंतित हैं, भगवान राम को देखकर अत्यंत आनंदित और आश्चर्यचकित हो रहे हैं। इससे यह भावना प्रकट होती है कि भगवान की प्रतीक्षा उनके लिए बड़ी ही उत्कृष्ट और आनंदमयी है।
चौपाई
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।
तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता
बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।।
सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।।
चरफराहिँ मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।।
अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।
जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।।
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।
इन चौपाईयों का अर्थ है:

"धीरज और संयम से निषादों से कहो, अब सुमंत्र को छोड़ दो, वह दुखी है। तुम पंडित हो, परमार्थ को जानते हो, धीरज से देखो, मुझे विरोधी नहीं दिखते। वह बहुत सी कथाएं कहकर मृदु बोली कर रहा है, लेकिन उसकी बातों से रथ वापस नहीं आ रहा है। दुःख और विचलितता से रथ स्थिर नहीं हो पा रहा है, राम के वियोग से पीड़ा उसके हृदय में बाकी है। वह चरों ओर घूमता है, किंतु घोड़ा नहीं चलता, वह जंगली पशु की तरह रथ को जोड़ता है। उसने फिर से पीछे देखा, लेकिन राम के वियोग में दुःख उसके हृदय को जला रहा है। वह जो कहता है, 'राम, लक्ष्मण और सीता', वही उसको दुःख दे रहा है। बिरह के वीणा की धुन कहाँ जा सकती है? जैसे की बिना मन के फूंक बिखरता है।"
यह चौपाई व्याकुलता और दुःख की स्थिति को व्यक्त करता है, जहां निषाद समुदाय का प्रतीक्षा और उम्मीद से भरा हृदय भगवान राम के वियोग में दुखित हो रहा है।
दोहा-
भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।
इसका अर्थ है:

"निषाद दुखी होकर बैठा था, तब सचिव ने उसको देखा। सारथी (रथ चालक) ने तब उस सेवक के चारों ओर देखा और उसके संग बोलने का मौका दिया।"
इस दोहे में दर्शाया गया है कि निषाद समुदाय के एक सचिव ने उनकी दुःखभरी स्थिति को देखा और उनकी सेवा करने वाले सारथी को इस समस्या को समझने के लिए अवसर दिया।
चौपाई
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।
चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।।
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।।
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।
भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।।
अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।।
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।।
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।
इन चौपाईयों का अर्थ है:

"गुह ने सारथी को फिरकर लाया और उसको बिरह और दुख की कहानी नहीं बताई। निषाद अवधी की ओर चलते हुए वाहन पर, उसे अपनी विचलितता में डूबा हुआ दिखाई देता है। सुमंत्र ने दुखी देखकर सोचा, 'राम बिना जीवन विहीन हो गया है। वे अधम शरीर में रह रहे हैं, जिन्हें राम को छोड़कर बिछुड़ने की आशा नहीं है। अब तक वे अजस अघ राम को नहीं पाए हैं, इसके लिए वे क्यों प्राणों का त्याग नहीं करते? अब तक उनके मन में अनुभव नहीं हुआ है, उनके हृदय में दो-टुकड़ी की भी आशा नहीं है। वे अपने हाथ से अपना सिर पीछे करके पछताते हैं, उनके मन में दु:खदायी धन को गंवाना पड़ा है। वे बिरादरी को संबोधित करके कहते हैं, 'चलो, हम संग्राम के लिए दूसरों के देश में जाते हैं।'"
यह दोहे निषाद जाति के एक सचिव गुह और सारथी के मध्य बिरह और दुःख की बात को दर्शाते हैं। यह उनकी चिंता और विचारों को बताते हैं, जो भगवान राम के वियोग में उनके मन में हैं।
दोहा-
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।
इस दोहे का अर्थ है:

"जैसे विद्वान, विचारी, वेदों को जानने वाले, साधुजन और सुजाति के लोग, वे सचिव की तरह ही धोखा देने वालों को सोचते हैं।"
यह दोहा बताता है कि समझदार और विवेकी लोग, जो वेदों को समझते हैं और धार्मिक तथा नैतिक मूल्यों को समझते हैं, वे सचिव की तरह ही उसकी सोच और कार्यशैली को समझते हैं, जैसे कि वे धोखा देने वालों को समझते हैं। इससे साफ होता है कि वे धोखा देने वालों की चालाकी और नीति को समझते हैं और उससे सावधान रहते हैं।
चौपाई
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।
रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।।
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।।
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।
बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।।
राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।
इसका अर्थ है:

"जैसे साधु, कुलीन और बुद्धिमान पक्षी जैसे उत्तम तीतर, पतिदेवता की भावना से काम करता है। कर्म अपने कदमों में है, उसे छोड़कर कुछ नहीं होता, लेकिन धोखा देने वाले सचिव की चालाकी मन को दहला देती है। उसके लोचन से भी अंधकार छा गया, उसके श्रवण से भी मानसिकता में अंधकार हो गया। उसके होंठों में सूखा महसूस हो रहा है, जैसे कि उसके दिल में अवधि का कपाट हो गया है। वह भय से नहीं जा सकता है, उसे देखने में जो उदासीनता होती है, वह मेरे मन को दुःखित करती है। उसकी बुरी सोचने से मन व्याप्त हो जाता है, जैसे कि वह पापी जमपुरी यात्रा की सोच में है। वह अपने बोले नहीं और दिल को पछताता है, और सोचता है, 'अब मैं अवध कैसे जा सकता हूँ?' जो रथ भगवान राम के बिना हो, वही मुझे देखने को प्रिय लगता है, और मुझे उसकी तलाश होती है।"
यहाँ इस चौपाई में अवधि, असत्य, और धोखेबाजी की चालाकी की चर्चा है, जो किसी को अंधकार में ले जाती है और उसकी आत्मा को प्रभावित करती है। इसमें भगवान राम की खोज की तीव्र इच्छा और उनके बिना उन्हें पाने की बेताबी का वर्णन किया गया है।
दोहा-
धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
इस दोहे का अर्थ है:

"जब नगर में पुरुष और स्त्री मुझसे मेरे बारे में पूछते हैं, तब मैं सबके सामने उनके हृदय को वज्र की भाँति देखता हूँ और जा बैठता हूँ।"
इस दोहे में व्यक्त किया गया है कि जब लोग मोहि (वहाँ भगवान) के बारे में पूछते हैं, तब उनके हृदय का स्थिति उनके सामने प्रकट हो जाता है और वह शांति से बैठ जाते हैं।
चौपाई
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।
पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।।
राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।।
पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।।
जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।।
पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।।
देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।।
सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।
इसका अर्थ है:

"सब दीन और दुखी माताएं मुझसे पूछती हैं, 'मैं उनको कैसे समझाऊं?' जब महतारी सीता मुझसे पूछती हैं, 'मुझे कौनसा संदेश सुख देगा?' जब राम की जननी सीता धारा को लाती हैं, तो मैं उसे वैसे ही याद करता हूँ जैसे गाय अपने बच्चे को याद करती है। जब कोई पूछता है कि 'भवानी सीता, राम, और लक्ष्मण कहाँ गए हैं?' तो उत्तर मिलता है कि 'राम और लक्ष्मण गए हैं, जाइये, अवध में अब वह सुख लेंगे।' जब जन्माष्टमी के दिन दीन-दुखित लोग पूछते हैं कि 'जीवन कैसे है जिसका प्रभु राम अधीन हैं?' तो उत्तर मिलता है कि 'मैंने किसे भेजा है, कुसल कुअंवर को जो पहुँचाया जा सके।' सुनते ही सीता और राम संदेश भेजते हैं, मनुष्य तन को त्यागकर वे नरेश्वर में ही अनुराग पूर्ण हो जाते हैं।"
यहाँ प्रस्तुत चौपाई में सीता और राम के संदेश का वर्णन है, जो जीवन में सार्थकता और धर्म के प्रति प्रेरणा देते हैं।
दोहा-
ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
इस दोहे का अर्थ है:

"मेरा ह्रदय प्रियतम से जैसे पानी की तरह जुड़ा हुआ है, वैसे ही जैसे कि प्रीतम से बिछुड़ते हुए मुद्दा पानी। मैं समझता हूँ कि मेरा दीन होने का यह स्थान शरीर को जानते हुए भी है।"
चौपाई
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।
बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।
पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।
बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।
नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।
इसका अर्थ है:

"इस प्रकार पथ पर चलकर पश्चाताप किया, तमसा के तीर से तुरंत रथ आया। निषाद ने विदाई की बिनती की, फिर पैरों में बिछुड़ने का बड़ा विषाद हुआ। सचिव ने नगर को भेजा, गुरु को बुलाया, उन्होंने राजा को मारा गाना। वे बिटप पर बैठे रहे दिन का समय गवा दिया, शाम के समय में तब मौका पाया। अंधकार में अयोध्या में प्रवेश किया, घर को दरवाजे पर रखकर रथ को। जिनको जो समाचार मिला, वे भूपति द्वार पर रथ देखने आए। रथ को पहचान कर विचारा, उसमें घोड़े को देखकर विचारा, नगर में स्त्री और पुरुष बहुत उत्साहित थे, जैसे जल के मीने तालाब में।"
यह चौपाई रामायण में राम के अयोध्या प्रवेश की सूचना देती है, जब वह अंधकार में अयोध्या में पहुंचते हैं। यहाँ लोगों के उत्साह और अविचलितता का वर्णन है जो उनके आगमन के समय था।
दोहा-
सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
इस दोहे का अर्थ है:

"सचिव के आगमन की सूचना सुनकर सभी लोग बहुत उत्तेजित हो गए, घर में भयंकर भय फैल गया, जैसे प्रेत का निवास हो।"
चौपाई
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।
सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।।
दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।।
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।।
आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।।
लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।।
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।।
राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।
इस चौपाई में कहा गया है:

"रानी के आत्मा में बहुत व्याकुलता थी, लेकिन वह किसी भी रूप में नहीं आई। वह न सुन पाई, न अपने कानों और आंखों से जान पाई, और न ही किसी नेता को स्थिति समझा सकी। दासियों ने सचिव को देखा और कौसल्या के घर ले आए। सुमंत्र ने राजा को देखा, वे चंदन बिना अधर्मिता महसूस कर रहे थे। उनकी आसन सजीवनी और उनके शयन का अभाव था, वे भूमि पर निपट रहे थे। इस प्रकार वह सोच रही थी, सुर्यलोक से उनका समय जा रहा था। वे अपनी सोच में इतने भर गईं कि उनका हृदय धड़कने लगा, उनके जनु के पंख फैलने लगे। 'राम राम' कहती रही, 'राम' को पुनः लखन बताती रही।"
दोहा-
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।
इस दोहे में व्यक्त किया गया है:
"राजा ने सचिव को देखकर उससे जय जीव कहकर उसका आदर किया। उसको सुनते ही राजा बेहद उत्तेजित हो उठे और सुमंत्र से पूछा, 'राम कहाँ है?'"
चौपाई
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।
सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।।
राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।।
आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।
सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।।
राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।
राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।।
सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।
इस चौपाई में बताया गया है:

"राजा सुमंत्र को अपने उर में लेकर उसने धीरे-धीरे बात कही। सचिव को सहित निकट बिठाया और राजा ने पूछा, अपने नयनों से उससे धीरे-धीरे। 'सखा, कैसे हैं राम और लक्ष्मण? कहाँ हैं राघव और सीता?' सचिव ने फिर से प्रश्न किया, 'राजा, कैसे हैं राम, लक्ष्मण और सीता?' राम का स्वरूप, गुण, और उनकी शील बहुत सुंदर हैं। मैं बार-बार उनकी स्मृति में लिप्त रहता हूँ।' राजा ने उससे बनवास के दुख को सुना लिया। सुनकर मन में हर्ष नहीं हुआ, बल्कि दुःख हुआ। उस सुता के बिछूड़ने से प्राण नहीं गए, कौन है जो मुझे इस तरह मोहित करता है।"
दोहा-
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।
इस दोहे में कहा गया है:

"सखा, जहाँ भी राम, सीता और लक्ष्मण हैं, वहाँ मुझे पहुंचा दो, मैं नहीं चाहता कि अब यहाँ रहूं, प्राणों को समर्पित करता हूं।"
चौपाई
पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।
सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।
बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।
जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।
काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।
इस चौपाई में कहा गया है:

"मैं बार-बार सचिव से पूछता हूं, जो प्रियतम संदेश सुनाए, वही सखा जल्दी से मेरा संदेश ले जा, राम, लक्ष्मण, सीता को नयन से देखा दे। सचिव, धीरे से मेरी बात सुनो, महाराज, आप पंडित हैं, ज्ञानी हैं। बीर, सुधीर, धुरंधर देव, आप सदा साधु समाज की सेवा करते हैं। जन्म-मरण में सभी दुःखों को झेलना पड़ेगा, प्रिय का मिलन और बिछड़ना होगा। काल और कर्म से होता है जो कुछ होना है, बस रात और दिन की तरह वही रहता है। सुख, हर्ष, दुःख, बिलकुल विपरीत होते हैं, दोनों को धीरे से स्वीकार करो और सभी का भला करो।"
दोहा-
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।
न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।
इस दोहे का अर्थ है:

प्रथम बासु, अर्थात सूर्य, तमसा, अर्थात अंधकार से डरा हुआ था, और दूसरे सुरसरि, अर्थात सुन्दर नदी से बहुत था। वह दोनों भाई जलपान करने के लिए नहा रहे थे और सीता समेत दोनों बीर, अर्थात श्रीराम और लक्ष्मण, मिलकर सजग रह रहे थे।
इस दोहे में सूर्य और नदी का संगम एक चित्र है, जिससे यह सिद्ध होता है कि सत्य और सौंदर्य से भरपूर जीवन हमेशा सुरक्षित रहता है। यह भक्ति और नैतिकता की बातें बताने वाला एक धार्मिक दोहा है।


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