रघुपति जीते, भक्ति सुरेश्वर।

रघुपति जीते, भक्ति सुरेश्वर। Raghupati won, Bhakti Sureshwar won.

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥345

यह श्लोक तुलसीदास जी के महाकाव्य "रामचरितमानस" से है, जिसे आमतौर पर रामायण के रूप में जाना जाता है। यह श्लोक हिंदी साहित्य में भक्ति और प्रेम का अद्वितीय रूप में माना जाता है।
इस श्लोक का अर्थ है:
"जहाँ भी देखो, वहां रघुपति (श्रीराम) विजयी हैं। सभी देवताएँ और सुरेश्वर (भगवान) सब मिलकर उनकी सेवा करते हैं॥
जो इस संसार में चराचर जीवों को देखता है, वह देखता है कि वह सभी विभिन्न प्रकारों में हैं॥"
यह श्लोक भक्ति और निष्काम कर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को उजागर करता है और भगवान श्रीराम के महत्वपूर्णता को सार्थक बनाता है।

पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥346

यह भी एक अद्भुत श्लोक है, जो तुलसीदास जी के "रामचरितमानस" से है। इसका अर्थ है:
"हे देव, जो भगवान हैं, उन्हें बहुतेरे रूपों में पूजना कितना ही भला क्यों न हो, पर राम रूप को देखकर कुछ भी अन्य रूप मुझे प्रिय नहीं लगते॥
रघुपति श्रीराम और सीता महारानी को देखने में मैंने किसी भी बहुरूपता में ऐसा सुंदर और श्रेष्ठ नहीं देखा है॥"
यह श्लोक भक्ति और निष्काम कर्म के माध्यम से दिखाता है कि भगवान के सब रूपों की पूजा की जा सकती है, लेकिन भगवान राम के रूप में देवता को देखना अद्वितीय और अत्यंत प्रिय है।

सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता॥
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥ 347

यह भी एक श्लोक है जो तुलसीदास जी के "रामचरितमानस" से है। इसका अर्थ है:
"वही रघुकुलनाथ (श्रीराम), वही लक्ष्मण और सीता हैं। सभी लोग उन्हें देखकर बहुत आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥
मेरा ह्रदय कांपता है, तन शरीर में कोई शान्ति नहीं है। मेरी आत्मा उन्हें देखकर उत्कृष्ट हो जाती है, और मेरी आँखें आनंद से मूड़ी हुई बैठी हैं॥"
यह श्लोक भक्ति भावना और दैहिक अनुभूति के माध्यम से श्रीराम, लक्ष्मण, और सीता के अद्वितीय और अत्यंत प्रेम को व्यक्त करता है। श्रीराम की दिव्यता और उनके दर्शन से भक्त का ह्रदय भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और आनंद से भरा होता है।

बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥348

यह भी एक श्लोक है जो तुलसीदास जी के "रामचरितमानस" से है। इसका अर्थ है:
"बार-बार देखने के लिए नयन बिछाए हैं, लेकिन वहां दच्छकुमारी (सीता माता) कुछ भी दिखाई नहीं देती हैं॥
बार-बार श्रीराम के पादों में शीश झुकाता हूँ, वहां जाकर रहते हैं जिनका नाम गिरीसा (शंकर भगवान शिव) है॥"
इस श्लोक में भक्त की प्रेम भावना और दिव्य दर्शन की अभीष्टता को व्यक्त किया गया है। सीता माता को बार-बार देखने की इच्छा और श्रीराम के पादों में शीश झुकाने की प्रार्थना से यह श्लोक भक्ति भावना से भरा हुआ है। भक्त बार-बार दिव्य दर्शन का अनुभव करने के लिए आत्म-समर्पण और निष्काम प्रेम की भावना के साथ प्रयासरत है।

बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥349

यह श्लोक भी तुलसीदास जी के "रामचरितमानस" से है और पहले श्लोक के आगे का भाग है। इसका अर्थ है:
"बार-बार नयनों से देखने की कोशिश करता हूँ, लेकिन वहां दच्छकुमारी (सीता माता) कुछ भी दिखाई नहीं देती हैं॥
फिर फिर श्रीराम के पादों में शीश झुकाता हूँ, और वहीं जाकर रहते हैं जहां गिरीसा (भगवान शिव) विराजमान हैं॥"
यह श्लोक भक्त की प्रेम भावना को और भी स्पष्टता के साथ दिखाता है। भक्त बार-बार चाहता है कि उसकी दृष्टि में सीता माता हो, लेकिन वहां वह कुछ देख नहीं पा रहा है। इसके बाद, वह बार-बार श्रीराम के पादों में शीश झुकाने का प्रयास करता है और अन्त में वह वहीं चला जाता है जहां भगवान शिव (गिरीसा) विराजमान हैं। इस श्लोक से भक्ति, विनम्रता, और प्रेम की भावना सुस्पष्ट रूप से प्रकट होती है।

गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥ 350

यह दोहा तुलसीदासजी की रचना से है। इसमें समीप महेस और लीन्हि दोनों ही व्यक्तियों के बीच एक संवाद दिखाया गया है। इसमें समीप महेस पूछ रहे हैं कि परीक्षा की सच्चाई कैसे बताई जा सकती है। लीन्हि उन्हें बता रहे हैं कि सच्चाई हमेशा एक सादे और सत्य तरीके से बताई जानी चाहिए।


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