प्रलयकर्ता का वर्णन,सृष्टि आरंभ का वर्णन,Description of the destroyer, description of the beginning of creation

प्रलयकर्ता का वर्णन,सृष्टि आरंभ का वर्णन

प्रलयकर्ता का वर्णन

वायुदेव बोले- ऋषिगण! सबसे पहले परब्रह्म से शक्ति उत्पन्न हुई। वह शक्ति माया कहलाई और उससे ही प्रकृति पैदा हुई। भगवान शिव की ही प्रेरणा से यह सृष्टि उत्पन्न हुई। इस सृष्टि की उत्पत्ति अनुलोम और वृतिलोम से इसका नाश होता है। यह जगत पांच कलाओं से पूर्ण एवं अप्रकट कारण रूप है। इसके मध्य में आत्मा अनुष्ठित है। त्रिलोकीनाथ देवाधिदेव महादेव शिव ही सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर और अनंत हैं। वे सदाशिव ही सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं। सृष्टि के आरंभ से समाप्त होने तक ब्रह्माजी के सौ वर्ष पूरे होते हैं। ब्रह्माजी की आयु के दो भाग प्रथम परिद्ध और द्वितीय परिद्ध हैं। इनकी समाप्ति पर ब्रह्माजी की आयु पूरी हो जाती है। उस समय अव्यक्त आत्मा अपने मध्य कार्य को ग्रहण कर लेती है। अव्यक्त में समावेश होने पर उत्पन्न विकार का संहार करने के लिए प्रधान तथा पुरुष धर्म सहित रहते हैं। सत्वगुण एवं तर्मागुण से ओत-प्रोत दोनों प्रकृति पुरुष व्याप्त हैं। जब ये दोनों गुणों में समान हो जाते हैं तो अंधकार के कारण अलग नहीं हो पाते। तब शांत वायु द्वारा निश्चल होता है। अद्वितीय रूपधारी महेश्वर अपनी माहेश्वर रूप रात्रि का सेवन करते हैं। प्रातः काल में महेश्वर अपनी योग शक्ति द्वारा प्रकृति पुरुष में प्रविष्ट हो जाते है। तब वे दोनों में क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं तब उनकी आज्ञा से चराचर जगत में सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
शिव पुराण श्री वायवीय संहिता (पूर्वार्द्ध) नवा अध्याय

सृष्टि रचना वर्णन

सर्वप्रथम ईश्वर की प्रेरणा से पुरुष रूप में अधिष्ठित अव्यक्त, बुद्धि व विकार उत्पन्न हुए। उसके पश्चात सर्वरूप रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा नामक तीन देवताओं की उत्पत्ति हुई। इनका मुख्य कार्य सृष्टि का सृजन पालन और संहार है। ये ईश्वरत्व युक्त हैं। एक कल्प समाप्त होने पर जब दूसरा कल्प आरंभ हुआ तब सर्वेश्वर शिव ने सबको सृष्टि के कार्य सौंपे। ये तीनों देवता एक-दूसरे से पैदा होकर एक-दूसरे को धारण करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र एक-दूसरे का अनुसरण एवं प्रशंसा करते हैं। प्रधान से प्रथम वृद्धि, ख्याति, बुद्धि एवं महत्व पैदा हुए। क्षोभ से तीन प्रकार के अहंकार उत्पन्न हुए। अहंकार से पांच महाभूत तन्मात्रा इंद्रियां पैदा हुई। सत्वगुण से सात्विक तत्व की उत्पत्ति हुई। तमोगुण अहंकार पांच महाभूत पंचतन्मात्रा से उत्पन्न ग्यारहवां मन गुण से दो प्रकार का होता है। प्राणियों में दो प्रकार के गुण होते हैं। समस्त प्राणियों में आदि भूत होता है। उससे आकाश व आकाश से स्पर्श गुण को उत्पत्ति होती है। स्पर्श गुण से वायु, वायु से रूप गुण, रूप से तेज, तेज से रस गुण, रस से गंध गुण व गंध से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है। फिर इन पंचमहाभूतों से सारा संसार निर्मित होता है। महदादिक से एक विशेष अंड की उत्पत्ति होती है। तब ब्रह्म उस अंड में वृद्धि पाकर ब्रह्मा नाम से क्षेत्रज्ञ हो जाता है। यही सर्वप्रथम शरीरधारी पुरुष है। ये तीनों गुणों को अपने अधीन रखते हैं। इन्हीं तीन गुणों के कारण वे अपने शरीर के तीन विभाग कर देते हैं। सृष्टि कार्य में ब्रह्मा, पालन में विष्णु एवं संहार कार्य में रुद्र कार्य करते हैं। उस विराट नायक का गर्भ बंधन सुमेरु पर्वत से होता है। समुद्र का जल उसका गर्भाशय है एवं इस अंड में लोक निवास करते हैं। इन लोकों में सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, वायु का निवास है। जल इस अंडे को ढक कर रखता है। जल से दस गुना तेज, तेज से दस गुना वायु, वायु से दस गुना आकाश उस आदिभूत को ढककर रखता है। फिर महतत्वादि, महतत्वादि को प्रकृति चारों ओर से ढके रहती है। इन सात आवरणों में अंड रहता है। इस प्रकार ये आठ प्रकृतियां हैं। अव्यक्त द्वारा ही संपूर्ण संसार निर्मित हुआ है और उसी में विलय भी हो जाता है। काल के अधीन गुण भी सम और विषम होते हैं। गुणों की कमी अथवा विशेषता होने पर सृष्टि की रचना होती है और इनका समानत्व होने पर प्रलय हो जाता है। ब्रह्मा की यही योनि है और यह अंड ही ब्रह्मा का निश्चयात्मक क्षेत्र है। प्रकृति सर्वगामिनी है जिसमें सहस अंड रहते हैं उन अंडों में चतुर्मुख विष्णु, ब्रह्मा एवं रुद्र को प्रकृति रचती है। ये तीनों शिवजी की समीपता पाकर स्थिर रहते हैं। व्यक्त से अव्यक्त, अव्यक्त से अंड और अंड से ब्रह्मा उत्पन्न होकर संपूर्ण लोक की रचना करते हैं। सृष्टि की रचना और प्रलय काल में उसका नाश तो परमेश्वर की लीला है।
शिव पुराण श्री वायवीय संहिता (पूर्वार्द्ध) दसवां अध्याय

सृष्टि आरंभ का वर्णन

ऋषिगण बोले- हे वायुदेव! अब आप हम पर कृपा करके हमें मन्वंतर कल्प व प्रति सर्ग के बारे में बताइए । ऋषिगणों की प्रार्थना सुनकर वायुदेव बोले- सर्वप्रथम ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं और उनके एक दिन में चौदह मन्वंतर पूरे हो जाते हैं। मन्वंतर असंख्य हैं। इस समय वराह कल्प है जिसमें चौदह मन्वंतर हैं। इनमें सात को स्वायंभुव और सात को सावर्णिक नाम से जाना जाता है। प्रथम कल्प की समाप्ति पर बहुत प्रलयकारी भयंकर हवा चली जिसने वृक्षों को उनके स्थानों से उखाड़ फेंका। उस समय तीनों देवताओं के बीच में अग्नि देवता प्रकट हुए। उन्होंने अग्नि से सबकुछ जला दिया। तत्पश्चात जले हुए पृथ्वी के भाग को वर्षा के जल में डुबो दिया। जब ब्रह्माजी ने देखा कि संसार पानी में डूब गया है और संपूर्ण ब्रह्माण्ड नष्ट हो गया है। चारों ओर अथाह जल दिखाई पड़ रहा है। तब वे भी सुखपूर्वक जल में सो गए। जब सृष्टि का आदिकाल होता है, उस समय श्रुतियां ईश्वर को जगाती हैं। तब योगनिद्रा में सोते हुए विदिशाधिपति ब्रह्मा रूप परमेश्वर शिव की सब देवता हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए उनसे जागने की प्रार्थना करते हैं। उस समय सबकी प्रार्थना और स्तुति से जागकर परमेश्वर ने योगनिद्रा का त्याग किया और जल शय्या पर बैठकर चारों ओर देखने लगे। जब उन्हें पृथ्वी के जल में डूबने के बारे में ज्ञात हुआ तब उन्होंने वराह रूप का स्मरण किया। फिर वराह रूप धारण करके उन्होंने समुद्र को झकझोरा और पृथ्वी को वापस लाने के लिए जल के बीच से अंदर चले गए। यह देखकर प्रसन्न देवता उन पर फूलों की वर्षा करने लगे।
शिव पुराण श्री वायवीय संहिता (पूर्वार्द्ध) ग्यारहवां अध्याय

सृष्टि वर्णन

वायुदेव बोले- हे ऋषिगण! ब्रह्माजी को सृष्टि की चिंता हुई और तपोमय मोह पैदा होने से अंधेरा छा गया। उस समय आत्मा वाली सृष्टि पैदा हुई। पर ऐसी सृष्टि देखकर ब्रह्माजी व्याकुल हो गए और उन्होंने दूसरी सृष्टि की रचना की। यह सृष्टि पक्षियों की थी और पैदा होते ही कुमार्ग पर पड़ गई। तब ब्रह्माजी ने तीसरी बार सात्विक अर्थात देवताओं की सृष्टि की रचना की परंतु इस सृष्टि से भी ब्रह्माजी को संतोष नहीं हुआ तब उन्होंने मानव सृष्टि का निर्माण किया। यह सृष्टि सुंदर और रजोगुण वाली थी। ब्रह्माजी द्वारा रचित प्रथम सृष्टि महत, दूसरी भूत सृष्टि, तीसरी वैकारिक इंद्रिय प्राकृतिक सृष्टि कहलाई। चौथी सृष्टि मुख्य, पांचवीं वक्र स्रोत, छठी ऊर्ध्व स्रोत से देव सृष्टि, सातवीं मानव सृष्टि, आठवीं सृष्टि अनुग्रह वाली, नौवीं कुमार सृष्टि कहलाई। सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार तथा ऋभु मानस पुत्र पैदा किए। ये सभी योगमार्ग गामी हुए। इस प्रकार, जब सृष्टि की वृद्धि न हुई तब दुखी होकर ब्रह्माजी ने तपस्या करनी आरंभ कर दी परंतु जब बहुत समय बीत जाने पर भी कोई फल न मिला तब ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोधाधिक्य के कारण उनकी आंखों में आंसू आ गए, जिससे भूत-प्रेत पैदा होने लगे। यह सब देखकर दुखी ब्रह्माजी ने देह त्याग दी। तब ब्रह्माजी को प्रसन्न करने हेतु भगवान रुद्र उनके मुख से पैदा हुए। भगवान रुद्र ने अपने शरीर से ग्यारह स्वरूप पैदा कर दिए और उन्हें प्रजा रचने की आज्ञा दी। यह सुनकर सभी रुद्र रोते हुए वहां से भागने लगे। तत्पश्चात महेश्वर ने ब्रह्माजी को पुनर्जीवित कर दिया। ब्रह्माजी ने रुद्र से प्रश्न पूछा कि आप कौन हैं? तब रुद्र बोले- मैं ही परमब्रह्म परमेश्वर हूं और तुम्हारी इस सृष्टि में तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्मा हूँ। अब आप अपनी इस सृष्टि की रचना को पूर्ण कीजिए। यह सुनकर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए, वे शिव नामाएक का जाप करते हुए रुद्र की स्तुति करने लगे और प्रार्थना करने लगे कि सृष्टि निर्माण के कार्य में आप मेरे सहायक बनें। जब रुद्रदेव ने अपनी सहमति दे दी तब ब्रह्माजी ने अपने मन में मरीचि आदि बारह पुत्र पैदा किए। इनमें देवताओं और क्रियात्मक महर्षियों के बारह वंश मिले। तत्पश्चात ब्रह्मा के मुख से देवता, गले से पितर जांचों से दैत्य, गर्भ से मानव, उपस्थेंद्रिय से राक्षस पैदा हुए। ये निशाचर राक्षस बलवान थे। फिर यज्ञ, भूत और गंधर्व की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी की दोनों काखों से पक्षी, वृक्ष से अन्य पक्षी, मुख से बकरी, पांव से घोड़े, हाथी, शलभ, मृग, ऊंट, खच्चर, नेवले आदि ने जन्म लिया। ब्रह्माजी के पूर्व मुख से गायत्री, दक्षिण मुख से यजुर्वेद, पश्चिम मुख से सामवेद, उत्तर मुख से अथर्ववेद की उत्पत्ति हुई। फिर देह द्वारा इनके अनेक भेद हो गए और ये अपने काम में लग गए। सब अपने कर्मों के अनुसार जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़कर फल भोगने लगे। सभी प्राणियों के कर्मों के अनुसार उन्हें सुख, दुख, धन, आय-व्यय, संपत्ति आदि की प्राप्ति होती है। युग एवं समय के अनुसार ही प्राणियों के गुण, कर्म व स्वभाव होते हैं।
शिव पुराण श्री वायवीय संहिता (पूर्वार्द्ध) बारहवां अध्याय

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