नरक में गिराने वाले पापों का वर्णन,नरक की अट्ठाईस कोटियां ,Description of the sins that bring one to hell, twenty-eight degrees of hell

नरक में गिराने वाले पापों का वर्णन,नरक की अट्ठाईस कोटियां

व्यास जी बोले- हे मुनीश्वर ! इस संसार में पाप कर्म करने वाले पापी मनुष्य सदा नरक के भागी होते हैं। ऐसे नरक जाने वाले प्राणियों के विषय में मुझे बताइए । व्यास जी के वचन सुनकर सनत्कुमार जी बोले- हे व्यास जी ! इस संसार में अनेक प्रकार के पाप कर्म होते हैं, जिनके कारण मनुष्य को नरक जाना पड़ता है। परस्त्री की इच्छा, पराया धन पाने की इच्छा, दूसरों का बुरा सोचना, अधर्म करना, ये सब मन के पाप होते हैं। इसी प्रकार झूठ बोलना, कठोर बोलना, दूसरों की चुगली करना, ये वाणी द्वारा किए गए पाप कर्म होते हैं। अभक्ष भक्षण करना, हिंसा करना, असत्य कार्य करना एवं किसी का धन वस्तु हड़प लेना, ये सभी शारीरिक पाप कहे जाते हैं और इनका फल बहुत भयानक होता है। अपने गुरु अथवा माता- पिता की निंदा करने वाले महापापी नरक में जाते हैं। यही नहीं, ब्राह्मणों को कष्ट देना, शिव ग्रंथों को नष्ट करना भी महापाप माना जाता है। जो मनुष्य भगवान शिव की स्तुति एवं पूजन नहीं करते और न ही शिवलिंग को नमस्कार करते हैं, वे भी नरक के भागी होते हैं। बिना गुरु की पूजा के शास्त्रों को सुनने की कोशिश करने वाले, गुरु सेवा से जी चुराने वाले, गुरु त्यागी एवं गुरु का अपमान करने वाले, नरकगामी होते हैं। ब्रह्म हत्या करने, मद्यपान करने, गुरु के स्थान पर बैठने तथा गुरुमाता को कुदृष्टि से देखने वाले नरक में जाने योग्य ही होते हैं। वेदों की जानकारी रखने वाले एवं पूजन-आराधन को त्याग देने वाले, दूसरों की अमानत को हड़पने वाले तथा चोरी करने वाले, सभी मनुष्यों को अवश्य ही नरक में रहना पड़ता है। परस्त्री का भोग करने वाले अथवा व्यभिचार करने वाले मनुष्य अवश्य ही नरक में जाते हैं। यही नहीं, पुरुष, स्त्री, हाथी, घोड़ा, गाय, पृथ्वी, चांदी, वस्त्र, औषध, रस, चंदन, अगर, कपूर, पट्टे, कस्तूरी आदि को अकारण ही बेच देने वाले मूर्ख मनुष्यों को नरक अवश्य भोगना पड़ता है। है मुनियो, इस प्रकार मैंने आपसे ऐसे कृत्यों का वर्णन किया, जो कि महापाप माने जाते हैं और जिनके कारण मनुष्य को नरक की घोर कष्टदायक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता  पांचवां अध्याय

पाप-पुण्य वर्णन

सनत्कुमार जी बोले- हे व्यास जी! किसी भी बात पर घमंड या अभिमान करना, क्रोध, कपट व साधुओं से द्वेष रखना, किसी अन्य पर अकारण कलंक लगाना, शिवालय के वृक्ष और बगीचे में लगे पेड़ के फल, फूल, टहनियां तोड़ना एवं हरियाली को उजाड़ने वाले, किसी के धन को लूटने वाले अथवा किसी के धन-धान्य या पशुओं को चुराने वाले, जल को अपवित्र करने वाले, स्त्री या पुत्र को बेचने वाले, अपनी स्त्री की रक्षा न करने वाले, दान न करने वाले, असत्य बोलने वाले, शास्त्रों के अनुसार कार्य न करने वाले, दूसरों की निंदा करने वाले, पितृयज्ञ व देव यज्ञ न करने वाले, व्यभिचार करने वाले एवं भगवान में आस्था न रखने वाले सभी मनुष्य पापी कहे जाते हैं। परस्त्री पर आसक्त होना, हिंसा करना, बांस, ईंट, लकड़ी, पटिया, सींग काल आदि से मार्ग रोककर दूसरों की सीमा हथिया लेना, पशुओं एवं नौकरों से बुरा व्यवहार करने वाले एवं उन्हें दण्ड देने वाले, भिखारियों को भिक्षा न देने वाले, भूखे को भोजन न देने वाले, शिव मूर्ति  को खण्डित करने वाले, गाय को मारने वाले, बूढ़े बैल कसाइयों को देने वाले, दीन, वृद्ध, दुर्बल, रोगी को सताने वाले, शरणागतों पर दया न करने वाले मूर्ख मनुष्य पाप के भागी होते हैं। अन्याय करने वाले राजा, ब्राह्मणों से कर वसूलने वाले, गरीबों से छीनकर धन एकत्रित करने वाले मनुष्य नरकगामी होते हैं। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के पश्चात भी बढ़ई, वैद्य, सुनार, शिल्प करने वाले, ध्वजा बनाने का कार्य करने वाले मनुष्य भी पापी होते हैं। जो किसी अन्य स्त्री को चुराकर अपने घर में रखते हैं, महापापी होते हैं। नीति के विपरीत व्यवहार करने वाले, घृत, तेल, अन्न, पेय, शहद, मांस, मद्य, कमण्डल, तांबा, सीसा, रांगा, हथियार, शंख आदि की चोरी करने वाले वैद्य वैष्णव नरकगामी होते हैं। पशु, पक्षी, मनुष्य, दानव आदि सभी पापियों को निश्चय ही यमराज के अधीन जाना पड़ता है। एक-दूसरे से असमानता का व्यवहार करने वाले दुष्ट, पापियों को दण्ड देने वाले सभी के शासक यमराज हैं और मरने के पश्चात मनुष्य को यातनाएं भोगनी ही पड़ती हैं। इसलिए मनुष्य को अपने जीवनकाल में ही अपने पापों का प्रायश्चित अवश्य कर लेना चाहिए। बिना प्रायश्चित किए पापों का नाश असंभव होता है। जो भी मनुष्य मन, वाणी और शरीर द्वारा जाने-अनजाने में पाप करता है, वह अपने दुष्कर्मों का फल अवश्य ही भोगता है।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता  छठवां अध्याय

नरक वर्णन

सनत्कुमार जी ने महामुनि वेद व्यास से कहा- हे महामुने! इस संसार में पाप करने वाले सभी मनुष्यों को यमलोक जाकर अपने पापों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। पुण्यात्मा जीव उत्तर दिशा के मार्ग से यमलोक जाते हैं, जबकि पापी मनुष्यों को दक्षिण दिशा की ओर से यमपुरी जाना पड़ता है। वैवस्वत नगर और यमपुरी के बीच की दूरी छियासी हजार योजन की है। धर्मात्मा मनुष्य, जो दयालु प्रवृत्ति के हैं, सुगम मार्ग से पहुंच जाते हैं जबकि पापियों को बड़े कठिन मार्ग से जाना पड़ता है। उनके रास्ते में नुकीले कांटे, गरम बालू व छुरियों जैसे नुकीले कंकण, कीचड़, सुइयां, अंगारे, लंबे अंधकारयुक्त वन, बर्फीले मार्ग, गंदा पानी, सिंह, भेड़िए, बाघ, मच्छर एवं अनेक तरह के जहरीले और भयंकर कीड़े, सांप, सूअर, भैंसे एवं अनेक भयानक जीव, भूत-प्रेत एवं डाकिनी शाकिनी उस पापी मनुष्य को रास्ते में कष्ट देने के लिए खड़े रहते हैं। वे पापी मनुष्य इतने भयानक रास्ते पर यमदूतों की मार सहते हुए आगे बढ़ते हैं। भूख- प्यास से व्याकुल नंगे शरीर वे यातनाएं सहते हुए रास्ते को तय करते हैं और पीड़ा की अधिकता के कारण रोते और चीखते-चिल्लाते हैं। उनके शरीर से खून बहता है और कीड़े उन्हें नोचते हैं परंतु यमदूत फिर भी उन्हें पाशों से बांधकर घसीटते रहते हैं। इस प्रकार अत्यंत कठिन मार्ग पर चलते हुए वे अपनी यमलोक तक की यात्रा को पूरा करते हैं। वहां पहुंचकर यमदुत उन पापी मनुष्यों को यमराज के सामने ले जाते हैं। यमलोक में यमराज उन मनुष्यों के पाप और पुण्यों का लेखा-जोखा देखते हैं। पुण्यात्माओं को यमराज प्रसन्नतापूर्वक उत्तम विमान में बैठाकर सादर स्वर्ग लोक भेज देते हैं परंतु यदि उन्होंने कुछ भी पाप किए होते हैं तो उन्हें उनका दण्ड अवश्य भोगना पड़ता हैं तथा अपने पापों को भोगने के पश्चात उन्हें यमदूतों द्वारा स्वर्ग भेज दिया जाता है। परंतु ऐसे मनुष्य, जो सदा ही पाप कर्मों में संलिप्त रहते हैं, को यमराज का बड़ा भयानक रूप देखने को मिलता है। यमराज भयंकर डाढ़ों वाले विकराल भौंहों वाले, अनेक भयानक अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए, अठारह हाथ वाले, काले भैंसे पर बैठे अग्नि के समान लाल आंखों वाले एवं प्रलय काल की अग्नि के समान तेजस्वी भयानक रूप धारण किए दिखाई देते हैं और पापियों को बड़े कठोर दण्ड देते हैं। तब भगवान चित्रगुप्त धर्मयुक्त वचनों से उन्हें समझाते हैं।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता सातवां अध्याय

नरक की अट्ठाईस कोटियां

सनत्कुमार जी बोले- हे महामुनि व्यास! जब यमदूत पापी मनुष्यों को लेकर यमलोक पहुंच जाते हैं तो वहां चित्रगुप्त पापियों को फटकारते हुए कहते हैं- पापियो ! तुम अपने जीवनकाल में सदा पाप कर्म करते रहे हो, अब उन पापों के फल भोगने का समय आ गया है। इसी प्रकार, पापी दुष्ट राजाओं को डांटते हुए वे कहते हैं कि राज्य का सुख मिलने पर तुम अपने को सर्वस्व मानने लगे और इसी घमंड में मदमस्त होकर तुमने अपनी प्रजा के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया और उन्हें अनेकों तरह के कष्ट तथा यातनाएं दीं। उन बुरे कर्मों। के पाप मैल के समान अब भी तुम्हारे शरीर से चिपके हुए हैं। तब यमदूत चण्ड एवं महाचण्ड उन पापी राजाओं को उठाकर गरम-गरम भट्टियों में फेंक देते हैं, ताकि पाप रूपी मैल जल जाए और फिर वहीं से उन पर वज्र का प्रहार करते हैं। इस प्रकार की यातना से उनके कानों से खून बहने लगता है और वे बेहोश हो जाते हैं। तब वायु का स्पर्श कराकर उन्हें पुनः होश में लाया जाता है, तत्पश्चात उन्हें नरक रूपी समुद्र में डाल दिया जाता है। पृथ्वी के नीचे नरक की सात कोटियां है, जो कि घोर अंधकार में स्थित हैं। इन सबकी अट्ठाईस कोटियां हैं। घोरा कोटि, सुघोरा कोटि, अति घोरा, महाघोरा, चोर रूपा, तलातला, मयाअका, कालरात्रि भयोत्तरा, चण्डा, महा चण्डा, चण्ड कोलाहला, प्रचण्ड, चण्ड नायका, पद्मा, पद्मावती, भीता, भीमा, भीषण नायका, कराला, विकराला, वज्रा, त्रिकोण, पंचकोश, सुदीर्घ, अखिलार्दित, सम भीम, सम लाभ, उग्र दीप्त प्रायः नामक ये अट्ठाईस नरक कोटि हैं, जो कि पापियों को यातना देने वाली हैं। इन नरक कोटियों का निर्माण पापियों को यातना देने के लिए ही किया गया है। इसके अतिरिक्त इन कोटियों के पांच नायक भी हैं। यही सौ रौरवप्राक एवं एक सौ चालीस महानरकों को महानरकमण्डल कहा जाता है।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता आठवां अध्याय

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