गृहपति अवतार ,गृहपति को शिवजी से वर प्राप्ति ,Grihapati Avatar Grihapati gets groom from Lord Shiva, Yajneshwar Avatar, Shiva Dashavatar

गृहपति अवतार ,गृहपति को शिवजी से वर प्राप्ति , यज्ञेश्वरअवतार,शिव दशावतार

गृहपति अवतार

नंदीश्वर बोले- जब विश्वानर भगवान शिव से वरदान प्राप्त करके अपने घर वापस आए तो उन्होंने अपनी पत्नी शुचिष्मती को सारी बातें बताईं। समय बीतता गया, कुछ समय पश्चात शुचिष्मती गर्भवती हुई। शुभ लग्नों का योग होने पर उनके गर्भ से चंद्रमा के समान मुख वाला सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। भगवान शिव के अवतार लेते ही देवताओं ने प्रसन्न होकर दुंदुभी बजाई। मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रुतु, अंगिरा, वशिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य, विभाण्ड, मंदल, लोमश, लोमचरण, भारद्वाज, गौतम, भृगु, गालव, गर्ग, जातकर्ण्य, हषाशर, आपस्तंब, याज्ञवल्क्य, यज्ञ, वाल्मीदिक, शतातप, लिखित शिलाद, शंख जमदग्नि, संवर्त, मतंग, भरत, अंशुमान व्यास, कात्यायन, कुत्स, शौनक, ऋष्यश्रंग, दुर्वासा, शुचि, नारद, तुंबरू, उत्तक, वामदेव, देवल, हारीत, विश्वामित्र, भार्गव, मृकण्ड, दारुक, धौम्य, उपमन्यु, वत्य आदि मुनि और मुनि कन्याएं और मुनि पुत्र भगवान शिव के गृहपति अवतार के दर्शनों हेतु विश्वानर मुनि के आश्रम में आए। देवगुरु बृहस्पति के साथ ब्रह्माजी और श्रीहरि विष्णु, नंदी और भृंगीगणों के साथ भगवान शिव देवी पार्वती को साथ लेकर, देवराज इंद्र सभी देवताओं सहित तथा नागराज पाताल से सारी नदियां, पर्वत और समुद्र उस बालक के दर्शनों के लिए विश्वानर के आश्रम में गए।  सभी ऋषि-मुनियों, साधु-संतों सहित देवताओं ने उस बालक के दर्शन किए। स्वयं ब्रह्माजी ने उस बालक के जात कर्म संस्कार संपन्न किए और उस बालक का नाम गृहपति रखा। तत्पश्चात सब देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक उस बालक को अनेक आशीर्वाद प्रदान किए। तब सब देवता शुचिष्मती और विश्वानर मुनि के भाग्य की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने धाम को चले गए। मुनि विश्वानर और उनकी पत्नी उस बालक का लालन-पालन करने लगे तथा समय-समय पर होने वाले संस्कार संपन्न करने लगे। गृहपति जब पांच वर्ष का हो गया तब उन्होंने उसका यज्ञोपवीत कराया। बालक गृहपति जिज्ञासु प्रवृत्ति का था । उसने अतिशीघ्र ही अपने पिता से सब वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। जब बालक नौ वर्ष का हुआ तो देवर्षि नारद उनके घर पधारे। मुनि विश्वानर ने उनसे अपने पुत्र के भाग्य के विषय में जानना चाहा। तब नारद जी बोले—मुनि! आपका पुत्र बड़ा भाग्यवान और वैभवशाली है परंतु बारह वर्ष का होने पर इसे अग्नि और बिजली से खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसलिए आपको अपने पुत्र को अग्नि और बिजली के करीब नहीं जाने देना चाहिए। ऐसे वचन कहकर देवर्षि नारद उस बालक को अपना आशीर्वाद देकर वहां से चले गए।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता  चौदहवां अध्याय 

गृहपति को शिवजी से वर प्राप्ति

नंदीश्वर बोले - हे महामुने! जब इस प्रकार की बातें बताकर देवर्षि नारद वहां से चले गए, तब उनके वचनों से देवी शुचिष्मती और विश्वानर को बहुत दुख पहुंचा और वे दोनों बड़े जोर-जोर से रोने लगे। शोक में रोते हुए वे दोनों मूर्च्छित हो गए। फिर पहले तो मुनि विश्वानर ने अपने को संभाला फिर अपनी पत्नी को समझाते हुए बोले- देवी इस प्रकार रोकर कुछ भी नहीं होगा। इसलिए तुम इस प्रकार रोना बंद करो। फिर वे दोनों अपने पुत्र गृहपति को ढूंढ़ने लगे। उस समय उनका पुत्र घर से बाहर था। जब वह वापस आया तो अपने माता-पिता को इस प्रकार रोता हुआ देखकर उनसे पूछने लगा कि आप इस प्रकार क्यों रो रहे हैं?  अपने पुत्र के इस प्रश्न को सुनकर देवी शुचिष्मती ने गृहपति को अपने गले से लगा लिया और रोते हुए ही उसने नारद जी द्वारा कही गई बातें कह दीं। यह सुनकर गृहपति तनिक भी विचलित नहीं हुआ और अपने माता-पिता को समझाने लगा कि आप इस प्रकार दुखी न हों। मैं मृत्यु विजयी शिव मंत्र को जपकर मृत्यु से अपनी रक्षा कर लूंगा। अपने पुत्र की साहसपूर्ण बातें सुनकर माता-पिता दोनों बहुत प्रसन्न हुए और बोले कि मृत्युंजय भगवान शिव की आराधना करने से अवश्य ही सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। अतः तुम उनकी शरण में जाओ, वे तुम्हारा कल्याण करेंगे। अपने माता-पिता से आशीर्वाद लेकर बालक गृहपति काशी चला गया। वहां उसने स्नान करने के पश्चात शिवलिंग के दर्शन किए। विश्वेश्वरलिंग का दर्शन करने के पश्चात उसे बहुत प्रसन्नता हुई और वह अपने को भाग्यशाली मानने लगा कि उसे प्रभु के दर्शन हो गए। तब उसने वहीं एक शिवलिंग स्थापित किया। वह प्रतिदिन उस लिंग को एक सौ आठ घड़ों में गंगाजल भरकर स्नान कराता था और फिर विधिपूर्वक उनकी आराधना करता था। उसका मन सदा ही शिव चरणों का स्मरण करता रहता था। धीरे-धीरे समय बीतता गया । गृहपति ने बारहवें वर्ष में प्रवेश किया। नारद जी की वाणी को सिद्ध करते हुए देवराज इंद्र गृहपति के सामने प्रकट हुए। इंद्र ने कहा कि बालक मांगो क्या मांगते हो? तब इंद्र की बात सुनकर गृहपति ने उन्हें नमस्कार किया और बोला- प्रभु! मैं आपसे नहीं, भगवान शिव से वरदान मांगना चाहता हूं। आप चले जाइए। मैं शिवजी के अलावा किसी अन्य से कुछ नहीं मांग सकता क्योंकि शिव ही मेरे आराध्य हैं और मैं उन्हीं का भक्त हूं। गृहपति के इन वचनों को सुनकर इंद्रदेव क्रोध से तमतमा उठे। उन्होंने अपना वज्र निकाल लिया। उनके हाथ में वज्र देखकर बालक को अपने पिता द्वारा बताई गई बात याद आ गई और वह डर से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। यह देखकर भक्तवत्सल भगवान शिव देवी पार्वती सहित तुरंत वहां प्रकट हो गए। जैसे ही उन्होंने गृहपति को छुआ वह उठ खड़ा हुआ। अपने सामने साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती को पाकर वह रोमांचित हो उठा। उनका रूप  करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा था। इस अद्भुत रूप को देखकर गृहपति मंत्रमुग्ध हो गया और दोनों हाथ जोड़कर देवाधिदेव महादेव जी की स्तुति करने लगा। तब भक्तवत्सल शिव ने हंसते हुए कहा- हे बालक ! मैं तुम्हारी इस उत्तम तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। मैंने ही इंद्र को तुम्हारे पास भेजा था। तुम अपनी परीक्षा में सफल हुए हो। तुम्हें डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हें कोई नहीं मार सकता। तुम्हारे द्वारा स्थापित किया गया मेरा यह लिंग संसार में 'अग्निश्वर' नाम से विख्यात होगा और इसके तेज के आगे कोई ठहर नहीं पाएगा। यह अग्नि और बिजली से रक्षा करने वाला होगा। इस लिंग की पूजा करने वाले को अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा। ऐसा कहकर भगवान शिव ने गृहपति के माता-पिता को बुलाया और सबने मिलकर कल्याणकारी भगवान शिव का पूजन किया तत्पश्चात शिवजी उसी अग्निश्वर लिंग में समा गए।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता पंद्रहवां अध्याय

यज्ञेश्वर अवतार

नंदीश्वर बोले— हे मुनिश्वर ! अब मैं आपको भगवान शिव के यज्ञेश्वर अवतार के बारे में बताता हूं। एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर सागर के गर्भ में छिपे अमूल्य रत्नों और धरोहरों को निकालने के लिए क्षीर सागर का मंथन किया। मंथन करते समय सर्वप्रथम विष निकलने लगा और संसार उस विष की ज्वाला से भस्म होने लगा। यह देखकर देवता और दानव भयभीत हो गए और भगवान शिव की स्तुति करने लगे। भगवान शिव सदा ही अपने भक्तों की रक्षा और कल्याण करते हैं। उन्होंने अपने भक्तों का दुख दूर करने के लिए उस विष को पी लिया। विष पीने के कारण उनका गला नीले रंग का हो गया और वे नीलकण्ठ नाम से विख्यात हुए। तत्पश्चात देवता और दानव नए उत्साह और जोश के साथ दुबारा समुद्र मंथन करने लगे, जिससे अनेकों बहुमूल्य रत्न, हीरे-जवाहरात और अमृत का प्रादुर्भाव हुआ। अमृत निकलने पर देवताओं और असुरों में युद्ध होने लगा। तब राहु नामक असुर अमृत कलश चुराकर भाग खड़ा हुआ। यह दृश्य चंद्रमा ने देख लिया और उसका पीछा किया। विष्णुजी ने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गरदन काट दी क्योंकि उसने अमृत पी लिया था, इसलिए सिर कटने के बाद भी वह मरा नहीं। तब से राहु चंद्रमा को डराने लगा । भगवान शिव ने चंद्रमा की रक्षा करने के लिए उसे अपने सिर पर धारण कर लिया। देवताओं ने असुरों से अमृत कलश छीन लिया और अमृत पान कर लिया। अब उन्हें अपने पर अभिमान होने लगा और वे अपने बल की प्रशंसा करने लगे। जब इस बात का ज्ञान त्रिलोकीनाथ भगवान शिव को हुआ कि देवता मदांध हो गए हैं, तब उन्होंने देवताओं को होश में लाने के लिए अपने मन में निश्चय किया। भगवान शिव यक्ष का रूप रखकर देवताओं के पास पहुंचे। देवता उनसे अपने बल की प्रशंसा करने लगे। देवताओं की गर्वपूर्ण बातों को सुनकर यक्ष रूप धारण किए भगवान शिव बोले- हे देवताओ! तुम्हारा यह अभिमान और गर्व झूठा है। सच्चाई यह है कि तुम्हारा निर्माण करने वाला स्वामी कोई और है। तुम गर्व में भरकर उसे भूल गए हो। तुममें अहंकार और अभिमान आ गया है। अभी मैं तुम्हारे बल की परीक्षा लेता हूँ। यह कहकर उन्होंने एक तिनका धरती पर रखा और कहा कि हे बलशाली देवताओ! अपने पराक्रम और बल से अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके इसे काट दो। तब सब देवता अपने बल और पराक्रम को सिद्ध करने के लिए उस तिनके पर प्रहार करने लगे परंतु सबके अस्त्र-शस्त्र व्यर्थ हो गए। वे उस तिनके का कुछ भी न बिगाड़ सके। वह तिनका अपने स्थान से जरा-सा भी नहीं हिला । यह देखकर सब देवताओं को बहुत आश्चर्य हुआ। देवता आश्चर्यचकित होकर एक-दूसरे को देख ही रहे थे कि आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी बोली- देवताओ! यक्ष के रूप में ये कोई और नहीं स्वयं भगवान शिव हैं, जो सबके परमेश्वर, रचनाकर्ता, पालनकर्ता तथा विनाशकर्ता हैं। आकाशवाणी सुनकर सब देवताओं को अपनी भूल का एहसास हो गया और वे यज्ञेश्वर भगवान शिव को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे। शिवजी ने यज्ञेश्वर रूप रखकर देवताओं का घमंड दूर कर दिया फिर सबको आशीर्वाद देकर वहां से अंतर्धान हो गए।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता सोलहवां अध्याय

शिव दशावतार

नंदीश्वर बोले- हे महामुने! अब मैं आपको त्रिलोकीनाथ भगवान शिव के दशावतारों के बारे में बताता हूं। भगवान शिव के पहले अवतार को 'महाकाल' कहा जाता है और यह प्रभु के भक्तों को भक्ति और मुक्ति प्रदान करता है। देवी महाकाली अपने भक्तों को सदा उनकी मनोवांछित वस्तु प्रदान करती हैं। 'तारा' नामक दूसरा अवतार सेवकों को सुख तथा भक्ति- मुक्ति देता है। भील नामक तीसरा 'भुवनेश' अवतार भुवनेश नामक भील शक्ति का है। चौथा षोडश 'विद्येश' की षोडश शक्ति का है, जो महादेव जी के परम भक्तों को सुख प्रदान करने वाला है। पांचवां 'भैरव' की गिरजा नामक भैरवी शक्ति है, जो उपासना करने वालों की सभी कामनाएं पूरी करती है। छठी 'छिन्नमस्ता' नामक शक्ति भक्तों के मनोरथों को पूरा कर उन्हें शांति प्रदान करती है। भगवान शिवशंकर का सातवां अवतार 'धूम्रवान' है, जिससे धूम्रवती शक्ति फल देने वाली हुई। आठवें अवतार रूप का नाम 'बगला' है और बगलामुखी शक्ति महा आनंद देने वाली और भक्तों का कल्याण करने वाली है। शिवजी का नवां अवतार 'मातंग' नाम से हुआ एवं जिससे मातंग शक्ति उत्पन्न हुई। देवाधिदेव भगवान शिव के दसवें अवतार के रूप में 'कमल' का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे कमला नामक शक्ति उत्पन्न हुई। यह शक्ति अपने भक्तों का पालन करने वाली तथा अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है। त्रिलोकीनाथ कल्याणकारी भगवान शिव द्वारा लिए गए ये दसों अवतार सज्जन पुरुषों एवं उनके परम भक्तों को सदा सुख प्रदान करने वाले हैं। भक्तवत्सल भगवान शिव इन अवतारों द्वारा अपनी भक्ति में लीन रहने वालों को अपनी सच्ची भक्ति और मुक्ति प्रदान करते हैं।देवाधिदेव महादेवजी द्वारा धारण किए गए ये दसों अवतार तंत्र शास्त्र से संबंधित हैं। ये दसों अवतार अद्भुत हैं एवं इनकी महिमा दिव्य है। भगवान शिव की ये दसों शक्तियां शत्रु को मारने के कार्य में प्रयुक्त होती हैं। ये दस दिव्य शक्तियां दुष्टों को दण्ड देती हैं और ब्रह्मतेज में वृद्धि करती हैं।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता सत्रहवां अध्याय

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