शिवजी का किरात अवतार ,Kirat incarnation of Shiva, Kirat-Arjun dispute, story of Kirateshwar Mahadev

शिवजी का किरात अवतार ,किरात-अर्जुन विवाद,किरातेश्वर महादेव की कथा

शिवजी का किरात अवतार

नंदीश्वर बोले-हे सनत्कुमार जी ! अर्जुन महामुनि व्यास जी द्वारा बताई गई विधि से शिवजी की उपासना कर रहे थे। काफी समय तक तपस्या करने के पश्चात उनके तप का तेज बढ़ना आरंभ हो गया और उनका तप और रौद्र रूप धारण करता जा रहा था। अर्जुन ने एक पैर पर खड़े होकर सूर्य की ओर देखते हुए पंचाक्षर मंत्र का जाप करना आरंभ कर दिया। उनके तप के प्रभाव से सभी प्राणी, जीव-जंतु और देवता दग्ध होने लगे। अर्जुन की इस घोर तपस्या के विषय में दुर्योधन को ज्ञात हुआ। उसने मूक नाम के दैत्य को अर्जुन के पास शूकर का भेष धारण करके भेजा। वह दुष्ट राक्षस अनेक प्रकार की ध्वनि निकालता और वृक्षों को उखाड़ता हुआ अर्जुन के तप के स्थान के निकट पहुंचने लगा। तब अर्जुन का मन एकाएक व्याकुल हो उठा और उन्होंने पलटकर उस कपटी राक्षस को देखा और मन में विचार किया कि जिसे देखकर मन व्याकुल हो, वह अवश्य ही हमारा शत्रु होता है। यह विचार मन में आते ही अर्जुन को दुर्योधन का छल-कपट याद आ गया। अर्जुन ने वहीं बैठे-बैठे उस पर बाण चला दिया। उसी समय स्वयं भक्तवत्सल भगवान शिव भी अपने भक्त अर्जुन पर आए संकट को देखकर उनकी रक्षा व परीक्षा हेतु तुरंत वहां आ गए और उन्होंने भी उस बहुरूपिए राक्षस पर अपना बाण चला दिया। उस समय देवाधिदेव महादेव जी ने भील का वेश धारण कर रखा था। उनके शरीर में श्वेत धारियां थीं और वह कच्छ बांधे हुए थे। उनके कमर पर तरकश और हाथ में धनुष बाण था और वे भी उसी शूकर का पीछा कर रहे थे। भीलरूपी भगवान शिव और अर्जुन दोनों के बाणों ने एक साथ उस शूकर को अपना निशाना बनाया। शिवजी का बाण उस विशाल शूकर की पूंछ में और अर्जुन का बाण उसके मुख में लगा। उस भयंकर आघात को वह सह नहीं सका । पल भर में ही भयानक शब्द करता हुआ वह धरती पर गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। उस समय सब देवता भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे। शूकर रूपी दैत्य के मारे जाने पर दोनों बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन सोचने लगे कि यह भयानक दैत्य अवश्य ही मुझे मारने के लिए आया था परंतु भगवान शिव ने आज मेरी रक्षा की और मुझे बचा लिया। उन्होंने ही मुझे सद्बुद्धि देकर उसे मारने की प्रेरणा मेरे मन में जगाई। ऐसा विचार मन में आते ही अर्जुन ने भगवान शिव के चरणों में प्रणाम किया और पुनः भक्तिभाव से शिव स्तुति शुरू कर दी।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता  उन्तालीसवां अध्याय

किरात - अर्जुन विवाद

नंदीश्वर बोले - हे सर्वज्ञ ! जब वह भयानक शूकर शिवजी व अर्जुन दोनों के बाणों से मारा गया और पृथ्वी पर बेजान होकर गिर पड़ा, तो भील रूपधारी शिवजी ने अपने एक सेवक को भेजकर मृत शूकर से अपना बाण निकालकर लाने के लिए कहा। उधर अर्जुन भी उस शूकर से अपना बाण लेने के लिए आए। तब अर्जुन और उस शिवगण में बाण को लेकर विवाद शुरू हो गया। वह गण बोला कि ये दोनों बाण मेरे स्वामी के हैं, इसलिए इन्हें मुझे दे दो। परंतु अर्जुन ने बाण देने से मना कर दिया। तब वह बोला कि तुम झूठे तपस्वी हो। यदि तुम सच्चे हो तो इन बाणों को मुझे दिखाओ। मैं अपने बाण की पहचान कर लूंगा क्योंकि उन पर मेरा फल अंकित है। यह सुनकर अर्जुन उस गण से बोले- तुमसे मैं युद्ध नहीं कर सकता । युद्ध सदैव समान योद्धा से किया जाता है। मेरे बल और पराक्रम को देखना चाहते हो तो जाओ और जाकर अपने स्वामी को भेजो। अर्जुन के वचन सुनकर वह गण किरात रूप धारण किए भगवान शिव के पास गया। अर्जुन ने जो कुछ कहा था, उसने अपने स्वामी को वह सब यथावत बता दिया। सारी बातें सुनकर किरातेश्वर को बहुत प्रसन्नता हुई और वे अपनी सेना को साथ लेकर अर्जुन से युद्ध करने के लिए वहां आ गए। युद्धभूमि में पहुंचकर किरातरूपी भगवान शिव ने अपने दूत को पुनः अर्जुन के पास भेजा। शिवजी का वह दूत अर्जुन के पास गया और बोला- हे तपस्वी! जरा हमारी विशाल सेना को नजर उठाकर देखो, तुम क्यों एक बाण की खातिर अपने प्राणों की आहुति देना चाहते हो। अच्छा हो कि खुशी से वह बाण हमें दे दो और अपनी रक्षा करो। यह सुनकर अर्जुन को क्रोध आ गया। वे बोले कि तुम जाकर अपने स्वामी से कह दो कि मैं अपने कुल को कलंक नहीं लगा सकता। भले ही मेरे भाई दुखी हों, पर मैं युद्ध से डरकर पीछे नहीं हट सकता। क्या कभी शेर भी गीदड़ से डरा करते हैं। जाकर अपने स्वामी को बता दो कि क्षत्रिय युद्ध से डरते नहीं हैं, बल्कि अपने शत्रुओं को युद्ध में पछाड़कर आगे बढ़ते हैं। अर्जुन के ऐसे वचन सुनकर वह दूत अपने स्वामी किरातेश्वर भगवान शिव के पास वापस चला गया और उन्हें अर्जुन की कही सारी बातें बता दीं। अपने गण की बातों को सुनकर लीलाधारी शिव मन ही मन अर्जुन की भक्ति, निडरता और अपनी बात की अडिगता देखकर प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने अपनी सेना सहित आगे बढ़ना शुरू कर दिया।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता चालीसवां अध्याय

किरातेश्वर महादेव की कथा

नंदीश्वर बोले - हे महामुने! जब किरातेश्वर शिवजी को उनके दूत ने बताया कि अर्जुन किसी भी स्थिति में समर्पण नहीं करना चाहते। और वे आपसे युद्ध करना चाहते हैं, तब शीघ्र ही किरातेश्वर शिव अपनी सेना के साथ युद्ध भूमि में पधारे। अर्जुन ने अपने आराध्य भगवान शिव के चरणों का स्मरण किया और अपना धनुष बाण लेकर उस विशाल सेना से लड़ने लगे। अर्जुन व भील सेना में बड़ा भयंकर संग्राम हुआ। दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी। अर्जुन, जो कि महान धनुर्धारी कहे जाते हैं, ने अपने बाणों से सारी गण सेना को पल भर ही में परेशान कर दिया। फिर क्या था, कुछ ही देर में सभी शिव गण अपने प्राणों की रक्षा हेतु युद्ध भूमि से इधर-उधर हो गए परंतु अर्जुन के बाण न रुके। जब भीलराज किरात की सारी सेना भाग खड़ी हुई तब अर्जुन ने किरात वेशधारी शिवजी से युद्ध करना आरंभ कर दिया। अर्जुन ने अपने तीव्र बाणों से महादेव जी पर हमला कर दिया परंतु वे भक्तवत्सल शिवजी का कुछ न बिगाड़ सके। उनका एक भी बाण शिवजी तक नहीं पहुंचता था। यह सब देखकर देवाधिदेव भगवान शिव हंस रहे थे। जब अर्जुन ने देखा कि वह किसी भी प्रकार से उस किरात को अपने वश में नहीं कर पा रहे हैं तो उन्होंने भगवान शिव की स्तुति की। इसके प्रभाव से तुरंत ही त्रिलोकीनाथ, भक्तवत्सल, कल्याणकारी शिवजी ने अपने अद्भुत स्वरूप के साक्षात दर्शन अर्जुन को कराए। भगवान शिव का परम मनोहारी सुंदर स्वरूप देखकर अर्जुन धन्य हो गए और प्रसन्न होकर पल भर उन्हें देखते ही रह गए। तब यह जानकर कि वह किरात कोई और नहीं अपितु स्वयं शिवजी ही थे, उन्हें अपने युद्ध करने और उनका अपमान करने के कारण बहुत लज्जा महसूस हुई। वे अपने आराध्य के चरणों में गिर पड़े। शिवजी ने उन्हें उठाया और बोले कि अर्जुन दुखी मत हो । तब अर्जुन हाथ जोड़कर भक्तवत्सल भगवान शिव की स्तुति करने लगे। और बोले-हे महादेव जी! आपने इस प्रकार मुझसे रूप बदलकर युद्ध क्यों किया? मैंने आपका भक्त होते हुए भी आपका अपमान किया है। स्वामी! मुझे माफ कर दीजिए और मेरा कल्याण कीजिए। अर्जुन के वचनों से महेश्वर प्रसन्न हो गए और बोले - अर्जुन ! दुखी मत हो । मेरे द्वारा प्रेरित होने पर ही तुमने युद्ध किया था। इसलिए यह तुम्हारा अपराध नहीं धर्म था। मैं तुम पर प्रसन्न हूं। कहो पुत्र! किस कारण से तुम इतनी घोर तपस्या और साधना कर रहे थे। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने का वचन देता हूँ। शिवजी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन ने शिवजी की आरंभ कर दी। अर्जुन बोले- हे देवाधिदेव ! कैलाशपति! सदाशिव ! मैं आपको नमस्कार करता हूं। हाथों में डमरू और त्रिशूल धारण करने वाले, गले में मुण्डमाला, शरीर पर बाघंबर  ओढ़े, गले में सांपों, मस्तक पर चंद्रमा और जटाओं में पतित पावनी श्रीगंगा को धारण करने वाले, कल्याणकारी शिव-शंकर को मैं नमस्कार करता हूं। भगवन् मैं आपका एक छोटा-सा भक्त हूं और आप इस संसार के ईश्वर हैं। भला मैं कैसे आपके गुणों का वर्णन कर सकता हूं। जिस प्रकार बारिश की बूदों और आकाश के तारों को नहीं गिना जा सकता, उसी प्रकार आपके गुणों की गणना कर पाना भी असंभव है। प्रभो! मैं आपका दास हूं। आपकी शरण में आया हूं। मुझ पर अपनी कृपादृष्टि सदा बनाए रखिए। आप तो अंतर्यामी हैं, अपने भक्तों के विषय में सबकुछ जानते हैं। प्रभु! हम पर आए इस घोर संकट को दूर कीजिए।  यह कहकर अर्जुन मस्तक झुकाकर चुपचाप खड़े हो गए। अपने भक्त की स्तुति से हर्षित हो शिवजी बोले- हे अर्जुन! अपनी सारी चिंताएं त्याग दो। तुम्हारे कुल का कल्याण अवश्य होगा। तुम्हें सबकुछ मिल जाएगा, थोड़ा धैर्य रखो। यह कह शिवजी ने अर्जुन को अमोघ पाशुपत अस्त्र प्रदान किया। फिर अर्जुन को युद्ध में विजय पाने और शत्रुओं का नाश करने का वर प्रदान किया। साथ ही शिवजी ने उनकी सहायता हेतु श्रीकृष्ण जी को भी सहयोग करने के लिए कहा। तत्पश्चात अर्जुन को आशीर्वाद देकर शिवजी वहां से अंतर्धान हो गए। शिवजी के जाने के उपरांत अर्जुन भी प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम को लौट गए और जाकर अपने भाइयों को अपनी तपस्या सिद्धि और वर प्राप्ति के बारे में बताया, जिसे जानकर वे बहुत प्रसन्न हुए । अर्जुन की तपस्या पूर्ण होने के विषय में जानकर श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए और बोले कि इसीलिए ही मैंने कहा था कि शिव भक्ति सभी कष्टों को दूर करने वाली है। मुने! इस प्रकार मैंने आपको शिवजी के किरात अवतार का वर्णन सुनाया। यह सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता इकतालीसवां अध्याय

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