मधुकैटभ-वध एवं महाकाली वर्णन ,धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का वध,Madhukatbha-killing and description of Mahakali, Dhumralochan, killing of Chand-Munda and Raktabeej

मधुकैटभ-वध एवं महाकाली वर्णन ,धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का वध

मधुकैटभ-वध एवं महाकाली वर्णन

सूत जी बोले- हे मुनिवर ! अब मैं आपको जगत जननी माता उमा के विषय में बताता हूं। स्वारोचिष नामक मन्वंतर में विरथ नाम के एक राजा हुए हैं। उनका सुरथ नामक पुत्र बहुत वीर और पराक्रमी था। वह महादानी भी था। वह देवराज इंद्र के समान पराक्रमी था। उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। एक बार उस पर नौ राजाओं ने एक साथ आक्रमण कर दिया। युद्ध में उसे हराकर उसके राज्य पर अपना कब्जा कर लिया। सुरथ घोड़े पर सवार होकर वन को चला गया। वन में राजा सुरथ ने एक सुंदर आश्रम देखा, वहां पर सभी जीव-जंतु शांत वातावरण में विचरण कर रहे थे। आश्रम में स्वागत पाकर राजा वहीं रहने लगा। एक दिन की बात है, राजा सुरथ मन ही मन यह विचार करने लगा कि मैं अपने दुर्भाग्य के कारण अपना राज्य खो बैठा हूं। सुरथ यह सोच ही रहा था, तभी आश्रम में एक वैश्य आया । वह आकर राजा के पास ही बैठ गया। उसे दुखी देखकर राजा ने उससे उसके दुख का कारण जानना चाहा। तब वह वैश्य आंखों में आंसू लिए बोला- 'राजन! मैं समाधि नामक वैश्य हूं। मैं एक अत्यंत धनाढ्य कुल में उत्पन्न हुआ हूं परंतु मेरे पुत्र-पौत्रादि ने धन के लालच में ही मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। राजा सुरथ और वैश्य समाधि आपस में बात कर ही रहे थे कि वहां ऋषि मेधा आ गए और बोले-राजन! इस संसार में सबको आकर्षित और मोहित करने वाली सनातनी माया देवी सत्य रूपा ही हैं। वे ही इस जगत की रचना, पालन और संहार करती हैं। प्रलय के समय भगवान श्रीहरि विष्णु शेषशय्या पर योगनिद्रा में सोए हुए थे। उसी समय उनके कान के मैल से दो राक्षस प्रकट हो गए। उनके नाम मधु और कैटभ थे। वे दोनों राक्षस विष्णुजी के नाभि कमल में स्थित ब्रह्माजी को मारने के लिए दौड़े। उन महादैत्यों को इस प्रकार अपनी ओर आता देखकर ब्रह्माजी महामाया देवी परमेश्वरी का ध्यान करके उनकी स्तुति करने लगे। वे बोले - हे महामाया! हे शरणागतों की रक्षा करने वाली देवी। इन महादैत्यों से मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। आप मधु-कैटभ दोनों दैत्यों को मोहित करें और नारायण श्रीहरि विष्णु को जगाकर मेरी रक्षा करें। इस प्रकार ब्रह्माजी की स्तुति एवं प्रार्थना सुनकर महामाया देवी फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को प्रकट होकर संसार में महाकाली नाम से जगप्रसिद्ध हुईं। तभी देवी ने ब्रह्माजी को प्राण रक्षा का आश्वासन दिया। योगमाया के रूप में वे विष्णुजी के नेत्रों से बाहर आईं तो विष्णुजी जाग गए। उन दैत्यों को देखकर क्रोधित श्रीहरि उन्हें मारने दौड़े, तब वे बोले- हमारा वध आप वहीं पर कर पाएंगे जहां पृथ्वी पर जल नहीं हो। तब भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ नामक दोनों महादैत्यों को अपनी जंघाओं पर लिटाकर अपने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काटकर ब्रह्माजी की रक्षा की।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता पैंतालीसवां अध्याय

महालक्ष्मी अवतार

ऋषि बोले- दैत्यों के कुल में जन्मे महादैत्य रंभासुर का महिषासुर नामक पुत्र महावीर और पराक्रमी था। उसने समस्त देवताओं को युद्ध में परास्त करके स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। तब सभी देवता दुखी होकर ब्रह्माजी और विष्णुजी को अपने साथ लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे। उन्होंने भगवान शिव को सारी बातें विस्तारपूर्वक सुनाईं। सारी कथा सुनने के उपरांत क्रोधित भगवान शिव की आंखों और मुख से एक दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। उस तेज में सब देवताओं ने अपना-अपना तेज मिलाया जिससे देवी महामाया जगदंबा का प्रादुर्भाव हुआ। उन्हें देखकर देवताओं की प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। सबने देवी को अनेक आयुध एवं आभूषण भेंट किए। ब्रह्माजी, विष्णु और शिवजी सहित समस्त देवताओं की अनेकों शक्तियां ग्रहण करने के पश्चात देवी ने जोर का अट्टहास और गर्जना की। देवी की गर्जना से धरती, आकाश और पाताल गूंज गए। उस गर्जना को सुनकर देव शत्रु दैत्यों ने अपने-अपने हथियार उठा लिए। देखते ही देखते देवी जगदंबा दैत्यों से युद्ध करने पहुंच गईं। दैत्यों और देवी के बीच घोर संग्राम होने लगा। देवी जगदंबा ने शूल, शक्ति, तोमर आदि शस्त्रों से लाखों दैत्यों का विनाश कर दिया। पराक्रमी देवी को देखकर दैत्य सेना भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगी। तब महिषासुर ने आकर देवी जगदंबा को ललकारा। उसने तलवार लेकर देवी के वाहन सिंह पर आक्रमण कर दिया। अपने सिंह पर आई इस विपत्ति को देखकर देवी ने अपना पाश महिषासुर पर फेंका। अपनी ओर आते पाश को देखकर महिषासुर ने महिष का रूप त्यागकर सिंह का रूप धारण कर लिया। देवी जगदंबा ने यह देखकर झपट कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया परंतु महिषासुर फिर भी न मरा और रूप बदल-बदलकर देवी से युद्ध करने लगा और उनके सिंह को परेशान करने लगा। इस प्रकार देवी और महिषासुर का युद्ध बहुत लंबे समय तक चलता रहा। उनके इस भयानक युद्ध से पूरा त्रिलोक कांप उठा। सारे जीव-जंतु दुखी हो गए। तब देवी उछलकर महिषासुर पर चढ़ गईं। उन्होंने अपने पैरों से महिषासुर को कुचल दिया और अपने त्रिशूल से उसकी जिह्वा काट दी। इस प्रकार देवी जगदंबा ने महिषासुर का वध कर त्रिलोक को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। सभी देवता हर्षित होकर देवी की स्तुति करने लगे। सारी दिशाओं से पुष्प वर्षा होने लगी।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता छियालीसवां अध्याय 

धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का वध

ऋषि बोले-शुंभ और निशुंभ नामक दोनों पराक्रमी दैत्यों ने अपने अत्याचारों से पूरे चराचर जगत को दुखी कर दिया। सभी जीव-जंतु, मनुष्यगण एवं देवता उसके अत्याचारों से परेशान हो चुके थे। तब देवता अत्यंत परेशान होकर हिमालय पर श्री पार्वतीजी की शरण में गए और देवी की स्तुति करने लगे। वे बोले-हे कल्याणकारी देवी! भवानी! हम सब आपकी शरण में आए हैं। मातेश्वरी ! हमारी रक्षा कीजिए । शुंभ-निशुंभ के आतंक एवं अत्याचारों से त्रिलोक को मुक्त कराइए। देवताओं की स्तुति सुनकर देवी ने अपने शरीर से एक तेज उत्पन्न किया और एक कुमारिका प्रकट हुई। सब देवताओं ने हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर देवी की स्तुति की। तब पार्वती जी बोलीं- देवगण! मेरे कोश से निकलने के कारण ये कौशिकी नाम से प्रसिद्ध होंगी और मातंगी नाम से जगप्रसिद्ध होंगी। यह कहकर देवी अंतर्धान हो गईं और देवता अपने स्थान को लौट गए। देवी कौशिकी वहीं हिमालय की गुफा में रहने लगीं। एक दिन शुंभ-निशुंभ के सेवकों ने उन्हें देख लिया। तब उन्होंने जाकर शुंभ-निशुंभ से उनके रूप सौंदर्य की प्रशंसा की और कहा कि वह तो नारियों में रत्न हैं, उसे आपके महल की शोभा बढ़ानी चाहिए। तब देवी की प्रशंसा सुनकर शुंभ-निशुंभ ने अपना दूत वहां भेजा। तब दूत ने जाकर देवी से कहा- मेरे स्वामी शुंभ-निशुंभ आपके रूप की प्रशंसा सुनकर आपसे विवाह करना चाहते हैं। उन्होंने विवाह का प्रस्ताव लेकर ही मुझे यहां पर भेजा है। दूत की बात सुनकर देवी बोलीं- दूत ! जाकर तुम अपने स्वामियों से कहो कि मैंने यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि जो भी मुझे युद्ध में परास्त कर देगा मैं उसी से विवाह करूंगी। अपने स्वामियों से कहो आकर मुझसे युद्ध करें और मुझे हराकर मुझे अपने साथ ले जाएं। ने शुंभ-निशुंभ को सारी बातों से अवगत कराया। सारी बातें सुनकर शुंभ और निशुंभ क्रोधित हो गए। उन्होंने अपने सेनापति धूम्रलोचन को आदेश दिया कि तुम उस नारी को यहां लेकर आओ। यदि वह प्यार से न आए तो जबरदस्ती उसे उठा लाना। अपने स्वामी की आज्ञा पाकर धूम्रलोचन हिमालय पर्वत पर देवी को लेने पहुंचा। जब देवी कौशिकी ने चलने से किया तो वह देवी पर शस्त्र लेकर झपटा। देवी ने उसे भस्म कर दिया और सिंह ने दैत्य सेना को तितर-बितर कर दिया। जब शुंभ-निशुंभ को धूम्रलोचन के मारे जाने का समाचार मिला तो वे गुस्से से भर गए। उन्होंने चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज को देवी को लाने वहां भेजा और आदेश दिया कि यदि वह न आए तो उसका वध कर देना। वे दैत्य देवी के पास गए और बोले - सुंदरी ! तुम प्रेमपूर्वक शुंभ-निशुंभ में से किसी को भी अपना पति बना लो और खुशी से राज्य करो। यह सुनकर देवी बोली-हे दैत्यो! मैं तो सूक्ष्म प्रकृति हूं। ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवता मेरी आराधना और स्तुति करते हैं । यदि तुममें शक्ति है तो मुझे युद्ध में हराकर जहां चाहो ले जा सकते हो। देवी! यदि आप ऐसा ही चाहती हैं तो ठीक है। यह कहकर दैत्यों ने देवी पर बाणों की वर्षा करनी शुरू कर दी। तब क्रोधित देवी ने अपने खड्ग से चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का वध कर दिया।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता सैंतालीसवां अध्याय

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