shree Ganesh Chalisa गणेश चालीसा के फायदे ,Shree Ganesh Chalisa Benefits of Ganesh Chalisa

shree Ganesh Chalisa गणेश चालीसा के फायदे 

गणेश चालीसा के फायदे 

आत्मिक उन्नति: गणेश चालीसा का पाठ करने से आत्मा की ऊर्जा में वृद्धि होती है और व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है।
धार्मिक उत्साह: गणेश चालीसा का पाठ करने से धार्मिक भावना बढ़ती है और धार्मिक उत्साह में वृद्धि होती है।
भगवान गणेश की कृपा: गणेश चालीसा का पाठ करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
बुद्धि और ज्ञान: गणेश चालीसा का पाठ करने से बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है। भगवान गणेश की कृपा से विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता मिलती है और विचारशीलता में वृद्धि होती है।
मानसिक शांति: गणेश चालीसा का पाठ करने से मन और आत्मा में शांति का अनुभव होता है। गणेश भगवान की पूजा और चालीसा का पाठ करने से मानसिक तनाव कम होता है और चिंताओं से छुटकारा मिलता है।
Shree Ganesh Chalisa Benefits of Ganesh Chalisa

shree Ganesh चालीसा

दोहा
जय गणपति सद्गुन सदन, करिवर बदन कृपाल । 
विघ्नहरण मंगल-करण, जय जय गिरिजालाल ॥

जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भवन करण शुभ काजू ॥
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता ॥ 
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मनभावन ॥ 
राजत मणि-मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥ 
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥ 
सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरणपादुका मुनि मन राजित ॥ 
धनि शिव सुवन षडाननभ्राता। गौरी ललन विश्व विख्याता ॥ 
ऋद्धि सिद्धि तव चॅवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥
कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी ॥ 
एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हीं भारी ॥ 
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा ॥ 
अतिथि जानि भे गौरि सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी ॥ 
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥ 
मिलहिं पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला ॥ 
गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना ।। 
अस कहि अन्तर्धान रूप है। पलना पर बालक स्वरूप है। 
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ॥ 
सकल मगन सुख मंगल गावहिं । नभ ते सुरन सुमन बर्षावहिं ॥
शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं । सुर-मुनिजन सुत देखन आवहिं ॥ 
लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा ॥ 
निज अवगुण गनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर न शनि तुहि भायो । 
कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौं, शिशु मोहि दिखाई ॥ 
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों ब्रालक देखन कहेऊ ॥ 
पड़तहिं शनि दृगकोण प्रकाशा । बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥ 
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी। सो दुख दशा जाइ नहिं वरणी ॥ 
हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हों लखि सुत का नाशा ॥ 
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये। काटि चक्र सों गजशिर लाये ॥ 
बालक के धड़ ऊपर धार्यो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डार्यो । 
नाम 'गणेश' शम्भु तब कीन्हें। प्रथम पूज्य बुद्धिनिधि, वर दीन्हें ॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव लीन्ही । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा कीन्ही ॥
चले षडानन भरमि भुलाई। रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई ॥
चरण मातु पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हों। नभ ते सुरन सुमन बहु बों ॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई । शेष सहस मुख सके न गाई ॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहूँ कौन विधि विनय तुम्हारी ॥
भजत 'राम सुन्दर' प्रभुदासा। लग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ॥ 
अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ॥

दोहा

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धर ध्यान ।नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सनमान ॥ 
सम्बत अपना सहस दश, ऋषि पंचमी दिनेश  । पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश ॥

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