पाण्डवों को शिव-पूजन के लिए व्यास जी का उपदेश ,Vyas ji's advice to Pandavas to worship Shiva, Arjun doing penance to Shiva

पाण्डवों को शिव-पूजन के लिए व्यास जी का उपदेश ,अर्जुन द्वारा शिवजी की तपस्या करना

पाण्डवों को शिव-पूजन के लिए व्यास जी का उपदेश

नंदीश्वर बोले- हे श्रेष्ठ मुनि! जब पाण्डवों को दुर्योधन ने जुए में हरा दिया था और वे वनवास पाकर अपनी पत्नी द्रौपदी सहित द्वैत वन में निवास करने लगे थे, तब एक दिन दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा को उनके शिष्यों सहित पाण्डवों को कष्ट देने के लिए उनके पास भेजा। दुर्वासा ऋषि अपने एक हजार शिष्यों को अपने साथ लेकर पाण्डवों की कुटिया में पहुंच गए और युधिष्ठिर से बोले कि हम स्नान करने जा रहे हैं, इतने में आप हम सबके लिए भोजन का प्रबंध कीजिए और स्वयं चले गए। दुर्वासा ऋषि द्वारा भोजन की व्यवस्था करने की बात सुनकर सब पाण्डव सोच में डूब गए क्योंकि उनके पास अन्न नहीं था। तब देवी द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और वे तुरंत वहां आ गए। वहां उन्होंने पाण्डवों की रसोई में बचे अन्न के एक दाने को खाया और इससे वे स्वयं भी तृप्त हो गए। साथ ही स्नान के लिए दुर्वासा और उनके शिष्यों का भी पेट भर गया और वे वहीं से लौट गए। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पाण्डवों पर आए इस संकट को दूर कर दिया। फिर पाण्डवों को भगवान शिव की आराधना करने के लिए कहकर वे स्वयं द्वारका चले गए। एक दिन जटाजूट धारण किए, गले में रुद्राक्ष की माला और भस्म लगाए व्यास जी ॐ नमः शिवाय' पंचाक्षरी मंत्र का जाप करते हुए पाण्डवों की कुटिया में पधारे। व्यास मुनि शिवजी के प्रेम में मग्न तेजपुंज से आलोकित थे। उन्हें पधारा हुआ देखकर पाण्डवों ने उन्हें प्रणाम किया और आसन पर बिठाकर उनकी पूजा-अर्चना की। तब महामुनि प्रसन्न होकर बोले - हे पाण्डवो! तुम सत्य के मार्ग पर चलने वाले हो और सदा ही धर्म का पालन करते हो। महाराज धृतराष्ट्र ने तुम्हारे साथ पक्षपात किया और तुम्हारा राज्य दुर्योधन ने छल करके तुमसे छीन लिया। जैसा बीज बोया जाता है, अंकुर भी उसी का निकलता है। अधर्म और असत्य का मार्ग अपनाने वालों का कभी कल्याण नहीं होता। तुम सत्य और धर्म के मार्ग पर चल रहे हो, इसलिए निश्चय ही तुम्हारा कल्याण होगा। महामुनि व्यास के वचनों को सुनकर युधिष्ठिर बोले - हे नाथ! हमारे कष्टों को दूर करने के लिए कोई मार्ग बताइए। श्रीकृष्ण जी ने हमें कल्याणकारी देवाधिदेव महादेव जी की आराधना करने के लिए कहा था। आप हमें शिवभक्ति का उपदेश दीजिए। युधिष्ठिर के वचन सुनकर महामुनि व्यास बोले - हे पाण्डवो ! निश्चय ही श्रीकृष्ण ने सत्य कहा था। भगवान शिव अपने भक्तों के दुखों को दूर करने वाले तथा उनकी रक्षा करने वाले हैं। तत्पश्चात व्यास जी ने उन्हें शिवजी के पूजन का विधान बताया। फिर बोले, तुम सदा ही धर्म के मार्ग पर चलना। इससे तुम्हारे कार्यों की सिद्धि होगी। यह कहकर महामुनि व्यास वहां से चले गए। तत्पश्चात व्यास जी के दिखाए मार्ग पर चलते हुए पाण्डव शिवजी की आराधना करने लगे। अर्जुन इंद्रकील नामक पर्वत के पास गंगा नदी के तट पर जाकर भक्तवत्सल, कल्याणकारी भगवान शिव की आराधना करने लगे।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता सैंतसवां अध्याय

अर्जुन द्वारा शिवजी की तपस्या करना

नंदीश्वर बोले- हे सनत्कुमार जी !अर्जुन भक्ति भावना से गंगाजी के तट पर बैठकर भगवान शिव की आराधना कर रहे थे। शिव मंत्र के जाप से उनका अतुल तेज प्रकाशित हो रहा था। पाण्डवों को अर्जुन का तेज देखकर विजय में कोई संदेह न रहा। जब अर्जुन तपस्या करने के लिए उनसे दूर गए, तब अर्जुन के वियोग से द्रौपदी और अन्य पाण्डव बहुत दुखी थे परंतु उनके मन में अटूट विश्वास था कि शिवजी की भक्ति से उनका निश्चय ही कल्याण होगा। उनके दुख को जानकर एक बार व्यास जी फिर उन्हें समझाने के लिए उनके पास आए। उन्हें देखकर पाण्डव बहुत प्रसन्न हुए और उनका आतिथ्य सत्कार करने लगे। तब महामुनि व्यास ने उन्हें उपदेश दिया और अनेक कथाएं सुनाई परंतु पाण्डवों का दुख दूर न हुआ। एक दिन युधिष्ठिर ने महामुनि व्यास से प्रश्न किया - हे महाप्रज्ञ ! जिस प्रकार के दुख और कष्टों को हम भोग रहे हैं, क्या पहले भी किसी को ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा है? युधिष्ठिर के इस प्रश्न को सुनकर व्यास मुनि कहने लगे कि पाण्डवो! निश्चय ही तुम्हारे साथ कौरवों ने छल किया है परंतु अनेकों सिद्ध पुरुषों ने इससे भी अधिक दुखों को हंसते- हंसते झेला है। निषध देश के स्वामी नल, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, श्रीरामचंद्र जी ने भी इन कष्टों को हंसकर झेला है। यह तो सप्तुरुषों का स्वभाव होता है कि वे विपरीत परिस्थितियों और दुखों से विचलित नहीं होते और सदा सत्य के मार्ग पर ही आगे बढ़ते रहते हैं। मानव को तो दुख झेलने ही पड़ते हैं। बचपन, युवावस्था, वृद्धावस्था सभी में मनुष्य को दुख और कष्ट प्राप्त होता है। इसलिए अपने मन को मत भटकाओ और सत्य के मार्ग का अनुसरण करो क्योंकि शिवजी सत्य से प्रसन्न होते हैं। इसलिए सभी मनुष्यों को सत्य के पथ पर चलना चाहिए। दूसरी ओर, अर्जुन ने इंद्रकील नामक पर्वत के निकट गंगाजी के तट पर महामुनि व्यास के उपदेश के अनुसार शिवलिंग बनाकर उसकी विधिपूर्वक उपासना आरंभ कर दी। अर्जुन प्रतिदिन स्नान करके भक्तिभावना से इंद्रियों को अपने वश में करके भगवान शिव का ध्यान करते। दिन-ब-दिन उनकी भक्तिभावना और अधिक प्रबल होती जा रही थी। उनकी तपस्या के तेज से जीवों को भय होने लगा था। अर्जुन की तपस्या से दग्ध होकर अनेक देवता देवराज इंद्र के पास गए और उनसे बोले कि देवराज ! अर्जुन भगवान शिव की घोर तपस्या कर रहा है और उसके तेज से सभी प्राणी दग्ध हो रहे हैं। अर्जुन की तपस्या के विषय में सुनकर देवराज इंद्र उनकी परीक्षा लेने के लिए उनके पास गए। इंद्र ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और अर्जुन के पास जाकर पूछने लगे कि तुम इतनी छोटी उम्र में तपस्या क्यों कर रहे हो? तुम मुक्ति चाहते हो या विजय के लिए तपस्या कर रहे हो। परंतु इंद्र तो मोक्ष के स्थान पर सुख प्रदान करते हैं। इंद्रदेव के वचनों को सुनकर अर्जुन को क्रोध आ गया और वे बोले - हे मुनि ! आप यहां क्यों पधारे हैं और इस प्रकार के प्रश्नों से मेरी तपस्या में क्यों व्यवधान डाल रहे हैं? मैं शिवजी की आराधना कर रहा हूं। तब इंद्रदेव ने ब्राह्मण वेश त्यागकर अपने वास्तविक रूप के दर्शन अर्जुन को दिए। इंद्रदेव को अपने सामने पाकर अर्जुन को लज्जा का अनुभव हुआ कि मैंने इंद्र से अपशब्द कहे। उन्होंने देवराज इंद्र से क्षमा याचना की। देवराज इंद्र प्रसन्न होकर बोले- अर्जुन ! तुम मांगो, क्या मांगना चाहते हो? मैं निश्चय ही तुम्हारा इच्छित वर तुम्हें प्रदान करूंगा। देवराज इंद्र के वचन सुनकर अर्जुन बोले- हे देवेंद्र ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे शत्रुओं पर विजय का वरदान प्रदान कीजिए। अर्जुन के वर को सुनकर देवेंद्र बोले- अर्जुन ! तुम्हारी विजय अवश्य होगी क्योंकि भगवान शिव के भक्तों पर कभी कोई कष्ट नहीं आता। उनको संसार में किसी का भय नहीं होता। इसलिए तुम इसी प्रकार शांत चित्त और भक्ति भाव से त्रिलोकीनाथ देवाधिदेव महादेव जी की तपस्या करो। उनकी प्रसन्नता से श्रेष्ठ जीवन में और कुछ नहीं है। यह कहकर देवराज वहां से अंतर्धान हो गए। तब अर्जुन पुनः शिवलिंग को प्रणाम कर उनकी आराधना करने लगे।
शिव पुराण श्रीशतरुद्र संहिता अड़तीसवां अध्याय

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