कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष क्या होता है कैसे शुरू हुए कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष What is Krishna Paksha and Shukla Paksha? How did Krishna Paksha and Shukla Paksha begin

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष क्या होता है

पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं।
What is Krishna Paksha and Shukla Paksha? How did Krishna Paksha and Shukla Paksha begin

क्या है कृष्ण और शुक्ल पक्ष

हिन्दू माह में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्र के घट-बढ़ के अनुसार 15-15 तिथियों में बांटा गया है। चंद्र जब बढ़ने लगता है तो उस काल को शुक्ल पक्ष और जब घटने लगता है तो उस काल को कृष्ण पक्ष कहते हैं। शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या होती है। शुक्ल पक्ष को देवताओं का दिन और कृष्ण पक्ष को पितरों का दिन कहते हैं। इसी तरह उत्तरायण को देवताओं का काल और दक्षिणायन को पितरों का काल कहते हैं।

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के बीच अंतर

जब हम संस्कृत शब्दों शुक्ल और कृष्ण का अर्थ समझते हैं, तो हम स्पष्ट रूप से दो पक्षों के बीच अंतर कर सकते हैं। शुक्ल उज्ज्वल व्यक्त करते हैं, जबकि कृष्ण का अर्थ है अंधेरा।
जैसा कि हमने पहले ही देखा, शुक्ल पक्ष अमावस्या से पूर्णिमा तक है, और कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष के विपरीत, पूर्णिमा से अमावस्या तक शुरू होता है।

शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष से जुड़ी कथा

कृष्णपक्ष की शुरुआत

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया। ये सत्ताईस बेटियां सत्ताईस स्त्री नक्षत्र हैं और अभिजीत नामक एक पुरुष नक्षत्र भी है। लेकिन चंद्र केवल रोहिणी से प्यार करते थे। ऐसे में बाकी स्त्री नक्षत्रों ने अपने पिता से शिकायत की कि चंद्र उनके साथ पति का कर्तव्य नहीं निभाते। दक्ष प्रजापति के डांटने के बाद भी चंद्र ने रोहिणी का साथ नहीं छोड़ा और बाकी पत्नियों की अवहेलना करते गए। तब चंद्र पर क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया। क्षय रोग के कारण सोम या चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे कम होता गया। कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई। 

शुक्लपक्ष की शुरुआत

कहते हैं कि क्षय रोग से चंद्र का अंत निकट आता गया। वे ब्रह्मा के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब ब्रह्मा और इंद्र ने चंद्र से शिवजी की आराधना करने को कहा। शिवजी की आराधना करने के बाद शिवजी ने चंद्र को अपनी जटा में जगह दी। ऐसा करने से चंद्र का तेज फिर से लौटने लगा। इससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ। चूंकि दक्ष ‘प्रजापति’ थे। चंद्र उनके शाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते थे। शाप में केवल बदलाव आ सकता था। इसलिए चंद्र को बारी-बारी से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है। दक्ष ने कृष्ण पक्ष का निर्माण किया और शिवजी ने शुक्ल पक्ष का।

कौन सा पक्ष शुभ है

धार्मिक मान्यता के अनुसार, लोग शुक्ल पक्ष को आशाजनक और कृष्ण पक्ष को प्रतिकूल मानते हैं। यह विचार चंद्रमा की जीवन शक्ति और रोशनी के संबंध में है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष की दशमी से लेकर कृष्ण पक्ष की पंचम तिथि तक की अवधि ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ मानी जाती है। इस समय के दौरान चंद्रमा की ऊर्जा अधिकतम या लगभग अधिकतम होती है - जिसे ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय तय करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ।।ॐ।। गलती मनुष्य का स्वभाव है। जाने अनजाने कुछ गलतियां हर किसी से हो ही जाती हैं। अब उस गलती को छुपाने के लिए झूठ का सहारा लेने की अपेक्षा उसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना जीवन का एक श्रेष्ठ गुण है। जब आप झूठ का सहारा लेकर किसी गलती को छुपाने का प्रयास करते हैं तो आप अपने जीवन में सुधार की सम्भावनाओं को भी कम कर देते हैं। अगर आपको एक बार झूठ बोलने की आदत पड़ जाती है तो फिर आपको सच बोलना बड़ा कठिन मालूम पड़ेगा। झूठ से बचने का प्रयास करो और प्रयास करो उस सत्य से भी बचने का जो किसी के लिए पीड़ा का कारण बन जाता है। जो सत्य किसी के लिए लज्जा का कारण और किसी के लिए आत्मग्लानि का कारण बन जाए वह सत्य भी शुभ नहीं है।

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