अग्नि पुराण - अड़तालीसवाँ अध्याय ! Agni Purana - 48 Chapter !

अग्नि पुराण - अड़तालीसवाँ अध्याय ! Agni Purana - 48 Chapter !

अड़तवालीसवाँ अध्याय ४८- श्रीहरिकी चौबीस मूर्तियोंके स्वोत्रका वर्णन” -चतुर्विंशतिमूर्त्तिंस्तोत्रकथनम्

अग्नि पुराण - अड़तालीसवाँ अध्याय ! Agni Purana - 48 Chapter !

अग्नि पुराण - अड़तालीसवाँ अध्याय ! Agni Purana - 48 Chapter !

भगवानुवाच
ओं रूपः केशवः पद्मशङ्खचक्रगदाधरः।
नारायणः शङ्खपद्मगदाचक्री प्रदक्षिणम् ।। १ ।।

ततो गदी माधवोरिशङ्खपद्मी नमामि तम्।
चक्रकौमोदकीपद्मशङ्खी गोविन्द ऊर्जितः ।। २ ।।

मोक्षदः श्रीगदी पद्मी शङ्खी विष्णुश्च चक्रधृक्।
शङ्खचक्राब्जगदिनं मधुसूदनमानमे ।। ३ ।।

भक्त्या त्रिविक्रमः पद्मगदी चक्री च शङ्ख्यपि।
शङ्खचक्रगदापद्मी वामनः पातु मां सदा ।। ४ ।।

गतिदः श्रीधरः पद्मी चक्रशार्ङ्गी च शङ्ख्यपि ॥
हृपीकेशो गदा चक्री पद्मी शङ्खी च पातु नः ।। ५ ।।

वरदः पद्मनाभस्तु शङ्खाब्जारिगदाधरः।
दामोदरः पद्मशङ्खगदाचक्री नमामि तम् ।। ६ ।।

तेने गदी शङ्खचक्री वासुदेवोब्जभृज्जगत्।
सङ्कर्षणो गदी शङ्‌खी पद्मी चक्री च पातु वः ।। ७ ।।

गदी चक्री शङ्खगदी प्रद्युम्नः पद्मभृत् प्रभुः।
अनिरुद्धस्चक्रगदी शङ्खी पद्मी च पातु नः ।। ८ ।।

सुरेशोर्यब्जशङ्खाढ्यः श्रीगदी पुरुपोत्तमः।
अधोक्षजः पद्मगदी शङखी चक्री च पातु वः ।। ९ ।।

देवो नृसिंहश्चक्राब्जगदाशङ्खी नमामि तम्।
अच्युतः श्रीगदी पद्मी चक्री शङ्खी च पातु वः ।। १० ।।

बालरूपी शङ्खगदी उपेन्द्रश्चक्रपद्म्यपि।
जनार्द्दनः पद्म चक्री शङ्खधारी गदाधरः ।। ११ ।।

शङ्खीपद्मी च चक्री चहरिः कौमोदकीधरः।
कृष्णः शङ्खी गदी पद्मी चक्री मे भुक्तिमुक्तिदः ।। १२ ।।

आदि मूर्त्तिर्वासुदेवस्तस्मात् सङ्कर्पणोभवत्।
सङ्कर्पणाच्च प्रद्युम्नः प्रद्युम्नादनिरुद्धकः ।। १३ ।।

केशवादिप्रभेदेन एकैकस्य त्रिधा क्रमात्।
द्वादशाक्षरकं स्तोत्रं चतुर्विंशातिमूर्त्तिमत् ।। १४ ।।

यः पठेच्छृणुयाद्वापि निर्मलः सर्वमाप्नुयात् ।। १५ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये चतुर्विंशतिमूर्त्तिस्तोत्रं नाम अष्टाचत्वारिंशोऽध्यायः ॥

अग्नि पुराण - अड़तवालीसवाँ अध्याय !-हिन्दी मे -Agni Purana - 48 Chapter!-In Hindi

श्रीभगवान्‌ हयग्रीव कहते हैं- ब्रह्मन्‌! ओंकारस्वरूप केशव अपने हाथोंमें पद्म, शट्ड, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं'। नारायण शह्कु, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं, मैं प्रदक्षिणापूर्वकक उनके चरणोंमें नतमस्तक होता हूँ। माधव गदा, चक्र, शह्नु और पद्म धारण करनेवाले हैं, मैं उनको नमस्कार करता हूँ। गोविन्द अपने हाथोंमें क्रमशः चक्र, गदा, पद्म और शह्ढु धारण करनेवाले तथा बलशाली हैं। श्रीविष्णु गदा, पद्म, शट्ढु एवं चक्र धारण करते हैं, वे मोक्ष देनेवाले हैं। मधुसूदन शद्ढु, चक्र, पद्म और गदा धारण करते हैं। में उनके सामने भक्तिभावसे नतमस्तक होता हूँ। त्रिविक्रम क्रमशः पद्म, गदा, चक्र एवं शट्जु धारण करते हैं। भगवान्‌ वामनके हाथोंमें शट्लु, चक्र, गदा एवं पद्म शोभा पाते हैं, वे सदा मेरी रक्षा करें॥ १-४॥
श्रीधर कमल, चक्र, शार्क् धनुष एवं शद्डु धारण करते हैं। वे सबको सदृति प्रदान करनेवाले हैं। हषीकेश गदा, चक्र, पद्म एवं शट्ढ्रु धारण करते हैं, वे हम सबकी रक्षा करें। वरदायक भगवान्‌ पद्मनाभ शट्ढ, पद्म, चक्र और गदा धारण करते हैं। दामोदरके हाथोंमें पद्म, शट्ढु, गदा और चक्र शोभा पाते हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। गदा, शक्ल, चक्र और पद्म धारण करनेवाले वासुदेवने ही सम्पूर्ण जगत्‌का विस्तार किया है। गदा, शह्लु, पद्म और चक्र धारण करनेवाले संकर्षण आपलोगोंकी रक्षा करें॥ ५-७॥
वाद (युद्ध)-कुशल भगवान प्रद्युम्न चक्र, शट्डु, गदा और पद्म धारण करते हैं। अनिरुद्ध चक्र, गदा, शट्ठु और पद्म धारण करनेवाले हैं, वे हमलोगोंकी रक्षा करें। सुरेश्वर पुरुषोत्तम चक्र, कमल, शट्ठ्टु और गदा धारण करते हैं, भगवान्‌ अधोक्षज पद्म, गदा, शट्बु और चक्र धारण करनेवाले हैं। वे आपलोगोंकी रक्षा करें। नृसिंहदेव चक्र, कमल, गदा और शट्ढु धारण करनेवाले हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। श्रीगदा, पद्म, चक्र और शट्ढु धारण करनेवाले अच्युत आपलोगोंकी रक्षा करें। शट्ढु, गदा, चक्र और पद्म धारण करनेवाले बालवदुरूपधारी वामन, पद्म, चक्र शट्जु और गदा धारण करनेवाले जनार्दन, शह्बु,पद्म, चक्र और गदाधारी यज्ञस्वरूप श्रीहरि तथा शद्जु, गदा, पद्म एवं चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण मुझे भोग और मोक्ष देनेवाले हों ॥ ८-१२॥ आदियमूर्ति भगवान्‌ वासुदेव हैं उनसे संकर्ष  प्रकट हुए। संकर्षणसे प्रद्युम्न और प्रद्युव्से अनिरु प्रादुर्भाव हुआ। इनमेंसे एक-एक क्रमश: केशव आदि मूर्तियोंके भेदसे तीन-तीन रूपोंमें अभिव्यव  हुआ। (अतः कुल मिलाकर बारह स्वरूप द्वादशाक्षर स्तोत्रका जो पाठ अथवा श्रवण करता  है, वह निर्मल होकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्  कर लेता है'॥ १३-१५
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें (श्रीहरिकी चौबीस मूर्तियोंके स्वोत्रका वर्णन” नामक अड़तवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८ ॥

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