भगवती दुर्गा के मन्त्रार्थ का संक्षिप्त मार्गदर्शन,Bhagavatee Durga Ke Mantraarth Ka Sankshipt Maargadarshan

भगवती दुर्गा के मन्त्रार्थ का संक्षिप्त मार्गदर्शन

भगवती दुर्गा के ध्यान अनेक है। ऐसा अनिवार्य है क्योंकि 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।' इसी प्रकार मन्त्र भी असंख्य हैं। ये मन्त्र देवी के शाब्दिक रूप वा सूक्ष्म रूप हैं। इन्हीं के आधार पर ध्यान व स्थूल रूप की कल्पना है। ये ध्यान-निर्गुण और सगुण दोनों ही रूपों के द्योतक हैं। इन सबका ज्ञाता कोई भी नहीं है और सभी के ज्ञान की आवश्यकता भी नहीं है। आवश्यकता है प्रधान मन्त्र से सम्बन्धित ध्यान की, जिसके मनन एवं निदिध्यासन से परमार्थ का साधन होता है। परन्तु यह निर्णय करना कठिन है कि अमुक ध्यान प्रधान है और सब गौण हैं। कारण सबका मत एक नहीं। कोई एक ध्यान को प्रधान मानता है, तो कोई उसे अपने दृष्टि-कोण के अनुसार अप्रधान ही बताता है। ऐसी दशा में कोई भी निर्णय सर्व- सम्मत नहीं हो सकता। अतएव प्रचलित मतों का ही मन्थन कर सिद्धान्त का प्रतिपादन करना पड़ता है।

Bhagavatee Durga Ke Mantraarth Ka Sankshipt Maargadarshan

शास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार भगवती दुर्गा के श्रौत उपासना-क्रम के अतिरिक्त दो प्रधान उपासना-क्रम हैं-१ शुद्ध तन्त्रोक्त और २ तन्त्र और स्मृति या पुराण-मिश्रोक्त। तन्त्रोक्त क्रम के दो प्रधान मन्त्र हैं-१ एकाक्षर वीज मन्त्र और २ अष्टाक्षर मन्त्र-राज या विद्या-राज्ञी। पुराणोक्त मन्त्र है नवार्ण, जो श्रौत मन्त्र भी है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि तन्त्र-शास्त्र में श्रुति, स्मृति, दर्शन आदि सभी सन्निहित हैं। अर्थात् सभी शास्त्रों के सार तन्त्रों में कट-छूट कर भरे पड़े हैं।
  • भगवती दुर्गा का एकाक्षर बीज-मन्त्र है- 
'हुँ' या 'दूँ'। विश्वसार तन्त्र में मन्त्रोद्धार है-' थान्त-वीजं ('थ' के बाद का वर्ण अर्थात् 'द') समुद्धृत्य वाम-कर्ण-विभूषितं' (वाम-कर्ण ऊ) इत्यादि।वरदा तन्त्र में 'दै दुर्गा-वाचकं (प्राण-शक्ति-वाचक) देवि ! ऊकारो रक्षणार्थः' इत्यादि। रुद्र-यामल तन्त्र के अनुसार 'हुँ' (दै हस्व उकार) बीज है।
  • श्रुति के अनुसार एकाक्षर-वीज-मन्त्र है 'ह्रीं'। इसका उद्धार कैवल्योपनिषत् में दिया है 
वियदीकार-संयुक्तं, वीति-होत्र- समन्वितं । 
अर्जेन्दु-लसितं देव्या-वीजं सर्वार्थ साधकम्।।

 वियत् (आकाश)= 'ह' ई वीति-होत्र (अग्नि) 'र' अर्धेन्दु-अर्थ मकार
  •  'हिन्दी तन्त्र-सार, पृष्ठ ११६ पर अष्टाक्षर मन्त्र का उद्धार यह दिया है
मायाद्रि-कर्ण-विन्द्राढ्यो, भूयोऽसौ सर्गवान् भवेत्। 
पञ्चान्तकः प्रतिष्ठावान्, मारुतो भौतिकासनः।
तारादि हृदयान्तोऽयं, मन्त्रो वस्वक्षरात्मकः ।।
  • अर्थात् 
माया- ह्रीं, अद्रि (द) कर्ण (3) बिन्दु ( ) हुँ, पुनः यही कर्ण विसर्ग- भौतिक (ऐ) = दुर्गायै। इनके (आठ) अक्षर का मन्त्र बनता युक्त (दुः) + पञ्चान्तक (ग) प्रतिष्ठा (आ) मारुत (य) आदि में तार (ॐ) और अन्त में हृदय (नमः) लगाने से वसु है ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः।'
  • मन्त्र-महोदधि में 'नवार्ण मन्त्र' का उद्धार यह दिया है-
वाङ्-माया-मदनो दीर्घा, लक्ष्मीस्तन्द्री श्रुतीन्दु-युक्। 
डायै सदृग्-जलं कूर्म-द्वयं झिण्टीश संयुतम्।।
क्लीं, दीर्घा लक्ष्मीः झिण्टीश सहित दो कूर्म च्चे।
  •  अर्थात् 
वाक् = ऐ, माया ह्रीं, मदनः सहित तन्द्री मुं+ डायै, स-दृक् जल वि पूरा मन्त्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।' चा श्रुति एवं इन्दु- यह 'नवार्ण मन्त्र' तन्त्र, श्रुति तथा स्मृति-तीनों से प्रतिपादित पूर्ण स्वरूप का द्योतक मन्त्र है। 'सप्तशती' द्वारा भी इसी विशिष्ट मन्त्र का उ‌द्घाटन होता है। इस मन्त्र की उपासना वैष्णव, शैव और शाक्त (समयाचारी और कुलाचारी दोनों) आदि सभी लोग अपने-अपने क्रम के अनुसार करते हैं।
  •  'नवार्ण मन्त्र' का त्र्यक्षर रूपानार हैं- 'ऐ क्लीं ह्रीं', जो श्रीबाला-मन्त्र (ऐं क्लीं सौः) का पर्यायवाचक है।
'मन्त्र-विद्या' मूलतः ब्रह्म-विद्या है, जिसे गुप्त रखा गया है क्योंकि ब्रह्म-विद्यात्मक मन्त्र की उपासना में असावधानी करनेवाले का अनिष्ट होता है। मन्त्रार्थ भी अनेक प्रकार के होते हैं। सद् गुरु शिष्य की योग्यता के अनुसार ही अर्थ का ज्ञान कराते हैं। साधक व शिष्य की साधन- प्रगति के अनुसार मन्त्रार्थ बदलता रहता है। इसी से यह गुरु-गम्य कहा गया है। यहाँ भगवती दुर्गाके सामान्य मन्त्रार्थ का संक्षिप्त दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है-
  • 'दु' से 'प्राण'-शक्ति का बोध होता है, जो समष्टि-रूपिणी और व्यष्टि-रूपिणी दोनों है। इस वीज के पर्याप्त आवृत्ति-अभ्यास से अर्थात् जप की पर्याप्त मात्रा से 'प्राण'-शक्ति चैतन्य होती है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव 'मूलाधार' में स्पन्दन होने से होता है। 'दु' वीज में 'द उम्' ढाई अक्षर हैं। इससे नाद-विन्दु-निसृत 'द' अर्थात् 'दुर्गा + उ' अर्थात् शिव का ज्ञान होता है। यह पर विन्दु अर्थात् निराकारा शक्ति के प्रकाश-शक्ति और शिव अर्थात् रक्त और शुक्ल विन्दु-द्वय का परिचय करानेवाला वीज है।
  • 'हूँ' से प्राण-महा-शक्ति की पुष्टि, सम्वर्धन क्रिया सम्पादित होती है। इसका स्पन्दन 'हृदय' में होता है। 'दूँ' में 'द कम्' ढाई अक्षर हैं। इस वीज का भी अर्थ 'हुँ'-वीज के समान है। 'उ' और 'ऊ' दोनों से शिव का बोध होता है।
  • 'ही' से प्रपञ्चेश्वरी विश्व-रूपिणी त्रिपुर-सुन्दरी की पर्याय-वाचक देवता का बोध होता है। यह भोग और मोक्ष-दायक मन्त्र है। पर्याप्त अभ्यास के पश्चात् इसका स्पन्दन 'आज्ञा'-चक्र या 'भू' मध्य में होता हैं। इससे अभेद-वृत्ति और भेद- वृत्ति का ज्ञान होता है। 'मोक्ष' की आकांक्षा करनेवालों के लिए यह 'अभेद- वृत्ति' द्योतक और सकाम उपासकों के हेतु 'भेद-वृत्ति' द्योतक है। 
'ह्रीं' को 'देवी-प्रणव' कहते हैं। यह काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी आदि अनेक महा-विद्याओं का और अन्य देवताओं यथा बटुक भैरव आदि का भी वीज-मन्त्र अर्थात् सूक्ष्म शाब्दिक स्वरूप है। इस वीज में सन्निहित वर्ण है 'हरई+म्'। इन वर्णों के तात्पर्यों से ही वीज के पूर्ण तात्पर्य का पता मिलता है।
'ह'-कार-प्राण-वीज है, जिससे सृष्टि-क्रिया होती है। इसकी छः ऊर्मियाँ हैं- 
  • १ बुभुक्षा, 
  • पिपासा,
  • मोह,
  • मद,
  • जरा और
  • मृत्यु।
  1. 'रेफ' वा 'र'-कार अग्नि वा तैजस वीज है। इसी से दीप्त होकर प्राण या चेतना गतिशील होती है। इसके चार गुण हैं- 'रेफोत्या गुणाश्चत्वार एव च।
  2. 'ई'-कार षट्-गुण का द्योतक है। इन गुणों के नाम है-१ मन, २ बुद्धि, ३ अहङ्कार, ४ चित्त, ५ सङ्घात और ६ चेतना।
अर्थ 'म'-कार वा नाद-बिन्दु से घनीभूता परा-शक्ति के विकास वा संसृति का बोध होता है।
परा घनीभूता विन्दु-रूपिणी अव्यक्ता मूला प्राण व चिति महा-शक्ति है। इसकी 'नाद' रूपी संसृति है। यही संसृति 'ह' कार या चञ्चला, मध्यावस्था प्राण-शक्ति हो जाती है, जिसकी तैजस् शक्ति रेफ 'र' कार है। यह वीज-महा-शक्ति-प्रणव की महा-शक्ति के सदृश है। इन दोनों में कोई भेद नहीं है। सृष्टि-क्रम से या अनुलोम-क्रम से यह प्रपञ्च-कारिका या भोग-दायिनी शक्ति है और संहार-क्रम या विलोम क्रम से यह लय-कारिका या मोक्ष- दायिका शक्ति है।
अथवा 'ही' से पर-विन्दु से निस्त 'नाद' शक्ति और उससे निसृत 'शिव' एवं तैजस प्राण-शक्ति का बोध होता है 'ह' शिव र 'ई' प्रकृति (ओजम्)।
पुनः 'ह' से परमात्मज जीव (हंस) के, और 'र' से रक्त या रजो गुण के अर्थ से इस वीज से नाद-विन्दु से निसृत रजो-गुण-मय परमात्मा और जीवात्मा दोनों का बोध होता है।
अष्टाक्षरी विद्या (मन्त्र) ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः' का अर्थ यह है कि निर्गुणा और सगुणा अर्थात् चिदचिदात्मक ब्रह्म-स्वरूप दुर्गा में एकता है अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा में अभेद है।
इसी प्रकार पूर्वोक्त बीज-द्वय और इस व्यापक देवी-प्रणव से तथा नवार्ण मन्त्र से अनेक तात्पयों का बोध होता है।
  • नवार्ण मन्त्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का अर्थ है कि वाक्-शक्ति, 
  1. अर्थ-
शक्ति और काम-शक्ति रखनेवाली चामुण्डा अर्थात् भोग एवं मोक्ष-दायिनी परमा शक्ति या धर्म-शक्ति-शालिनी परमा धर्मी-शक्ति से मैं तादात्म्य-भाव स्थापित करता हूँ। 'वीज' त्रय से सत्, चित् और आनन्द का बोध होता है।
'नवार्ण मन्त्र' को कोई-कोई 'नवार्णव' मन्त्र भी कहते हैं। नव अर्णव अर्थात् नी समुद्र। इस मन्त्र में नी अक्षर हैं, तथा प्रत्येक अक्षर एक समुद्र है। 
यथा-
  • 'ऐ-कार'- ॐकार की भाँति 'ऐं' डाई अक्षर का वीज है-अ + ई = ऐ।' जैसे 'अ' को गति मिलने से 'उ' बनता है, वैसे ही उसके प्रसारित होने से 'इ' कार बनता है। इस प्रकार 'अ'-कार पर मन द्वारा दबाव डालकर उसे जबर्दस्ती खींचने से 'ऐ' बनता है। 'प्रणव' से मात्र क्रिया बताई गई है। उसमें दर्शन नहीं है। मन को दर्शन में लगाने से उसमें सङ्घर्षण पैदा होता है। इसी प्रकार अ-कार को दर्शनात्मक बनाकर दबाव डालने से 'ऐ' बनेगा। 'प्रणव' की क्रिया शून्य में है। 'प्रणव' का दर्शन लक्ष्य से वाणी में स्थूल उपयोग करने पर 'ऐ' बनता है। अतएव 'ऐं'-वाग्-बीज यानी वाणी का वीज है। 'ॐ' की भाँति 'ऐं' में भी तीनों क्रियाएँ समाई हुई है। 'अ-कार' उत्पत्ति बताता है, अ-कार में धारणा उत्पन्न होकर वह खींचा जाएगा तब 'इ'-कार बनेगा, जो स्थिति बताता है और बिन्दु लय बताता है। वाग्-वीज का चिद-भाव प्रसरण युक्त है। इसलिए क्रिया प्रसरण में मिल जाती है। ॐ- कार में गति है और 'अ' को गति मिलने पर 'उ' बनता है। प्रकृति में गति है, प्रसरण नहीं। इसलिए प्रकृति में 'उ'-कार मिलेगा, 'ए' कार नहीं मिल सकता। 'प्रणव' और 'वाग् वीज' में यही एक अन्तर है। 'ऐं' याने विज्ञान-युक्त वाणी, जिससे अस्तित्व उठकर उन्नत होता है। वाग्-बीज = वाक्-शक्ति, जो विश्व-ज्ञान प्राप्त करने का एक मात्र साधन है। क्रोध-रूपी सागर को वाग्-बीज ही पार करा सकता है।
  • 'हीं' माया-बीज है। यह अत्यन्त विचित्र वीज है। तुलसीदास जी ने कहा है 'मैं अरु मोर तोर हैं माया।' अर्थात् 'मैं, मेरा, तेरा' यही 'माया' है। 'माया' ममत्व, मोह। ममत्व के कारण मन का सुखेच्छा में फँसना ही 'मोह' है। माया-रूपी सागर को 'माया' चीज ही पार करा सकता है। इस बीज के विषय में ऊपर लिखा जा चुका है।
  • 'क्लीं' अर्थात् काम-बीज नवार्ण का तीसरा अक्षर है। 'काम' अत्यन्त ही भयङ्कर समुद्र है। 'काम' व्यक्ति को अवनत कर सकता है, किन्तु इसका सदुपयोग किया जाय, तो इससे व्यक्ति उत्तमोत्तम मार्ग प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवती 'श्री' की अनन्त शक्ति कामेश्वरी है। काम-बीज 'क्लीं'क, ल, ई तथा म् से बना है। 'क'- 'कामना' भाव बताता है। 'ल'-कार-भू-बीज है, 'इ' कार शक्ति-बीज है और 'बिन्दु'-लय-भाव बताता है। 'क'- कार बाहर से ढका हुआ है, उसमें स्वर, विसर्ग या बिन्दु के भाव जाग्रत् नहीं होते, किन्तु वह ज्योतिर्मय है। देखने का प्रयत्न करने पर इसमें आच्छादित प्रकाश दिखलाई पड़ेगा। यह चैतन्य चित् है तथा इससे दूसरे पदार्थों के भोगने की लालसा होती है। जब 'क' में 'ल' मिल कर माया में वासना-युक्त चित् 'ई' शक्ति-सहित प्रस्फुटित होता है, तब सब प्रकार की वासनाएँ जागती हैं। कामना न करते हुए भी सारे विश्व की सम्पूर्ण कामनाएँ जिसमें लय होती हैं, वहीं पूर्ण-काम है। प्रत्येक कामना उसके सम्मुख होती है, मानो कहती है, 'मुझे स्वीकार करो।' ऐसा व्यक्ति कुछ भी कामना नहीं करता। सम्पूर्ण कामनाएँ स्थूल भाव और शक्ति-सहित उसमें लय होती हैं।
  • 'चा' चकार 'लोभ' रूपी चौथा सागर है। 'अतृप्ति' का नाम ही 'लोभ' है। इससे मनुष्य एक दूसरे का गला काटने को तैयार हो जाता है। लोभ-वश संग्रहण करने की प्रवृत्ति से स्वार्थ इतना अधिक बढ़ जाता है कि व्यक्ति किसी भी प्रकार का अन्याय करने में सङ्कोच नहीं करता। अतएव अगर लोभ को बाह्य रूप से न बढ़ने देकर मात्र आन्तरिक रूप से मन को सशक्त बनाने में लगाए, तो जितनी अधिक शक्ति सञ्चित होगी, व्यक्ति उतना ही उन्नत होगा तथा मन उतना ही प्रस्फुटित होगा।
  • 'मु' 'मद' रूपी सागर है। 'म'-कार 'हैं' बीज है। इसलिए द्रव-पूजन के अवसर पर 'र' बीज कहा जाता है। 'म' अमृत-बीज है तथा द्रव का अमृतीकरण करने के लिए इसका ध्यान करना पड़ता है। द्रव लेने से प्रारम्भ में उन्माद तथा अन्त में मूर्चा आती है। इन दोनों में मन की निरोध-वृत्ति निष्क्रिय हो जाती है तथा इसकी निष्क्रियता से मन अन्य किसी भी वृत्ति के वश में हो सकता है, किन्तु अगर मन को किसी आनन्द-मय एकाग्रता में स्थिर किया जाए, तो मन का बुद्धि से एकाकार होगा तथा बुद्धि से मिलाप होने के कारण मन अन्य विषयों की ओर आकर्षित न होकर बुद्धि में, जिसका आत्मा से सम्बन्ध है, मग्न हो जाएगा।
  • 'डा' 'मत्सर'-रूपी छठे समुद्र को पार कराता है। 'ड' जड़ता-बोधक अक्षर है। जड़त्व से व्यक्ति में मत्सर बढ़ता है, जो व्यक्ति को पतित करता है। व्यक्ति में जितना ही ज्ञान बढ़ता है, उतनी ही शङ्का बढ़ती जाती है, जिससे उसमें श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती। जड़त्व से भरा हुआ मूर्ख चरवाहा 'भेड़ी भेड़ पाती खा' को गुरु का दिया मन्त्र समझ कर उसका श्रद्धा-पूर्वक जप कर गुड़ से चीनी बन गया। इसी प्रकार वाल्मीकि भी अपने जड़त्व के कारण 'मरा-मरा' जपकर महान् व्यक्ति बन गए। इसीलिए अगर मूर्ख में भी श्रद्धा उत्पन्न हो जाए, तो उसकी राह में अधिक आपत्तियाँ नहीं आतीं। श्रद्धा के कारण एकाग्रता हो जाने से व्यक्ति ध्येय पर पहुंच जाता है।
  • 'ये' 'वायु' तथा वाग्-बीज के संयोग से बना है। इसका विकार 'द्वेष' है अर्थात् यह 'द्वेष' रूपी सागर पार कराता है। 'वाक्' से वायु बढ़ती है। व्यक्तियों के वाद-विवाद में जो जीतेगा, उससे दूसरा द्वेष करेगा। उदाहरणार्थ दो समान व्यक्ति अगर एक ही नौकरी के लिए प्रयत्न करते हो, तो जिस एक को नौकरी नहीं मिली, वह दूसरे से द्वेष करेगा। द्वेष से अन्तरङ्ग मित्र शत्रु हो जाते हैं तथा एक दूसरे के कर्म से कलुषित होकर दोनों का पतन होता है। किन्तु द्वेष न कर अगर वह व्यक्ति दूसरे को बधाई दे, तो दूसरा कोशिश कर उसे भी नौकरी दिलाने का प्रयत्न करेगा। अतएव द्वेष से व्यक्ति का पतन होता है तथा द्वेष न करने से व्यक्ति उन्नत होता है।
  • 'वि' 'ईर्ष्या'-रूपी समुद्र पार करानेवाला बीज है। 'व'-कार सदैव शक्ति-युक्त रहता है। 'व'-कार जल-बीज है। जल-बीज शक्ति-युक्त हो, तो बड़े-बड़े जहाज डूब जायें, किन्तु अगर तूफान न आए, तो वर्षा न हो। अतएव तूफान क्षय-कारक होते हुए भी जीवन-प्रद है, कारण वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है।
  • 'च्चे' यह नवम सागर है। इसका सम्बन्ध उपर्युक्त आठों सागरों से है। जिस प्रकार आठ कड़ियाँ एक में रखने के लिए फन्दे में फँसाई जाती है, उसी प्रकार 'मन्त्र' रूपी अष्टाक्षरों को शृङ्खला-बद्ध रखने के लिए द्वित्व से भरे हुए 'च्चे' अक्षर-रूपी फन्दे से दोनों तरफ उन्हें जकड़ा गया है।

नवार्ण मन्त्र

नवार्ण मन्त्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का अर्थ है कि वाक्- शक्ति, अर्थ-शक्ति और काम-शक्ति रखनेवाली चामुण्डा अर्थात् भोग एवं मोक्ष-दायिनी परमा शक्ति या धर्म-शक्ति-शालिनी परमा धर्मी- शक्ति से मैं तादात्म्य-भाव स्थापित करता हूँ। 'वीज' त्रय से सत्, चित् और आनन्द का बोध होता है। 'नवार्ण मन्त्र' को कोई-कोई 'नवार्णव' मन्त्र भी कहते हैं। नव + अर्णव अर्थात् नौ समुद्र। इस मन्त्र में नौ अक्षर है, तथा प्रत्येक अक्षर एक समुद्र है।

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