श्रीदुर्गा-यन्त्र-तत्त्व,Sridurga-yantra-tattva

भगवती श्री दुर्गा-यन्त्र-तत्त्व

भगवती श्री दुर्गा 

'यन्त्र-सङ्केत' अर्थात् 'यन्त्र' का ज्ञान मोक्ष-दायक है, क्योंकि 'यन्त्र' आवरण का द्योतक है। इसके ज्ञान से आवरण का भेदन होता है, जिससे साधक 'बिन्दु' तक पहुंचता है अर्थात् बिन्दु का ज्ञान होता है। यह ज्ञान संहार-क्रम की पूजा से प्राप्त होता है। सृष्टि-क्रम के अनुसार अन्तिम और संहार-क्रम के अनुसार प्रथम आवरण 'भू-पुर' का भेदन करते हुए दलों, वृत्तियों और त्रिकोणों का भेदन कर 'विन्दु' तक जाकर 'बिन्दु' स्थित कूटस्था शक्ति का ज्ञान साधक प्राप्त करता है। यही आवरण-पूजा का रहस्यार्थ है। देखिए, पूजा-रहस्य  'यन्त्र' की पर्यायवाचक संज्ञा 'चक्र' है, जो अनेकार्थ-वाचक है। 'चक्र'- चक् धातु से बना है (चक्र + र क्) जिसका प्रयोग शत्रु अर्थात् विजातीय पदार्थ के ताड़न में भी होता है। इस प्रकार यह 'दुर्गा' का बोधक है, जिसमें 'बिन्दु' रूपिणी या 'विन्दु' मध्यावस्थिता दुर्गा महा- शक्ति रहती है।

श्रीदुर्गा-यन्त्र-तत्त्व,Sridurga-yantra-tattva

स्थूल दृष्टि से 'चक्र' या 'यन्त्र' को भगवती दुर्गा का निवास स्थान कह सकते हैं। फिर इसी 'चक्र' पद को, यदि 'कृ' धातु से बना मानें, तो अर्थ होता है काम करने का उपकरण अर्थात् जिससे कोई कार्य सम्पादित हो। यहाँ पूर्वार्थ हो लगता है।
मन्त्र के सदृश 'चक्र' या 'यन्त्र' असंख्य है। 'ध्यान' अर्थात् रूप-कल्पना के सदृश अपनी-
अपनी सूझ या दृष्टि-कोण के अनुसार ही 'यन्त्रों' या 'चक्रों' की संख्या असीम है। वस्तुतः सनातन आर्य धर्म में एक साध्य के साबन-स्वरूप नाम, रूप, मन्त्र, यन्त्र, मार्ग आदि सब ही अगणित हैं। साधक अपनी मनो-वृत्ति और अधिकार के अनुसार किसी भी रूप की उपासना कर सकता है, परन्तु उपासना-सम्बन्धी प्रत्येक वस्तु का रहस्यार्थ समझ कर।
भगवती दुर्गा के असंख्य पूजन-यन्त्रों में सर्व-प्रधान यन्त्र का उद्धार 'रुद्र-यामल' के अनुसार यह है-

विन्दु-त्रिकोणं रस-कोण-विम्यं, वृत्ताष्ट-पत्राञ्चित-वह्नि-वृत्तम्।
धरा-गृहोद्-भासितमिन्दु-चूडे, दुर्गाश्रयं यन्त्रमिदं प्रदिष्टम्।।
अर्थात् 
  • मध्य में 'विन्दु', 
  • फिर एक 'त्रि-कोण', उसके बाहर 
  • 'अष्ठ-दलान्वित वृत्त' से वेष्टित, 
  • एक 'षट्-कोण' और 
  • सबके बाहर एक 'भू-पुर'।
  1. विन्दु-यह घनीभूता, अचिन्त्या, अवर्णनीया, अदृष्टा आदि लक्षणोपेता निराकारा महा-शक्ति का द्योतक सङ्केत है। जिस प्रकार वह महतो महीयान अर्थात् बड़े-से-बड़ी अर्थात् सबसे बड़ी है, उसी प्रकार अणोरणीयान् अर्थात् अणु का भी अणु अर्थात् छोटे-से-छोटी, जिसकी धारणा  नहीं हो सकती, भी है। बड़े से बड़ी से यहाँ तात्पर्य है, शक्ति-शाली होने से, न कि परिमाण में। कारण परिमाण में तो 'विन्दु' - शून्य रूपी है। वास्तव में 'विन्दु' - प्राण-शक्ति का परिचायक है, जिससे किसी भी पदार्थ का अस्तित्व है। साथ ही जो सर्व-व्यापी है। इसे वैज्ञानिक शब्दों में 'सर्गाणु' अर्थात् सृजन या संसृति का मूलाणु कह सकते हैं। 'नित्या हृदय' के अनुसार 'वैन्दव चक्क्र' की गति अप्रतिम, अप्रमेय और अचिन्त्य है। 'योग वासिष्ठ' के शब्दों में 'बिन्दु' मध्य-स्थित विलक्षण रूप वह है, जिसका ज्ञान प्रज्ञावानों को भी नहीं है। यही विकासात्मिका आदि-शक्ति है, जिससे क्रमशः कर्षाणु, परमाणु, विद्युत् कण (ऐलेक्ट्रोन) आदि बन कर दृश्यमान भौतिक जगत् की सृष्टि हुई है। यह द्वि-अणुक (दो अणुवाला) होकर भी अलक्ष्य है। इसमें जब स्फुरता होती है, तो यह सर्व-प्रथम एक रेखा हो द्वि-अणुक हो जाता है। फिर 'असरेणु' अर्थात् तीन विन्दु-रूप होकर एक त्रिकोणाकृति का होता है। इसी को 'त्रिकोण' कहते हैं।
  2. त्रिकोण-यह 'विन्दु' का प्रथम रूप है, जो लक्ष्य में आ सकता है। अपरिच्छिन्नावस्था में 'बिन्दु' अचिन्त्य था। अब वही परिच्छिन्न रूप में चिन्त्य है। इसकी तीनों भुजाएँ सत्त्व-गुणादि- त्रय गुणोपेत हैं। तात्पर्य है कि एक-एक भुजा एक-एक गुण-रूपा है। यह 'त्रिकोण' - त्रि-भुवन अर्थात् ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय वा प्रमातृ, प्रमाण, प्रमेय का द्योतक भी है। फिर त्रि-प्रकाश अर्थात् सूर्य, चन्द्र, अग्नि-रूप वृत्त-त्रय-प्रकाश-रूप का भी बोध इससे होता है।वैज्ञानिक दृष्टि-कोण से 'विन्दु' ही स्वेच्छा से लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई युक्त सावयव और परिमित 'त्रिकोण'-स्वरूप बनता है। यही प्रथम विकास है। अव्यक्ता प्रकृति व्यक्त होने चली है। 'त्रिकोण' की तीनों भुजाएँ क्रमशः इच्छा, ज्ञान और क्रिया-इन तीन शक्तियों की द्योतक है। द्वि-अणुक स्वरूप में केवल इच्छा और ज्ञान शक्ति-द्वय रूप होने से जो अलक्षित थी, वह क्रिया- शक्ति-द्योतक तीसरे विन्दु के संयोग से अर्थात् त्रसरेणु तक प्रसारित होने पर लक्षितावस्था में आ गई है।
  3.  बट्-कोण-त्रि-गुणात्मिका महा-शक्ति-रूपी 'त्रि-कोण' अपने को षट्-गुण- द्योतक 'षट्-कोण' से वेष्टित करता है।पर-ज्योति-रूपी 'बिन्दु' के त्रिगुणात्मक होने से किरणें प्रसारित होती है, जिससे ब्रह्म ईश्वर- रूप में आता है। 'ईश्वर' -षट्-गुणोपेत या षडैश्वर्य्य-युक्त होता है। 'ईश्वर' के ये छः गुण हैं- 
  • ऐश्वर्य, 
  • धर्म, 
  • यश, 
  • श्री, 
  • ज्ञान और 
  • विज्ञान। 
अन्य मत से 
  • ऐश्वर्य, 
  • बीर्य, 
  • यश, 
  • सौभाग्य,
  • ज्ञान और 
  • वैराग्य-ये ही छः प्रकार के 'भग' या 'ऐश्वर्य' है। ये छहोंकोई द्रव्य नहीं है, प्रकाश-शक्ति द्योतक 'विन्दु' की प्रतिभाएँ हैं, अतः वे 'बिम्ब' कहे गए हैं। (४) अष्ट-दलान्वित वह्नि-वृत्त-पद् गुणात्मक ईश्वरी सत्ता को 'बिन्दु' रूपी परमा सत्ता अपनी आवरण-शक्ति अर्थात् माया द्वारा वेष्टन कर प्रपञ्च करती है। इसी को अर्थात् आवृत्त करनेवाली को 'वृत्ति' - वृत्त कहते हैं। 'विन्दु' रूपी मन से समष्टि मन का तात्पर्य है, व्यष्टि मनका नहीं। प्राण-शक्ति अपनी स्पन्दन-शक्ति से आठ प्रकार की चाल से वृत्ति बनाती है, अपने को वृत्ताकार में परिणत करती है। इस 'वृत्त' की अष्ट-वृत्तियाँ अष्टधा प्रकृति की आठ वृत्तियाँ हैं, जोदृश्यमान प्रपञ्च है।'वृत्त' से अनेक तात्पयों का ज्ञान होता है। इससे 'माया' अर्थात् परिच्छिन्न करनेवाली आवरण-शक्ति का; 'संसृति' अर्थात् पूर्ण-रूपिणी के अनेक पूर्ण रूपों में परिणत होने का, 'काल- शक्ति' के नृत्य का भाव व्यक्त होता है। संक्षेप में यह चित्-ज्योति का प्रसार है। इसी कारण यह ज्योति-वाचक 'वह्नि' के विशेषण से युक्त है।
'अष्ट-दल'-वृत्त के आठ 'दल' या 'पत्र' हैं। विकास-क्रिया में वक्रता अर्थात् मोड़-माड़ होती है। ये पत्र इन्हीं के द्योतक है। 'पत्र' का शब्दार्थ भी ऐसा ही है-'पतृ + ष्टन्'। पत्र का अर्थ है-चलन, साधन। इसी से इनका अर्थ है-रथ, घोड़ा, ऊँट इत्यादि। पक्षी के डैने (पंखो) को भी पत्र कहते हैं। जिस प्रकार हम रथ, घोड़े, ऊँट आंदि पर बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान को शीघ्र और सुगमता से जा आ सकते हैं, पक्षी अपने पक्षों के सहारे उड़ सकते हैं, उसी प्रकार अव्यक्ता प्रकृति अपने आठ पत्रों अर्थात् १ अहङ्कार, २ बुद्धि, ३ मन, ४ आकाश, ५ वायु, ६ अग्नि, ७ जल और ८ पृथ्वी के द्वारा अपने आपको व्यक्त करती है। इन्हीं को 'सूक्ष्म आठ पुरियाँ' (सूक्ष्म- पुर्य्यष्टक) श्रुतियों में और तन्त्रों में कहा है। समष्टि-भाव में वे 'अष्ट-दल' - १ प्रकृति, २ महत्तत्त्व, ३ अहङ्कार, ४ पञ्च-तन्मात्रा-गण, ५ पञ्च-भूत, ६ दश इन्द्रिय, ७ अन्तःकरण और ८ पुरुष के द्योतक हैं। व्यष्टि-भाव में १ काम, २ क्रोध, ३ लोभ, ४ मोह, ५ मद, ६ मात्सर्य्य, ७ पुण्य और ८ पाप का इससे बोध होता है। इन पत्रों की अधिष्ठात्री देवताओं- ब्राह्मी आदि की भावना भी ऐसी
ही है। देखिए, 'भावनोपनिषत् '।
  1. 5 भू-पुर-सूक्ष्म महा-प्राण-शक्ति अष्टधा प्रकृति-रूप में दसों दिशाओं में दश-प्राण- सम्पन्ना सृष्टि करती है। इन दस प्राण-शक्तियों को क्रमशः १ प्राण, २ अपान, ३ व्यान, ४ उदान, ५ समान, ६ नाग, ७ कूर्म, ८ कुकर, ९ देवदत्त और १० धनञ्जय कहते हैं। इन्हीं शक्तियों के साधन से अणिमादि दस सिद्धियाँ मिलती हैं। व्यष्टि-भाव में प्रथम पञ्च-वायु जठराग्नि के १ रेचक, २ पाचक, ३ शोषक, ४ दाहक और ५ प्लावक पाँच रूप हैं तथा अन्तिम पाँच नागादि पञ्च-प्राण-१ क्षारक, २ उद्‌गारक, ३ क्षोभकर, ४ जृम्भक और ५ मोहक रूपों में अवस्थित है। ये दशो प्राण वह्नि की दश कलाओं के द्योतक हैं। श्रीदुर्गा भगवती के 'यन्त्र' या 'चक्र' का संक्षेप में यही सङ्केत (भावार्थ) है। यह समष्ट्यात्मक चक्र सभी जीवों के शरीर में है, जिस प्रकार अन्य महा-शक्तियों (महा-विद्याओं) के चक्र का भी अस्तित्व पिण्डाण्ड (जीव-शरीर) में उन-उन विशेष शक्ति या महा-विद्या के उपासक अपने-अपने क्रम से मानते हैं। सारांश यह है कि सभी 'श्री चक्र' एक ही प्राण-शक्ति तत्त्व के परिचायक हैं। इसका ज्ञान प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।

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