मकर संक्रांति के भारत में विभिन्न नाम मकर संक्रान्ति का महत्व, Different names of Makar Sankranti in India Importance of Makar Sankranti

मकर संक्रांति के भारत में विभिन्न नाम महत्व

मकर संक्रांति

सूर्य के मकर राशि मे प्रवेश करने के उपलक्ष्य में तथा सूर्य के उत्तरायण होने पर मनाया जाने वाला प्रमुख हिंदू त्यौहार हैं। मकर संक्रान्ति भारत का प्रमुख पर्व है तथा यह पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। इसी दिवस से सूर्य उत्तरायण की ओर अग्रसर होने लगता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है।सूर्य की उदिया तिथि के आधार पर यह पर्व मनाया जाता है। सोमवार को सूर्य देव धनु राशि से निकलकर प्रातः २.५४ मिनट पर प्रवेश करेंगे अतः सूर्य की उदिया तिथि सोमवार को ही होगी। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक,केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं।
Different names of Makar Sankranti in India Importance of Makar Sankranti

मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं।
यह भारतवर्ष तथा नेपाल के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम व भांति-भांति के रीति -रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है।

मकर संक्रांति के भारत में विभिन्न नाम;-

मकर संक्रान्ति :छत्तीसगढ़,गोआ,ओड़ीसा,हरियाणा, बिहार,झारखण्ड,आंध्र प्रदेश,तेलंगाना,कर्नाटक,केरल,
मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र,मणिपुर,राजस्थान,सिक्किम,उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड,पश्चिम बंगाल,गुजरात और जम्मू।

ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल : तमिलनाडु,
उत्तरायण : गुजरात, उत्तराखण्ड,
माघी : हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,पंजाब,
भोगाली बिहु : असम,
शिशुर सेंक्रात : कश्मीर घाटी,
खिचड़ी : उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार,
पौष संक्रान्ति : पश्चिम बंगाल,
मकर संक्रमण : कर्नाटक,
लोहड़ी : पंजाब,

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भारत में मकर संक्रान्ति;- सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व १४ जनवरी को ही मनाया जाता है। अगर संक्रांति १५ जनवरी को होती है तो लोहड़ी १४ जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल,गुड़,चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली,तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियां आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते है। बेटियाँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे(बेटे) के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है।
उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है।
इलाहाबाद में गंगा,यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगता है जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। १४ जनवरी से ही इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक पूरे एक महीने किसी भी शुभ कार्य को नहीं किया जाता है। जैसे शादी-ब्याह,यज्ञ आदि नहीं किये जाते हैं।१४ जनवरी अर्थात मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर सारे शुभ कार्यों शुरुआत होता है।
माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि के आख़िरी स्नान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी परम्परा है।बागेश्वर में बड़ा मेला होता है। जिस वर्ष कुंभ मेला आयोजित होता है उंस वर्ष कुम्भ स्नान भी आज के दिन से ही आरम्भ हो जाता है। वैसे गंगा-स्नान रामेश्वर,चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान्न आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। इस पर्व पर क्षेत्र में गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े-बड़े मेले लगते है। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है। गोरखपुर का गोरखधाम का खिचड़ी मेला जगविख्यात है।
बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम
से जाना जाता है। इस दिन उड़द,चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण,ऊनी वस्त्र,कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं -"तिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला" अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।
इस दिन महिलाएँ आपस में तिल,गुड़,रोली और हल्दी बाँटती हैं।
बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहाँ लोगों की अपार भीड़ होती है। इसीलिए कहा जाता है-"सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।"
तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं प्रथम दिन भोगी-पोंगल,द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल।
इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है,दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है,जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।
असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं।
राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।

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मकर संक्रान्ति का महत्व;-

  • शास्त्रों के अनुसार,दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात्स कारात्मकता का प्रतीक माना गया है।
  • इसीलिए इस दिन जप,तप,दान,स्नान,श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है।
  • ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है।
  • इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
  • मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है।
  • इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में  स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है।
सामान्यत: 
  • सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं,किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है।
  • यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है।
भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है।  इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा ग्रीष्म काल शुरू होने लगता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना,आराधना एवं पूजन कर,उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियाँ चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं,किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण यह पर्व प्रतिवर्ष १४ जनवरी को ही पड़ता है।

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