अनोखी होली ! भारत में होली मनाने के 10 अनोखे रूप ,Unique Holi ! 10 unique forms of celebrating Holi in India

अनोखी होली ! भारत में होली मनाने के 10 अनोखे रूप

बरसाना की लट्ठमार होली –उत्तर प्रदेश 

सबसे पहले बात होती है ब्रज की होली की, यहां भी सबसे ज्यादा मशहूर है- बरसाना की लट्ठमार होली। बरसाना राधा का जन्मस्थान है। इस दिन लट्ठ महिलाओं के हाथ में रहता है और नन्दगांव के पुरुषों (गोप) जो राधा के मन्दिर ‘लाडलीजी’ पर झंडा फहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें महिलाओं के लट्ठ से बचना होता है। इस दौरान होरी भी गाई जाती है, जो श्रीकृष्ण और राधा के बीच वार्तालाप पर आधारित होती है। पूरे उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर मनाई जाने वाली लट्ठमार होली की उत्पत्ति हिंदू पौराणिक कथाओं में हुई है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने राधा को छेड़ने और उनके गांव बरसाना में उनके साथ होली खेलने की कोशिश की थी। स्थानीय महिलाएं आक्रोशित हो गयीं और लाठियां लेकर उसे खदेड़ दिया.
Unique Holi ! 10 unique forms of celebrating Holi in India

तमाशा होली –राजस्थान में 

यहां उत्सव वास्तव में भव्य माना जाता है और उदयपुर के शाही मेवाड़ परिवार द्वारा आयोजित किया जाता है । उत्सव के हिस्से के रूप में एक फैंसी जुलूस होता है और इसमें कई सजाए गए घोड़े और शाही बैंड शामिल होते हैं।
राजस्थान में होली के अवसर पर तमाशे की परंपरा है। इसमें किसी नुक्कड़ नाटक की शैली में मंच सज्जा कर कलाकार आते हैं और अपने पारंपरिक हुनर का नृत्य और अभिनय से परिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं। तमाशा की विषय वस्तु पौराणिक कहानियों और चरित्रों के इर्दगिर्द घूमती हुई इन चरित्रों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी व्यंग्य करती है।

भगौरिया होली – मध्यप्रदेश की 

मध्यप्रदेश में रहने वाले भील आदिवासियों के लिए होली विशेष होती है। इस भील होली को भगौरिया कहते हैं। वयस्‍क होते लड़कों को इस दिन अपना मनपसंद जीवनसाथी चुनने की छूट होती है। भीलों का होली मनाने का तरीका विशिष्‍ट है। इस दिन वो आम की मंजरियों, टेसू के फूल और गेहूं की बालियों की पूजा करते हैं और नए जीवन की शुरुआत के लिए प्रार्थना करते हैं।

बैठकी होली, महिला होली, खड़ी होली-उत्तराखंड 

उत्तराखंड वास्तव में कई अलग-अलग नामों से जानी जाती है। बैठकी होली, महिला होली, खड़ी होली ये सभी यहां के त्योहार के सामान्य नाम हैं। यहां के उत्सवों में पारंपरिक पोशाक पहनने वाले और शहर के चारों ओर घूमने वाले लोक धुनों पर गाने और नृत्य करने वाले शामिल होते हैं। लोगों के इस जमावड़े को टोली के नाम से जाना जाता है और स्थानीय लोग एक-दूसरे के चेहरे पर रंग लगाकर और पूरे समय नाच-गाकर एक-दूसरे का स्वागत करते हैं। भारत के अन्य हिस्सों के विपरीत, गीत और नृत्य उत्तराखंड में होली समारोह का एक अनिवार्य हिस्सा हैं।

गुजरात में होली -

होली के मौके पर गुजरात में मस्‍त युवकों की टोलियां सड़कों पर नाचते-गाते चलती हैं। गलियों में ऊंचाई पर दही की मटकियां लगाई जाती हैं और युवकों को यहां तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह भगवान कृष्‍ण के गोपियों की मटकी फोड़ने से प्रेरित है। ऐसे में कौन युवक कन्‍हैया नहीं बनना चाहेगा और कौन होगी जो राधा नहीं बनना चाहेगी।

मणिपुर की होली -

मणिपुर में होली पूरे 6 दिनों तक चलती है, जिसे योसांग कहते हैं। यहां होली की शुरुआत में होलिका न बनाकर एक घासफूस की एक झोपड़ी बनाई जाती है और इसमें आग लगाते हैं। अगले दिन लड़कों की टोलियां लड़कियों के साथ होली खेलती है, इसके बदले में उन्‍हें लड़की को उपहार देना होता है।

फागुवा होली –बिहार में-

कई अन्य भारतीय राज्यों की तरह, होलिका दहन यहां भी उत्सव का एक अभिन्न अंग है। होलिका दहन का उत्सव भी अन्य राज्यों की तरह ही है। अगले दिन, पूरे दिन गीले और सूखे रंगों और पारंपरिक संगीत और लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है।
बिहार में होली का त्यौहार तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन रात में होलिका दहन होता है, जिसे यहां संवत्‍सर दहन के नाम से भी जाना जाता है और लोग इस आग के चारों ओर घूमकर नृत्‍य करते हैं। अगले दिन इससे निकली राख से होली खेली जाती है, जो धुलेठी कहलाती है और तीसरा दिन रंगों का होता है। स्‍त्री और पुरुषों की टोलियां घर-घर जाकर डोल की थाप पर नृत्‍य करते हैं। फागुन मतलब लाल रंग होता है इसलिए इसे फगुवा होली भी कहते है।

धूलेंडी होली –हरियाणा की - 

भारत के हरियाणा में होली धुलेंडी के रूप में मनाते हैं और सूखी होली – गुलाल और अबीर से खेलते हैं। भाभियों को इस दिन पूरी छूट रहती है कि वे अपने देवरों को साल भर सताने का दण्ड दें। भाभियाँ देवरों को तरह-तरह से सताती हैं और देवर बेचारे चुपचाप झेलते हैं, क्योंकि यह दिन तो भाभियों का दिन होता है। शाम को देवर अपनी भाभी के लिए उपहार लाता है और भाभी उसे आशीर्वाद देती है।

बंगाल में डोल पूर्णिमा 

पश्चिम बंगाल की मिसाल सुंदरता के रूप में दी जाती है। यहां की होली भी बहुत खूबसूरत रूप से मनाई जाती है। इस दिन लोग बसंती रंग के कपड़े पहनते हैं और फूलों से श्रंगार करते हैं। सुबह से ही नृत्‍य और संगीत का कार्यक्रम चलता है। घरों में मीठे पकवान बनते हैं। इस पर्व को डोल जात्रा के नाम से भी जाना जाता है। इस मौके पर राधा-कृष्‍ण की प्रतिमा झूले में स्‍थापित की जाती है और महिलाएं बारी-बारी से इसे झुलाती हैं।

 मोहल्ला का मेला –पंजाब में होला

होला मोहल्ला के नाम से जाना जाता है। यह होली के एक दिन बाद मनाया जाता है और वास्तव में, यह सिख योद्धाओं की बहादुरी का जश्न मनाने वाला उत्सव है। यह उत्सव एक विशेष संप्रदाय की विशेषता है, जिसे निहंग सिख के नाम से जाना जाता है ।  पंजाब में भी इस त्यौहार की बहुत धूम रहती है। सिखों के पवित्र धर्मस्थान आनन्दपुर साहिब में होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते है। तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में सिख शौर्यता के हथियारों का प्रदर्शन किया जाता है और वीरता के करतब दिखाए जाते हैं।

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