अग्नि पुराण - अट्ठावनवाँ अध्याय ! Agni Purana - 58 Chapter !

अग्नि पुराण - अट्ठावनवाँ अध्याय ! Agni Purana - 58 Chapter !

अग्निपुराण अध्याय ५८ भगवद्विग्रह को स्नान और शयन कराने की विधि का वर्णन है। स्नानादिविधि-

अग्नि पुराण - अट्ठावनवाँ अध्याय ! Agni Purana - 58 Chapter !

अग्नि पुराण - अट्ठावनवाँ अध्याय ! Agni Purana - 58 Chapter !

भगवानुवाच
एशान्यां जययेत् कुण्डं गुरुर्व्वह्निञ्च वैष्णवम्।
गायत्र्याष्टशतं हुत्वा सम्पातविधिना घटान् ।। १ ।।

प्रोक्षयेत् कारुशालायां शिल्पिभिमुर्त्तिर्व्रजेत्।
तुर्य्यशबदैः कौतुकञ्च बन्धयेद्दक्षिणे करे ।। २ ।।

विष्णवे शिपिविष्टेति ऊर्णासूत्रेण सर्षपैः।
पट्टवस्त्रेण कर्त्तव्यं देशिकस्यापि कौतुकम् ।। ३ ।।

मण्डपे प्रतिमां स्थाप्य सवस्त्रां पूजितां स्तुवन्।
 नमस्तेर्च्यें सुरेशानि प्रणीते विश्वकर्म्मण ।। ४ ।।

प्रभाविताशेषजगद्धात्रि तुभ्यं नमो नमः।
त्वयि सम्पूजयामीशे नारायणमनामयम् ।। ५ ।।

रहिता शिल्पिदोषैस्त्वमृद्धियुक्ता सदा भव।
एवं विज्ञाप्य प्रतिमां नयेत्तां स्नानमण्डपम् ।। ६ ।।

शिल्पिनन्तोषयेद्‌द्रव्यैर्गुरवे गां प्रदापयेत्।
चित्रं देवेति मन्त्रेण नेत्रे चोन्मीलयेत्ततः ।। ७ ।।

अग्निर्ज्योतीति दृष्टिञ्च दद्याद्वै भद्रपीठके।
ततः शक्लानि पुष्पाणि घृतं सिद्धार्थकं तथा ।। ८ ।।

दूर्व्वां कुशाग्रं देवस्य दद्याच्छिरसि देशिकः।
मधुवातेति मन्त्रेण नेत्रे चाभ्यञ्जयेद् गुरुः ।। ९ ।।

हिरण्यगर्भमन्त्रेण इमं मेति च कीर्त्तयेत्
घृतेनाभ्यञ्जयेत् पश्चात् पठन् घृतवतीं पुनः ।। १० ।।

मसूरपिष्टेनोद्वर्त्य अतो देवेति कीर्त्तयन्।
क्षालयेदुष्णतीर्थजैः स्नानं पावमानीति रत्नजैः ।। ११ ।।

द्रुपदादिवेत्यनुलिम्पेदापो हिष्ठेति सेचयेत्।
नदीजैस्तीर्थजैः स्नानं पावमानीति रत्नजै ।। १२ ।।

समुद्रं गच्छ चन्दनैस्तीर्थमृत्कलशेन च।
शन्नो देवीः स्नापयेच्च गायत्र्याप्युष्णवारिणा ।। १३ ।।

पञ्चमृद्भिर्हिरण्येति स्नापयेत्परमेश्वरम्।
सिकताद्भिरिमं मेति वल्मीकोदघटेन च ।। १४ ।

तद्धिष्णोरिति ओषध्यद्भिर्था ओषधीति मन्त्रतः।
यझायज्ञेति काषायैः पञ्चभिर्गव्यकैस्ततः ।। १५ ।।

पयः पृथिव्यां मन्त्रेण याः फलिना फलाम्बुभिः।
विश्वतश्चक्षुः सौम्येन पूर्वेण कलसेन च ।। १६ ।।

सोमं राजानमित्येवं विष्णो रराटं दक्षतः।
हंसः शुचिः पश्चिमेन कुर्य्यादुद्वर्त्तनं हरेः ।। १७ ।।

मूर्द्धानन्दिवमन्त्रेण धात्रीं मांसी च के ददेत् ।
मानस्तोकेति मन्त्रेण गन्धद्वारेति गन्धकैः ।। १८ ।।

इदमापेति च घटैरेकाशीतिपदस्थितैः।
एह्येहि भगवन् विष्णो लोकानुग्रहकारक ।। १९ ।।

यज्ञभागं गृहाणेमं वासुदेव नमोस्तु ते।
अनेनावाह्य देवेशं कुर्यात् कौतुकमोचनम् ।। २० ।।

मुञ्चामि त्वेति सूक्तेन देशिकस्यापि मोचयेत्।
हिरण्मयेन पाद्यं दद्यादतो देवेति चार्घ्यकम् ।। २१ ।।

मधुवाता मधुपर्क्कं मयि गृह्मामि चाचमेत्।
अक्षन्नमीमदन्तेति किरेद्‌दूर्वाक्षतं बुधः ।। २२ ।।

काण्डान्निर्म्मञ्छनं कुर्य्याद्वन्धं गन्धवतीति च।
उन्नयामीति माल्यञ्च इदं विष्णु पवित्रकम् ।। २३ ।।

बृहस्पते वस्त्रयुग्मं वेदाहमित्युत्तरीयकम्।
महाव्रतेन सकलीपुष्पं चौषधयः क्षिपेत् ।। २४ ।।

धूपं दद्याद्‌धूरसीति विभ्राट्‌सूक्तेन चाञ्चनम्।
युञ्जन्तीति च तिलकं दीर्घायुष्ट्वे ति माल्यकम् ।। २५ ।।

इन्द्रच्छत्रेति छत्रन्तु आदर्शन्तु विराजतः।
चामरन्तु विकर्णेन भूषां रथन्तरेण च ।। २६ ।।

व्यजनं वायुदैवत्यैर्मुञ्चामि त्वेति पुष्पकम्।
वेदाद्यैः संस्तुतिं कुर्य्याद्धरेः पुरुषसूक्ततः ।। २७ ।।

सर्वमेतत्समं कुर्य्यात् पिण्डिकादौ हरादिके।
दैवस्योत्थानसमये सौपर्णं सूक्तमुच्चरेत् ।। २८ ।।

उत्तिष्ठेति समुत्थाप्य शय्याया मण्डिकां तथा।
श्रीसूक्तेन चशय्यायां विष्णोस्तु शकलीकृतिः ।। २९ ।।

अतो देवेति सूक्तेन प्रनिमां पिण्डिकां तथा।
श्रीसूक्तेन च शय्यायां विष्णोस्तु शकलीकृतिः ।। ३० ।।

मृगराजं वृषं नागं व्यजनं कलशं तथा।
वैजयन्ततीं तथा भेरीं दीपमित्यष्टमङ्गलम् ।। ३१ ।।

दर्शयेदश्वसूक्तेन पाददेशे त्रिपादिति।
उखां पिधानकं पात्रमम्बिकां दर्व्विकां ददेत् ।। ३२ ।।

मुषलोलूखलं दद्याच्छिलां कम्मार्जनीं तथा।
तथा बोजनभाण्डानि गृहोपकरणानि च ।। ३३ ।।

शिरोदेशे च निद्राख्यं वस्त्ररत्नयुतं घटम्।
खणडखाद्यैः पूरयित्वा स्नपनस्य विधिः स्मृतः ।। ३४ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये स्नपनादिविधानं नाम अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।

अग्नि पुराण - अट्ठावनवाँ अध्याय !-हिन्दी मे -Agni Purana - 58 Chapter!-In Hindi

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं - ब्रह्मन् ! आचार्य ईशानकोण में एक होमकुण्ड तैयार करे और उसमें वैष्णव - अग्नि की स्थापना करे। तदनन्तर गायत्री मन्त्र से एक सौ आठ आहुतियाँ देकर सम्पात-विधि से कलशों का प्रोक्षण करे। तदनन्तर मूर्तिपालक विद्वानों तथा शिल्पियों सहित यजमान बाजे-गाजे के साथ कारुशाला (कारीगर की कर्मशाला) में जाय। वहाँ प्रतिमावर्ती इष्टदेवता के दाहिने हाथ में कौतुक सूत्र (कङ्कण आदि) बाँधे। उसे बाँधते समय ‘विष्णवे शिपिविष्टाय नमः। - इस मन्त्र का पाठ करे। उस समय आचार्य के हाथ में भी ऊनी सूत, सरसों और रेशमी वस्त्र से कौतुक बाँध देना चाहिये । मण्डल में सवस्त्र प्रतिमा की स्थापना और पूजा करके उसकी स्तुति करते हुए कहे- ‘विश्वकर्मा की बनायी हुई देवेश्वरि प्रतिमे! तुम्हें नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌ को प्रभावित करनेवाली जगदम्ब ! तुम्हें मेरा बारंबार प्रणाम है। ईश्वरि! मैं तुममें निरामय नारायणदेव का पूजन करता हूँ। तुम शिल्प सम्बन्धी दोषों से रहित हो; अतः मेरे लिये सदा समृद्धिशालिनी बनी रहो‘ ॥ १-५ ॥
इस तरह प्रार्थना करके प्रतिमा को स्नान-मण्डप में ले जाय। शिल्पी को यथेष्ट द्रव्य देकर संतुष्ट करे। गुरु को गोदान दे। ‘चित्रं देवाना ” इत्यादि मन्त्र से प्रतिमा का नेत्रोन्मीलन करे । ‘अग्निर्ज्योतिः” इत्यादि मन्त्र से दृष्टिसंचार करे। फिर भद्रपीठ पर प्रतिमा को स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य श्वेत पुष्प, घी, सरसों, दूर्वादल तथा कुशाग्र इष्टदेव के सिर पर चढ़ावे ॥ ६-८ ॥
इसके बाद ‘मधु‘ वाता‘ इत्यादि मन्त्र से गुरु प्रतिमा के नेत्रों में अंजन करे। उस समय ‘हिरण्यगर्भः” इत्यादि तथा ‘इमं मे वरुण‘ इत्यादि मन्त्रों का कीर्तन करे। तत्पश्चात् पुनः ‘घृतवती ऋचा का पाठ करते हुए घृत का अभ्यङ्ग लगावे। इसके बाद मसूर के बेसन से उबटन का काम लेकर ‘अतो देवाः” इत्यादि मन्त्र का कीर्तन करे। फिर ‘सप्त ते अग्ने०‘ इत्यादि मन्त्र बोलकर गुरु गर्म जल से प्रतिमा का प्रक्षालन करे। तदनन्तर ‘द्रुपदादिव” इत्यादि मन्त्र से अनुलेपन और ‘अपो ‘ हि ष्ठा०‘ इत्यादि से अभिषेक करे। अभिषेक के पश्चात् नदी एवं तीर्थ के जल से स्नान कराकर ‘पावमानी ऋचा ( शु० यजु० ३९-४३ ) का पाठ करते हुए, रत्न- स्पर्श से युक्त जल द्वारा स्नान करावे। ‘समुद्रं ” गच्छ स्वाहा‘ इत्यादि मन्त्र पढ़कर तीर्थ की मृत्तिका और कलश के जल से स्नान करावे ‘शं नो” देवी: ‘ इत्यादि तथा गायत्री मन्त्र से गरम जल के द्वारा इष्टदेव की प्रतिमा को नहलावे ॥९-१३॥
‘हिरण्यगर्भः ‘ इत्यादि मन्त्र से पाँच प्रकार की मृत्तिकाओं द्वारा परमेश्वर को स्नान करावे। इसके बाद ‘इमं मे गङ्गे यमुने‘ इत्यादि मन्त्र से बालुकामिश्रित जल के द्वारा तथा ‘तद् विष्णोः‘ इत्यादि मन्त्र से बाँबी की मिट्टी मिले हुए जल से पूर्ण घट के द्वारा भगवान्‌ को स्नान करावे। ‘या ओषधीः‘ इत्यादि मन्त्र से ओषधिमिश्रित जल के द्वारा, ‘यज्ञा यज्ञा‘ इत्यादि मन्त्र से आँवले आदि कसैले पदार्थों से मिश्रित जल के द्वारा, ‘पयः पृथिव्याम्‘ इत्यादि मन्त्र से पञ्चगव्यों द्वारा तथा ‘याः फलिनी: इत्यादि मन्त्र से फलमिश्रित जल के द्वारा भगवान्‌ को नहलावे । ‘विश्वतश्चक्षुः” इत्यादि मन्त्र से उत्तरवर्ती कलश द्वारा, ‘सोमं राजानम्‘ इस मन्त्र से पूर्ववर्ती कलश द्वारा, ‘विष्णो‘ रराटमसि‘ इत्यादि मन्त्र से दक्षिणवर्ती कलश द्वारा तथा ‘हঌस: शुचिषद् ‘ इत्यादि मन्त्र से पश्चिमवर्ती कलश द्वारा भगवान्‌ को उद्वर्तन स्नान करावे ॥ १४- १७ ॥
‘मूर्द्धानं दिवो, इत्यादि मन्त्र से आँवले मिले हुए जल के द्वारा, ‘मा नस्तोके, इत्यादि मन्त्र से जटामांसीमिश्रित जल के द्वारा, ‘गन्धद्वाराम्, इत्यादि मन्त्र से गन्धमिश्रित जल के द्वारा तथा ‘इदमापः, इत्यादि मन्त्र से इक्यासी पदोंवाले वास्तुमण्डल में रखे गये कलशों द्वारा भगवान्‌ को नहलावे। इस प्रकार स्नान के पश्चात् भगवान्‌ को सम्बोधित करके कहे- ‘भगवन्! समस्त लोकों पर अनुग्रह करनेवाले सर्वव्यापी वासुदेव! आइये, आइये, इस यज्ञभाग को ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है।‘ इस प्रकार देवेश्वर का आवाहन करके उनके हाथ में बँधा हुआ मङ्गलसूत्र खोल दे। उसे खोलते समय ‘मुञ्चामि त्वा, इस मन्त्र का पाठ करे इसी मन्त्र से आचार्य का भी कौतुकसूत्र खोल दे। तदनन्तर ‘हिरण्मयेन इत्यादि मन्त्र से पाद्य और ‘अतो देवाः, इत्यादि मन्त्र से अर्घ्य दे । फिर ‘मधु वाताः‘ इत्यादि मन्त्र से मधुपर्क देकर ‘मयि गृह्णामि, इत्यादि मन्त्र से आचमन करावे । तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष ‘अक्षन्नमीमदन्त, इत्यादि मन्त्र पढ़कर भगवान्के श्रीअङ्गों पर दूर्वा एवं अक्षत बिखेरे ॥ १८-२२ ॥
‘काण्डात् ” इत्यादि मन्त्र से निर्मञ्छन करे। ‘गन्धवती” इत्यादि से गन्ध अर्पित करे। ‘उन्नयामि०‘ इस मन्त्र से फूल-माला और ‘इदं विष्णुः ” इत्यादि मन्त्र से पवित्रक अर्पित करे। ‘बृहस्पते” इत्यादि मन्त्र से एक जोड़ा वस्त्र चढ़ावे । ‘वेदाहमेतम् ‘ इत्यादि से उत्तरीय अर्पित करे । ‘महाव्रतेन‘ इस मन्त्र से फूल और औषध- इन सबको चढ़ावे । तदनन्तर ‘धूरसि” इस मन्त्र से धूप दे। ‘विभ्राट् “ सूक्त से अञ्जन अर्पित करे । ‘युञ्जन्ति‘ इत्यादि मन्त्र से तिलक लगावे । तथा ‘दीर्घात्वाय‘  इस मन्त्र फूलमाला चढ़ावे । ‘इन्द्र क्षत्रमभि‘  इत्यादि मन्त्र से छत्र, ‘विराट् ‘ मन्त्र से दर्पण, ‘विकर्ण‘ मन्त्र से चँवर तथा ‘रथन्तर‘ साम-मन्त्र से आभूषण निवेदित करे ॥ २३-२६ ॥
वायुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा व्यजन, ‘मुञ्चामि त्वा‘ इस मन्त्र से फूल तथा वेदादि (प्रणव) - युक्त पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा श्रीहरि की स्तुति करे। ये सारी वस्तुएँ पिण्डिका आदि पर तथा शिव आदि देवताओं पर इसी प्रकार चढ़ावे। भगवान्को उठाते समय ‘सौपर्ण‘ सूक्त का पाठ करे। ‘प्रभो! उठिये‘ ऐसा कहकर भगवान्‌ को उठावे और मण्डप में शय्या पर ले जाय। उस समय ‘शकुनि‘ सूक्त का पाठ करे। ब्रह्मरथ एवं पालकी आदि के द्वारा भगवान्‌ को शय्या पर ले जाना चाहिये। ‘अतो देवाः‘  इस सूक्त से तथा ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च‘-से प्रतिमा एवं पिण्डिका को शय्या पर पधरावे। तदनन्तर भगवान् विष्णु के लिये निष्कली- करण की क्रिया सम्पादित करे ॥ २७-३० ॥
सिंह, वृषभ, हाथी, व्यजन, कलश, वैजयन्ती (पताका), भेरी तथा दीपक-ये आठ मङ्गलसूचक वस्तुएँ हैं। इन सब वस्तुओं को अश्वसूक्त का पाठ करते हुए भगवान्‌ को दिखावे। ‘त्रिपात् “ इत्यादि मन्त्र से भगवान्के चरण-प्रान्त में उखा (पात्रविशेष), उसका ढक्कन, अम्बिका ( कड़ाही), दर्विका ( करछुल), पात्र, ओखली, मूसल, सिल, झाडू, भोजन-पात्र तथा घर के अन्य सामान रखे । उनके सिर की ओर वस्त्र और रत्न से युक्त एक कलश स्थापित करे, जो खाँड और खाद्य पदार्थ से भरा हुआ हो। उस घट की ‘निद्रा‘ संज्ञा होती है। इस प्रकार भगवान्‌ के शयन की विधि बतायी गयी है ॥ ३१-३४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘स्नपन की विधि आदि का वर्णन‘ नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

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