कुंडकेश्वर महादेव मंदिर,कुंडदेव महादेव टीकमगढ़ में स्थित,Kundakeshvar Mahaadev Mandir,Kundadev Mahaadev Teekamagadh Mein Sthit

कुंडकेश्वर महादेव मंदिर,कुंडदेव महादेव टीकमगढ़ में स्थित

कुंडकेश्वर महादेव 

कुंडेश्वर भारत के मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ से 5 किमी दक्षिण में टीकमगढ़ जिले में एक गाँव स्थित है। यह जमधर नदी के तट पर स्थित एक प्राचीन मंदिर कुंडदेव महादेव के नाम से जाना जाता है, और यही कुंडदेव महादेव मंदिर का स्थान है।  यहां मौजूद शिवलिंग को 13वीं सिद्ध शिवलिंग माना जाता है. इस मंदिर और शिवलिंग से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं और किंवदंतियां हैं

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कुंडेश्वर महादेव की पूजा से संबंधित कुछ सिद्धांत

  1. ईसाई धर्म के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति रक्तचाप, कैंसर, त्वचा रोग या अन्य किसी बड़ी बीमारी से पीड़ित है, तो प्रतिदिन एक लोटा जल कुंडकेश्वर महादेव के नाम से चढ़ाए, तो उसके शरीर के सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
  2. मन अशांत होने पर कुंडकेश्वर महादेव का नाम लेकर एक लोटा जल और बिल्व पत्र चढ़ाएं।
  3. स्वयंभू भगवान कुंडेश्वर को त्राहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है।
  4. द्वापर युग से ही कुंडेश्वर महादेव की पूजा की जा रही है।
  5. उस समय बाणासुर की पुत्री उषा ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी।
  6. आज भी किवदंती है कि उषा आज भी भगवान शिव को जलाभिषेक करने आती हैं।
  • कुंडेश्वर महादेव का मंत्र
कुंडेश्वर महादेव की आराधना ॐ नमः शिवाय -  इस पंचाक्षर मंत्र से या ॐ कुंडेश्वराय नमः - इस पंचाक्षर मंत्र से जा सकते हैं।

कुंडेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी कुछ बातें - कुंडेश्वर महाराज कौन हैं

स्वयं भू भगवान कुंडेश्वर मंदिरे क्षेत्र में तारावें ज्योर्तिलिंग के रूप में पूजा की जाती है। स्वयंभू भगवान कुंडेश्वर की द्वापर युग से पूजा की जा रही है। उस समय बाणासुर की पुत्री उषा ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। वर्तमान समय में भी किवदंती है कि उषा आज भी भगवान शिव को जल न्योछावर करने आती हैं। कुंडेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी कुछ बातें -
  1. यह मंदिर, बुंदेलखंड की काशी कहलाता है.
  2. मान्यता है कि इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग, कुंड से निकला है.
  3. कुंडेश्वर महादेव मंदिर के पास एक कुंड है. यह कुंड, गंगा का चौथा पाया माना जाता है.
  4. कुंडेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी के मुताबिक, इस कुंड में साल भर जल प्रवाहित होता रहता है.
  5. इस कुंड में, आस-पास के क्षेत्र के ग्रामीण जो हरिद्वार नहीं जा सकते, वे अपने परिवार के सदस्यों की अस्थियां विसर्जित करते हैं.
  6. कुंडेश्वर महादेव को बीमारी और रोग मुक्ति का देवता माना जाता है.
  7. कुंडेश्वर महादेव की आराधना के लिए, 'ॐ नमः शिवाय' और 'ॐ कुण्डेश्वराय नमः' मंत्र का इस्तेमाल किया जाता है
  8. किवदंती है कि द्वापर युग में बाणासुर की बेटी ऊषा ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी
  9. कुछ लोगों का मानना है कि भगवान शिव, पास के कुंड में प्रकट हुए थे.
  10. साल 1938 में, वीर सिंह जू देव (द्वितीय) ने प्राचीन मंदिर की खुदाई कराई थी उस समय शिवलिंग 20 फ़ीट ऊंचा निकला था और उसका झुकाव कुंड की ओर था
कुंडकेश्वर महादेव मंदिर,कुंडदेव महादेव टीकमगढ़ में स्थित

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  2. कुमारराम ,भीमेश्वर मंदिर भी कहा जाता है

कुंडकेश्वर महादेव मंदिर पंचमुखी लिंग

इस मंदिर में कुंडे के देवता मौजूद हैं, जो विराजमान हैं, वे पंचमुखी हैं। पंचमुखी शिवलिंग के पांच मुख होते हैं, ऐसा ही एक शिवलिंग अयोध्या में भी है। पंचमुख वाले महादेव की रचना पांच तत्त्वों अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी और जल से हुई है। आपको बता दें कि कुंडे भगवान धाम में मौजूद शिवलिंग की पूजा द्वापर युग से हो रही है। कालभैरव सूत्रों का सर्वनाश करते हैं और संकट में भक्तों की रक्षा भी करते हैं। मगर रुहानियत पर कालभैरव बली भी लेते हैं। ऐसी मान्यता है कि कुंडे में मौजूद लिंग भी बाली है। यहां कभी-कभी बेहद विचित्र घटनाएं होती हैं, जिनमें कभी-कभी एजेंटों की असमय मृत्यु तक हो जाती है। हालाँकि, इसका कोई मतलब नहीं है और यह केवल एक किवदंती ही है।

कुंडकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास

कुंदकेश्वर महादेव रोग मुक्ति के देवता माने जाते हैं। काल को भी हर लेने वाले हैं। मन अशांत हो तो भी कुंदकेश्वर महादेव का नाम स्मरण करते रहना चाहिए। चंदनवन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में अति प्राचीन श्री कुंडेश्वर महादेव का मंदिर विद्यमान है यह मंदिर उज्जैन के 84 महादेव में से 40 नंबर पर आता है ! उज्जैन में 84 महादेव प्रसिद्ध है ! जहां पर भगवान शंकर किसी न किसी कारणवश उस शिवलिंग में प्रकट हुए और तपस्वियों को वरदान देते थे ! आज भी 84 महादेव अवंतिका पुरी में विराजमान है ! श्रावण मास और हर 3 वर्ष में एक बार आने वाले पुरुषोत्तम मास में इन 84 महादेव की यात्रा होती है जिसके फलस्वरूप 8400000 योनियों से मुक्ति मिलती है सांदीपनि आश्रम परिसर स्थित 84 महादेव में 40 नंबर पर आने वाली श्री कुंडेश्वर महादेव विराजमान है इनकी भी एक कथा प्रसिद्ध है जो निम्न है !एक बार की बात है भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती बड़े वेग से नंदी पर बैठकर भ्रमण के लिए निकले , महाकाल वन पहुंचकर माता पार्वती को बड़ी थकान महसूस होने लगी, थकी हुई पार्वती को देखकर भगवान भोलेनाथ ने माता पार्वती से कहा पार्वती तुम यहीं पर विराजमान हो ताकि तुम्हारी थकान दूर हो जाएगी ! मैं थोड़ा आगे तक घूम कर आता हूं , और तुम्हारी सुरक्षा के लिए मेरा यह गण जिसका नाम कुंड है और नंदी तुम्हारे साथ रहेंगे ऐसा कहकर भगवान भोलेनाथ आगे की ओर प्रस्थान कर गए, प्रतीक्षा करते हुए माता पार्वती को कइ प्रहर बीत गए भोलेनाथ नहीं आए तो उन्हें काफी चिंता सताने लगी माता पार्वती निकुंज नामक गणों को आज्ञा दी कि तुम जाओ और भगवान शंकर का पता करके आओ कुंड ने माता से कहां माता भगवान महादेव ने मुझे आप की सुरक्षा के लिए यहां नियुक्त किया है ! माता के आदेश की अवहेलना को देख माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गई और क्रोध वश उन्होंने कुंड को मनुष्य योनि में जाने का शाप दे डाला बहुत अनुनय विनय करने पर माताजी ने कहा हे कुंड मेरा श्राप कभी खाली नहीं जात ,लेकिन तुम यही महाकाल वन स्थित चंदन वन में भगवान शिव की उपासना करो तो तुम्हारा उद्धार हो जाएगा

Kundakeshvar Mahaadev Mandir,Kundadev Mahaadev 

भगवान शंकर जब वापस लौटे तो श्राप के बारे में उन्हें ज्ञात हुआ तो बड़ा दुख हुआ , लेकिन थोड़े वर्षों के बाद भगवान भोलेनाथ शिवलिंग में से प्रकट हुए जिसके सामने कुंड नामक गण तपस्या कर रहा था और कुंड को वापस शगुन के रूप में शामिल करने का वरदान दिया ! तो एक प्राचीन पद्धति कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण से मिलने भगवान महादेव पधारे थे ! यह तिथि कार्तिक मास की वैकुंठ चतुर्दशी पर आती है , उस दिन हरि कृष्ण और हर महादेव का मिलन हुआ था ,अवंतिका नगरी भगवान शिव की नगरी कहलाती है ! भगवान शिव इस नगरी के अधिपति मालिक हैं और भगवान श्री कृष्ण यहां मेहमान स्वरूप इस नगरी में आए हुए थे, अपने अभ्यागत अतिथि का हाल चाल पूछने के लिए भगवान भोलेनाथ  33 कोटि देवी-देवताओं के साथ कार्तिक मास की बैकुंठ चतुर्दशी पर पधारे थे ! दोनों ने एक दूसरे का परस्पर अभिवादन किया तत्पश्चात भगवान कृष्ण और कुंडेश्वर महादेव का अभिषेक पूजन किया गया ! सभी देवगण और समस्त युवाओं की उपस्थिति में यह पूजन संपन्न हुआ इस दिन भगवान शिव को तुलसी अर्पित की गई और भगवान श्री कृष्ण को विलपत्र अर्पण किया गया! तभी से कुंडेश्वर महादेव का स्थान हरिहर मिलन स्थल के नाम से प्रसिद्ध हुआ , आज भी वर्तमान में यहां एक शिवलिंग स्थापित है यहां पर अति प्राचीन प्रतिमा खड़े हुए नंदी की हैं यहां खड़ा हुआ नंदी आदर्श सेवा और सत्कार का प्रतीक है

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