नवरात्रि के दूसरा दिन - मां ब्रह्मचारिणी की कथा और स्वरूप,Navratri Ke Second Day -Maa Brahmacharini Kee Katha Aur Svaroop

नवरात्रि के दूसरा दिन - मां ब्रह्मचारिणी की कथा और स्वरूप

मां ब्रह्मचारिणी को साक्षात ब्रह्म का स्वरूप माना जाता है. मां ब्रह्मचारिणी देवी पार्वती के अविवाहित रूप में पूजी जाती हैं. इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है. मां ब्रह्मचारिणी को सफ़ेद रंग के वस्त्र धारण करती हैं.
Navratri Ke Second Day -Maa Brahmacharini Kee Katha Aur Svaroop

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप इस प्रकार है

  • सफ़ेद रंग के वस्त्र
  • दाहिने हाथ में रुद्राक्ष की माला
  • बाएं हाथ में कमंडल
  • मां ब्रह्मचारिणी पवित्रता, शांति, तप और शुद्ध आचरण का प्रतीक मानी जाती हैं.
  • मां ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को संदेश देती हैं कि परिश्रम से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है.
  • मां ब्रह्मचारिणी कई हज़ार सालों तक जमीन पर गिरे बेलपत्रों को खाकर भगवान शंकर की आराधना करती रहीं.
  • मां ब्रह्मचारिणी को दुष्टों को सन्मार्ग दिखाने वाली माना जाता है.
  • मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान, तपस्या और वैराग्य की देवी कहा जाता है.
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मां ब्रह्माचारिणी मंत्र

  • या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
  • नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
  • दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
  • देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

नवरात्रि के दूसरा दिन - मां ब्रह्मचारिणी की कथा

  •  मां ब्रह्मचारिणी की कथा
मां ब्रह्मचारिणी ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था । वह सुंदरता की धनी तथा ज्ञान से परिपूर्ण थीं। एक दिन नारदजी ने उन्हें उपदेश दिया जिससे प्रभावित होकर उन्होंने यह प्रण किया कि वह अपना विवाह शिवजी के साथ ही करेंगी। भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ब्रह्मचारिणी ने घोर तपस्या तथा तप करना प्रारंभ कर दिया। कई वर्षों तक उन्होंने तपस्या की जिस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी तथा तपश्चरणी के नाम से जाना जाने लगा। देवी ब्रह्मचारिणी ने तीन हज़ार वर्षों तक मात्र बिल्व पत्रों का सेवन करके वन में तपस्या की। अत्यंत कष्टों को सहन करते हुए भी उन्होंने शिवजी को पति के रूप में पाने की तपस्या नहीं छोड़ी। इसके पश्चात् उन्होंने बिल्व पत्रों का सेवन भी त्याग दिया तथा कई हज़ार वर्षों तक निर्जल तथा निराहार रहकर तपस्या की। इस प्रकार उनका नाम अपर्णा रखा गया। अधिक वर्षों तक कठिन तपस्या, तप करने के कारण उनका शरीर कमज़ोर हो गया। विभिन्न देवी देवताओं, ऋषि, मुनियों तथा सिद्धगणों ने उनकी तपस्या की सराहना करते हुए देवी ब्रह्मचारिणी को प्रोत्साहन दिया
सभी ने कहा कि आपकी तपस्या अवश्य पूर्ण होगी। उनकी गहन तपस्या को देखते हुए अंत में ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के माध्यम से प्रसन्नचित स्वर में कहा, "देवी! आज तक किसी भी कन्या ने इस प्रकार की घोर तपस्या नहीं की। तुम्हारे इस स्वरूप की तीनों लोक सराहना कर रहे हैं। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। भगवान शिव तुम्हें अवश्य शिव के रूप में प्राप्त होंगे। अंततः तुम अपनी तपस्या को यही समाप्त करते हुए, घर वापस लौट जाओ।" देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना करने वाले भक्तों को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

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