हरिद्वार का इतिहास और भगवान शिव के नाम से प्रसिद्ध मंदिर स्थित है /History of Haridwar and famous temple named after Lord Shiva is located

हरिद्वार का इतिहास और भगवान शिव के नाम से प्रसिद्ध मंदिर स्थित है 

हरिद्वार एक पवित्र स्थान है जो भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह गंगा नदी के उद्गम स्थलों में से एक है और हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण माना जाता है। हरिद्वार शब्द का अर्थ होता है "हरि का द्वार" जो भगवान विष्णु के एक नाम है।


इस स्थान पर स्थित हर की पौड़ी नामक स्थान पर हिंदू धर्म के श्रद्धालु गंगा नदी के स्नान करने आते हैं। इसे गंगा द्वारा सुधारा गया है और यहां पर नदी का एक प्रमुख बांध भी बनाया गया है जिसे हर-की-पौड़ी बांध के नाम से जाना जाता है।हरिद्वार में एक और प्रमुख धार्मिक स्थान है, जिसे हर की पौड़ी कहा जाता है, जहां पर्वतारोहण के लिए जाने वाले श्रद्धालु शिव जी की पूजा-अर्चना करते हैं। हर की पौड़ी में मान्यता है कि भगवान शिव यहां पहाड़ी पर बाइठे थे और इसी जगह पर उनके हृदय में पूजा की जाती है।श्रद्धालु लोग हरिद्वार में आकर गंगा स्नान करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और अपने पूर्वजों की आशीर्वाद लेने के लिए यहां प्रार्थना करते हैं। हरिद्वार को दूसरे धार्मिक स्थानों के साथ ही भारतीय धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं अपने आध्यात्मिक सफर को पूरा करने के लिए।

भगवान शिव के नाम से प्रसिद्ध मंदिर

हरिद्वार में दक्षेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जहां भगवान शिव विराजमान हैं। यहां पर्वतारोहण करने वाले श्रद्धालु भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं और मनोकामनाएं पूरी करने के लिए जलाभिषेक करते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं और जल से मूर्ति को स्नान कराते हैं, जिसे "जलाभिषेक" कहा जाता है। यहां की मान्यता है कि यह जलाभिषेक भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त करने का सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। जलाभिषेक के बाद, श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की कामना करते हैं।
मान्यता के अनुसार, हरिद्वार में दक्षेश्वर महादेव के नाम से जाने जाने वाले भगवान शिव की मूर्ति स्थापित है। वहां परंपरागत रूप से जलाभिषेक से मनोकामनाएं पूरी की जाती हैं।
 
इसके पीछे एक कथा भी है, जिसके अनुसार महर्षि दक्ष ने अपनी यागशाला में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बीच में अपनी भाविनी पुत्री सती का विवाह न करने के कारण उन्हें अपमानित किया था। इस अपमान के कारण सती ने अपनी आत्मा को दहन कर दिया और फिर महादेव ने उसके देह को अपने भोलेनाथ रूप में ले लिया।
जब महादेव का देहावसान हो गया, तो उनके शरीर के विभिन्न अंगों का विभाजन हुआ और उनकी भूमि में नदी के रूप में विकसित हो गई। इसलिए, हरिद्वार में उनके नाम से मूर्ति स्थापित हो गई और जलाभिषेक का रिवाज आरंभ हुआ।यह जलाभिषेक प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है और शिवरात्रि के दौरान विशेष धार्मिक आयोजनों का हिस्सा है। जलाभिषेक के दौरान, मूर्ति को गंगा लया अन्य पवित्र जल से स्नान कराया जाता है और उसे फूल, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजा की जाती है। लोग इस अवसर पर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं और भोलेनाथ से आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
यह प्रथा हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण आयोजन है और हरिद्वार को भारतीय धर्म और संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।

हरिद्वार का इतिहास 

हरिद्वार का इतिहास  बहुत ही पुराना और रहस्य से भरा हुआ है | “हरिद्वार” उत्तराखंड में स्थित भारत के सात सबसे पवित्र स्थलों में से एक है | यह बहुत प्राचीन नगरी है और उत्तरी भारत में स्थित है | हरिद्वार उत्तराखंड के चार पवित्र चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार भी है | यह भगवान शिव की भूमि और भगवान विष्णु की भूमि भी है। इसे सत्ता की भूमि के रूप में भी जाना जाता है | मायापुरी शहर को मायापुरी, गंगाद्वार और कपिलास्थान नाम से भी मान्यता प्राप्त है और वास्तव में इसका नाम “गेटवे ऑफ़ द गॉड्स” है । यह पवित्र शहर भारत की जटिल संस्कृति और प्राचीन सभ्यता का खजाना है | हरिद्वार शिवालिक पहाडियों के कोड में बसा हुआ है 
पवित्र गंगा नदी के किनारे बसे “हरिद्वार” का शाब्दिक अर्थ “हरी तक पहुचने का द्वार” है |हरिद्वार चार प्रमुख स्थलों का प्रवेश द्वार भी है | हिन्दू धर्मं के अनुयायी का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है | प्रसिद्ध तीर्थ स्थान “बद्रीनारायण” तथा “केदारनाथ” धाम “भगवान विष्णु” एवम् “भगवान शिव “ के तीर्थ स्थान का रास्ता (मार्ग) हरिद्वार से ही जाता है | इसलिए इस जगह को “हरिद्वार” तथा “हरद्वार” दोनों ही नामों से संबोधित किया जाता है |
महाभारत के समय में हरिद्वार को “गंगाद्वार” नाम से वयक्त किया गया है | 

हर की पौड़ी;-*

हर की पौड़ी” में भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की | जिससे भगवान ब्रह्मा तपस्या को देखकर खुश हुए और राजा स्वेत से वरदान मांगने को कहा | राजा ने वरदान में यह माँगा कि “हर की पौड़ी” को ईश्वर के नाम से जाना जाए | तब से “हर की पौड़ी” के पानी को “ब्रह्मकुंड” के नाम से जाना जाता है |
हरिद्वार का प्राचीन पौराणिक नाम “माया” या “मायापुरी” है | जिसकी सप्तमोक्षदायिनी पुरियो में गिनती की जाती है|हरिद्वार का एक भाग आज भी “मायापुरी” के नाम से प्रसिद्ध है | यह भी कहा जाता है कि पौराणिक समय में समुन्द्र मंथन में अमृत की कुछ बुँदे हरिद्वार में गिर गयी थी | इसी कारण हरिद्वार में “कुम्भ का मेला” आयोजित किया जाता है | बारह वर्ष में मनाये जाने वाला “कुम्भ के मेले ” का हरिद्वार एक महत्वपूर्ण स्थान है

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