माता सती और देवी पार्वती के जन्म की संपूर्ण कथा

माता सती और देवी पार्वती के जन्म की संपूर्ण कथा

माता सती और देवी पार्वती की कथा पुराणों में उल्लिखित है। यह दोनों देवियों के जीवन की महत्वपूर्ण कथा इस प्रकार है:

माता सती की कथा

प्राचीन काल में, महाराज दक्ष नामक एक राजा थे, जो बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन करने का निर्णय लिया। यज्ञ में विभिन्न देवी-देवताओं को बुलाया गया। उनके चरण अर्चन के लिए सभी देवी-देवताएं आए, लेकिन उन्होंने भगवान शिव की अभिवादन नहीं किया, क्योंकि वे उनके पुत्र हुए थे।
इसके परिणामस्वरूप, माता सती ने अपने पिता दक्ष के घर में जाने से इंकार किया और उन्हें भगवान शिव के प्रति अपमान का भाव आया। ज्वाला माता के मंदिर में भगवान शिव के सामान्य प्रतीक को देखकर उनके मन में कामना हुई कि वे विरज्मान हों।
विरज्मान के दौरान, माता सती ने अपने शरीर को ज्वाला मंदिर की अग्नि में अर्पित कर दिया और इस प्रकार अपने पूर्व जन्म को समाप्त किया। इसके बाद से ही वे माता पार्वती के रूप में प्रसिद्ध हो गईं।

देवी पार्वती की कथा

देवी पार्वती का जन्म हिमालय पर्वत पर राजा हिमवत और रानी मैनावती के घर हुआ था। पार्वती का पहला नाम सती था, जो माता सती के रूप में प्रसिद्ध थी।
एक दिन, माता सती ने भगवान शिव के बारे में सुना और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त करने की इच्छा हुई। वे ध्यान और तपस्या में लग गईं और भगवान ब्रह्मा के आदेश पर वाराणसी में तपस्या करने चली गईं। वहां उन्होंने बहुत लंबे समय तक तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी आराधना की।
आख़िरकार, उनके तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्हें पार्वती के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद से, पार्वती और शिव एकजुट होकर संसार के कल्याण के लिए लोगों के मध्य आविर्भूत हुए।
इस रूप में, माता सती और देवी पार्वती ने संसार के उद्धार के लिए अनेक लीलाएं कीं और अपनी भक्तों की कामनाएं पूरी कीं। वे सदैव भक्तों की कामनाओं को पूरा करने में सक्ष
म हैं और उन्हें सबका समर्थन और साथ देती हैं।
यह थी माँ सती और देवी पार्वती की कथा, जिसमें उनके प्राचीन जन्म, तपस्या, और भगवान शिव से विवाह की कथा शामिल है। उनका भक्ति और पूजा मनुष्य के जीवन में सुख और समृद्धि के लिए शुभ है।

माता सती और देवी पार्वती की कथाएँ अत्यंत रोचक

माता सती की कथा

पुरातन काल में, महाराज दक्ष नामक एक राजा राज्य करते थे। उनकी कन्या का नाम सती था। सती बहुत सुंदर, धर्मभ्रष्ट, दयालु और पातिव्रत्य धर्म की प्रतिमूर्ति थीं।
एक दिन, महाराज दक्ष ने बड़े यज्ञ का आयोजन किया और सभी देवी-देवता बुलाए गए। यज्ञ के अवसर पर सभी देवी-देवताओं के पूजन के लिए भी विशेष स्थान बनाया गया। इसके बावजूद, महाराज दक्ष ने अपनी कन्या सती का भगवान शिव के प्रति अपमान किया। सती को यज्ञ में भीड़ से दूर रख दिया गया और उन्हें उपस्थित नहीं होने दिया गया।
अपमानित होने पर भी, सती ने अपने पिता के प्रति कटुता नहीं बख्शी और उनके पावन दर्शन की इच्छा रखती थीं। ध्यान और भक्ति में लगी हुई, उन्होंने अपने अराध्य भगवान शिव की प्राप्ति के लिए तपस्या करना शुरू किया।
तपस्या में लगे रहने पर भगवान शिव प्रसन्न हुए और सती को उन्हें प्रसन्न करने का वरदान दिया। इसके बाद, सती ने अपने पिता के घर वापस जाने का निर्णय लिया, जहां उनकी मातृसदन का स्वागत किया गया।

देवी पार्वती की कथा 

देवी पार्वती का जन्म हिमालय पर्वत पर हुआ था। उनके पिता का नाम राजा हिमवत और माँ का नाम मैनावती था। पार्वती एक बहुत सुंदर, धर्मनिष्ठ, और पातिव्रत्य धर्म की प्रतिमा थीं।
पार्वती ने अपने पिता को साक्षात शिव को प्राप्त करने की इच्छा रखी थी। वे ध्यान और तपस्या में लग गईं और भगवान ब्रह्मा के आदेश पर वाराणसी में तपस्या करने चली गईं। वहां उन्होंने बहुत लंबे समय तक तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी आराधना की।
तपस्या में लगे रहने पर, भगवान शिव ने पार्वती का आशीर्वाद दिया और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद से, पार्वती और शिव एकजुट होकर संसार के कल्याण के लिए लोगों के मध्य आविर्भूत हुए।
इन दोनों कथाओं में सती और पार्वती के जीवन में उनकी प्रतिबद्धता, पराक्रम, और भक्ति का प्रतिबिंब है। ये देवीयों की कथाएँ हमें धार्मिक उद्दीपना, शक्ति, और भक्ति की उपलब्धि का मार्ग दिखाती हैं।

माँ सती और देवी पार्वती के जन्म से संबंधित 25 रोचक तथ्य

माता सती (पूर्वजन्म में)
  • माता सती का पूर्व जन्म राजा दक्ष की कन्या थीं। उनका नाम सती था और वे भगवान शिव की पत्नी थीं।
  • सती को धर्मनिष्ठ और पतिव्रता के रूप में जाना जाता था।
  • वे अपने पिता दक्ष राजा के बड़े यज्ञ में भगवान शिव को अपमानित करने के कारण अपने जीवन को त्याग दिया था
  • उनका विरज्मान अपने माता के घर ज्वालामुखी मंदिर में हुआ था, जहां उन्होंने अपने शरीर को अग्नि में समर्पित कर दिया।
देवी पार्वती
  • देवी पार्वती का जन्म हिमालय पर्वत पर हुआ था। उनके पिता का नाम राजा हिमवत और माँ का नाम मैनावती था।
  • उनका पूर्व नाम पार्वती था, जो माता सती के रूप में प्रसिद्ध थीं।
  • पार्वती को बचपन से ही भगवान शिव को प्राप्त करने की इच्छा थी। उन्होंने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनकी पत्नी बनी।
  • पार्वती ने भगवान शिव के साथ अनेक लीलाएं कीं, जिनमें उन्होंने भगवान शिव को परीक्षा में डाका डाला और महाकाल रूप में उन्हें पहचाना।
माता सती और पार्वती के रूप में अवतार
  • माता सती और पार्वती दोनों ही माँ दुर्गा के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिनकी पूजा और वंदना दुर्गा पूजा के दौरान बड़े धूमधाम से की जाती है।
  • माता सती का विरज्मान उनके पिता राजा दक्ष के यज्ञ में हुआ था, जबकि पार्वती का जन्म उनकी आत्मसमर्पण और तपस्या से हुआ था।
  • माता सती का विरज्मान उनकी शक्तिपीठों में ज्वालामुखी मंदिर के रूप में चित्रित किया जाता है, जबकि पार्वती का विरज्मान उनकी गौरीकुंड के रूप में चित्रित किया जाता है।

शक्तिपीठों की संख्या

माँ सती के विरज्मान के बाद, भगवान विष्णु ने उनके शरीर को काट डाला और उससे 51 शक्तिपीठों का उत्पन्न होना हुआ। ये शक्तिपीठ भारत और बांग्लादेश के
 विभिन्न स्थानों पर स्थित हैं।
भगवान शिव का विरह
  • माँ सती का विरज्मान करने के बाद, भगवान शिव बहुत दुखी हुए और उनके विरह का संघर्ष बहुत समय तक चलता रहा।
  • इसके बाद भगवान शिव ने अपने विरह को सहन नहीं कर सकते हुए सती के पुनर्जन्म के लिए प्रार्थना की और उन्हें वैष्णवी विद्या के रूप में उनके पास भेज दिया।
पार्वती की तपस्या
  • पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए अपनी तपस्या में बहुत मेहनत की। उन्होंने तपस्या का केंद्र वाराणसी रखा था।
  • पार्वती ने तपस्या के दौरान अपने शरीर की खाल उतारकर उसे धारण किया। इसलिए उन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है।
भगवान शिव के प्रतिभासवरूप
  • पार्वती ने अपनी तपस्या में लगे होने के कारण उन्हें भगवान शिव के प्रतिभास रूप को उलझन में देखा।
  • पार्वती ने भगवान शिव के सामान्य व्यक्तित्व को भी पहचान लिया, और वे भगवान शिव के विरह के अनुभव से अभिसार रहीं।
शिव द्वारा परीक्षा
  • भगवान शिव ने पार्वती का परीक्षा लेने के लिए उन्हें महाकाल रूप में पहचाना। इस परीक्षा में, उन्होंने उन्हें बहुत कठिनाईयों का सामना करने को कहा।
  • उन्होंने पार्वती को उज्जैन की बिख्यात महाकाली मंदिर में भयंकर शक्तियों का सामना करने को कहा।
पार्वती की विजय
  • पार्वती ने भगवान शिव के सामर्थ्य को प्रमाणित करते हुए विशेष शक्तियों को जीता और उन्हें भगवान शिव के प्रिय रूप में स्वीकार किया।
  • भगवान शिव ने पार्वती का विवाह उनसे कर लिया और वे एकजुट हो गए।
पार्वती के विवाह संस्कार
  • पार्वती के विवाह के अवसर पर भगवान विष्णु ने उन्हें कन्या रूप में सजा कर कन्या कन्यादान किया।
  • भगवान शिव ने पार्वती को ब्रह्मचर्यशील और धार्मिकता का प्रतीक बनाया और उन्हें अपने व्रतों की पत्नी बनाया।
पार्वती का अर्धांगिनी रूप
  • भगवान शिव ने पार्वती को अपने व्यक्तित्व के अर्धांगिनी रूप का महत्व बताया और उन्हें अपने साथी के रूप में स्वीकार किया।यहां उपरोक्त 25 रोचक तथ्य हैं, जो माँ सती और देवी पार्वती के जन्म से संबंधित हैं। ये दोनों देवियों के जीवन के उत्तराधिकारी रूप में उनकी महिमा और विभूतियों का प्रतिबिंब हैं।

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