क्यों कहा जाता है मर्यादा भगवान श्री राम को

क्यों कहा जाता है मर्यादा भगवान श्री राम को Why is Lord Shri Ram called Maryada

भगवान श्री राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है क्योंकि वे एक मानवीय संस्कृति में आदर्श पुरुष के रूप में पूजे जाते हैं। 'मर्यादा' शब्द संस्कृत में 'मर्यादा' या 'सीमा' को दर्शाता है, और 'पुरुषोत्तम' का अर्थ होता है 'पुरुषों में श्रेष्ठ'। भगवान राम ने अपने जीवन में धर्म, नैतिकता, कर्तव्य, समर्पण, और सामाजिक मर्यादाओं का पालन किया था, जिससे उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में जाना जाता है।
भगवान राम ने अपने जीवन में समाज में सही और उचित मानवीय रहने की मार्गदर्शन किया। उनकी श्रीमद् रामायण में उनकी मर्यादा और धर्मपरायणता की कहानी लोगों को उनके आदर्शों और संस्कृति के प्रति समर्पित करती है। उनकी मर्यादा और उनका व्यवहार मानवता के मूल्यों को दर्शाता है और उन्हें आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत करता है।

राम को मर्यादा पुरुषोत्तम

राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है क्योंकि उनका चरित्र और उनकी व्यवहारी प्रवृत्ति उन्हें एक आदर्श पुरुष के रूप में प्रस्तुत करती है। भगवान राम ने अपने जीवन में धर्म, नैतिकता, और सामाजिक मर्यादाओं का पालन किया था। उन्होंने अपने प्रियजनों, समाज के लोगों, और अपने देशवासियों के प्रति उत्कृष्ट समर्पण और सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया था। 
रामायण में उनका चरित्र और उनके कार्यों का वर्णन किया गया है जो उनके आदर्शों और मौलिक मानवीय गुणों को प्रकट करते हैं। उनकी मर्यादाओं का पालन, धर्म, न्याय, सामर्थ्य, और समर्पण उन्हें एक उत्तम मानव और एक आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए, वे 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में माने जाते हैं।

भगवान श्री राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम'  शब्द का अर्थ

भगवान श्री राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है। यहाँ 'मर्यादा' शब्द का अर्थ है 'सीमा' या 'सीमाएं'। 'पुरुषोत्तम' का अर्थ होता है 'पुरुषों में श्रेष्ठ'। इसलिए, 'मर्यादा पुरुषोत्तम' का अर्थ होता है 'सीमाओं में श्रेष्ठ पुरुष'। 
राम जी को इस नाम से जाना जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में धर्म, नैतिकता, समर्पण, सेवा, और सामाजिक मर्यादाओं का पालन किया था। उनके चरित्र में नैतिक और धार्मिक सीमाएं बखूबी प्रतिष्ठित थीं, जो उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में माना जाता है।

भगवान श्री राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम तथ्य

भगवान श्री राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है क्योंकि उनका चरित्र और उनके जीवन के तथ्य इस शीर्षक को प्रस्तुत करते हैं:
  • धर्मप्रियता:** राम जी ने अपने धर्म के प्रति निष्ठा और प्रेम प्रकट किया। उन्होंने अपने परिवार, समाज, और राज्य के लिए धर्म के मार्ग पर चलने का परिचय दिया।
  • न्यायप्रियता:** उन्होंने न्याय के प्रति अपनी प्रतिष्ठा और समर्पण दिखाया। उन्होंने सभी के प्रति न्याय सुनिश्चित किया और अपराधियों के खिलाफ न्याय को बढ़ावा दिया।
  • समर्पण:** राम जी ने अपनी पत्नी सीता के प्रति अपना पूरा समर्पण और प्रेम दिखाया। उनका समर्पण और प्रेम आदर्श बने रहे हैं।
  • समाजसेवा:** उन्होंने समाज सेवा का महत्त्व प्राथमिकता दिया और जनता के हित में निरंतर कार्य किया। उनकी सेवा भावना और जनहित में कार्य उन्हें एक आदर्श बनाते हैं।
  • मर्यादाओं का पालन:** राम जी ने समाज में मर्यादाओं का पालन किया और एक आदर्श रूप में समझाया। उन्होंने जीवन में सीमाओं का पालन कर संस्कृति और नैतिकता को बढ़ावा दिया।

राम जी  को धर्मप्रियता माना जाता

राम जी को धर्मप्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। उन्होंने अपने जीवन में धर्म के मार्ग पर चलने का अद्वितीय और प्रशंसनीय उदाहरण प्रस्तुत किया। राम जी धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा और निष्ठा के लिए जाने जाते हैं।
उन्होंने अपने पिता के वचन का पालन किया और वनवास का सम्मान किया, जो धर्म के लिए एक प्रमुख संकल्प था। वह अपने धर्म के लिए अपनी पत्नी सीता के साथ अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी निरंतर उदार और धार्मिक बने रहे।
राम जी ने अपने धर्म का पालन करने के लिए राज्य के प्रति भी विशेष देखभाल की। उन्होंने न्याय और धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपनी प्रजा की सेवा की और उन्हें अपने राज्य में सुख और शांति प्रदान की।
रामायण में उनके धर्मप्रिय चरित्र का विवरण दिया गया है, जो उन्हें एक धर्मात्मा और धर्म के प्रति समर्पित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।

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