अयोध्या कांड का मासपरायण, अठारहवाँ विश्राम

अयोध्या कांड का मासपरायण, अठारहवाँ विश्राम Mass celebration of Ayodhya incident, eighteenth sabbath

चौपाई
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।
बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।।
करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।।
बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।

चौपाई का अर्थ:
"ओ भरत, तुम्हारी जान राम की जान से भी बड़ी है। तुम्हारी आत्मा रघुपति को भी बहुत प्यारी है।
समझो कि विद्युत की तरह जलता हुआ भस्म हो जाता है, अगर वह बारिश और सर्दी में गिर जाए।
ज्ञान होने के बावजूद भी जब तुम्हारा मोह न टूटे, तुम राम के प्रति अनुराग न खोऊ।
माता ने भरत को कहा, 'तेरी आँखों से आँसू बहते हुए, तुम्हारा हृदय राम की याद में रो रहा है।
बहुत विलाप करते हुए वह रात बीत गई।
तब बामदेव और वसिष्ठ आए, और सभी महाजनों को बोलाया।
मुनियों ने भरत को विभिन्न तरीकों से उपदेश दिया और परमार्थ के बारे में उन्हें शिक्षा दी।"
दोहा-
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।
इस दोहे का अर्थ है:
"तात (पिता) हृदय धीरज धारन करो, जो अवसर आए। भरत, गुरु के वचन सुनकर उठो और सब को साजग कहो।"
इस दोहे में माता कैकेयी ने भरत को समझाया है कि पिता के हृदय में स्थिरता और साहस बनाए रखना चाहिए और जब भी अवसर मिले, तो वह गुरु के उपदेशों का समर्पण सहित सबको साजग से सुनाए। इससे भरत को अपने पिता के उपदेशों का मानना और उन्हें अपने जीवन में अनुसरण करना सिखाया जा रहा है।
चौपाई
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।
गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।
चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।।
सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।
सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।
भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।
यह चौपाई श्रीरामचरितमानस से ली गई है। इसका अर्थ है:
"राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम ने अत्यन्त अद्भुत और अद्वितीय विमान बनाया। उन्होंने अपनी माता के पावन पादुका को सम्मानित करते हुए सभी राज्य और सुख को संरक्षित किया। रानी सीता का एकमात्र इच्छा थी कि वह श्रीराम का दर्शन करें।
चंदन की भाँति अगर बहुत सारी सुगंधें एक साथ आएं, तो वे अनगिनत और अनेक प्रकार की महक फैलाते हैं। जैसे कि सरजू नदी की धाराएं तीर को लकड़ी में दरारें बनाकर सुंदरता बढ़ाती हैं, वैसे ही जनों के लिए बनाए गए सुंदर पुरोहितों के सोपान अत्यन्त आकर्षक होते हैं।
इसी प्रकार श्रीराम ने सभी धर्मों को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण दान क्रियाएं कीं और उन्होंने विद्वानों के द्वारा पुराणों में बताए गए सब संस्कृति और वेदों का सम्मान किया। जहाँ-जहाँ महान मुनियों ने दान लिया, वहाँ-वहाँ उन्होंने अनेक और अनेक प्रकार से उत्तमता का संचार किया।
वे सभी बिना किसी अपेक्षा के अनेक प्रकार के दान कर दिए और उनकी शक्ति के बल पर गज, बाज, बाघ, बकरी आदि विभिन्न जानवरों को भी दान किया।"
दोहा-
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
इस दोहे का अर्थ है:
"सिंहासन (राजा की सीट) और भूषण (आभूषण) से युक्त, वस्त्रों में सुशोभित, अन्न और धन से भरा हुआ, भूमिसुर (पृथ्वीराज, राजा) ने भरत को दिया है एक पूर्ण समर्पण का कार्य।"
इस दोहे में भरत को राजा की सीट (सिंहासन) और आभूषण के साथ राजा की उच्च स्थिति, अन्न और धन की प्राप्ति का समर्पण करने का वर्णन है। भूमिसुर ने भरत के द्वारा किए गए समर्पण के कारण अपना कार्य पूरा किया है और राजा बनाया है।
चौपाई
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।
बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।।
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।।
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।
कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।
यह चौपाई भगवान रामचंद्र जी के बारे में है। इसका अर्थ है:
"भरत ने पिता के हित के लिए जो कुछ किया, वह कथनी मुख से नहीं जाता। वह दिन-रात मुनियों को सोधता रहा, तब वे सभी सचिवों और महाजनों को बोलाए। राजसभा में सभी गए और उन्होंने भरत और उसके दो भाइयों को बुलाया। भरत और वसिष्ठ जी निकट बैठे और नीति और धर्म संबंधित बातें कहीं।
मुनियों ने सबसे पहले कहानी सुनाई, कि कैसे कोई कुटिलता करता है। राजा ने धर्म, सत्य और समाज की प्रशंसा की, जिससे उनका शरीर त्यागते समय भी प्रेम बना रहता है।
मुनियों ने भगवान राम की गुणगान, सदाचार और सौंदर्य की कहानी सुनाई। उन्होंने सीता की प्रीति को भी व्यक्त किया, जिन्हें सुख और सन्तोष का अच्छा ज्ञान था।"
दोहा-
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
इस दोहे का अर्थ है:

"भरत, मुनिनाथ! भविष्य में होने वाली प्रबल घटनाओं को सुन, लेकिन अपने को नियंत्रित रख, क्योंकि जीवन-मृत्यु, लाभ-हानि, सभी इस प्रकार की घटनाएं अपने हाथ में होती हैं।"
इस दोहे में मुनिनाथ (मुनि नाथ - ऋषियों के नाथ, गुरु) से सिखाया जा रहा है कि भविष्य की घटनाओं को जानना महत्वपूर्ण है, लेकिन अपने को संयमित रखकर उनसे सही रूप में नियंत्रित रहना भी बहुत आवश्यक है। जीवन में होने वाली घटनाएं अनिश्चित होती हैं, और इसलिए व्यक्ति को सही निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए।
चौपाई
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।
ये चौपाई भगवान रामचरितमानस से ली गई हैं। इनका अर्थ है:

"बिना सोचे समझे कोई काम करने से दोस्ती ना करो, क्योंकि बेकार का कोई काम करने से दुःख ही होता है। तू अपने पिता दशरथ की तरह मन में सोच, वे नर-नाराधिपति नहीं थे।
जो ब्राह्मण वेदों से रहित होकर दूसरों के धर्म को छोड़ देते हैं, वे सोचने योग्य नहीं हैं। जो राजा नीति नहीं जानता और जिसने अपनी प्रजा को प्रिय नहीं जाना, वह भी सोचने लायक नहीं है।
जो धनी होते हुए भी अतिथि को सेवन नहीं करते, वे भी सोचने योग्य नहीं हैं। जो सूद्र ब्राह्मण को अपमानित करते हैं और मुखरता और मानप्रियता में अहंकार करते हैं, वे भी सोचने योग्य नहीं हैं।
जो पति अपने व्रतों को त्यागते हैं और जो गुरु की शिक्षा को अनुसरण नहीं करते, वे भी सोचने लायक नहीं हैं।"
दोहा-
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
इस दोहे का अर्थ है:

"जो गृहस्थ है, वह मोह में बसकर कर्म पथ को त्याग करने की चिंता करें। उसे यह सोचना चाहिए कि प्राप्ति-प्रयास में रत होने वाला संसार और अपनी परंपरागत राग-द्वेषों को छोड़कर विवेकी और वैराग्यी बनना चाहिए।"
इस दोहे में व्यक्ति को अपने जीवन में उच्चता और आदर्श बनाए रखने के लिए समाजिक और आध्यात्मिक उद्दीपन की बात की जा रही है। गृहस्थ को अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भी साधना और साधना से उत्पन्न होने वाले मोह को त्याग करने की सीधी राह को अपनाने की सिख मिलती है। इससे वह अपने कर्मों को नेतृत्व, सेवा, और उच्चता की दिशा में ले सकता है।
चौपाई
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।।
सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।
सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।
ये चौपाई श्रीरामचरितमानस से ली गई है। इसका अर्थ है:

"जो व्यक्ति सोचता है कि वह बैखाना करने से तपस्या करके जो भोगने का भाव रखता है, वह अपवित्र है। जो सोचता है कि पिसुन और अकारण क्रोध करना ठीक है, वह अपनी माता, पिता, गुरु, और बंधुओं के विरुद्ध है।
वह सभी प्रकार के अपकार करने वाला है, अपने शरीर को ही पोषण देने वाला और निर्दयी है। जो हर व्यक्ति को सोचने योग्य है, जो हरि के भक्तों को छल से नहीं छोड़ता, वही सोचने योग्य है।
वही कोसलराज जो भूवन में चारों दिशाओं में प्रकट होते हैं, उस राजा का भय नहीं होता, वह राजा भरत ही तुम्हारे पिता के समान हैं। इस प्रकार श्रीहरि सुरों के पति, दिशाओं के नाथ, और दशरथ जी की सब गुणों की गाथा रचने वाले हैं।"
दोहा-
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।
इस दोहे का अर्थ है:

"तात (पिता), किसी भी तरीके से कहो, कोई भी कारण बताओ, लेकिन तुम राम और लक्ष्मण के साथी हो, जिनकी तुम्हारे साथ सत्रुहन (युद्ध में साथी) हैं, और जो सर्वज्ञ, सुअन्तर्दृष्टि और सुचि (समझदार) हैं।"
इस दोहे में भरत ने कहा है कि उन्हें तात (पिता) से कुछ भी कहने का साहस नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि राम और लक्ष्मण उनके साथ हैं, और वे तात के साथ सत्रुहन (युद्ध में साथी) हैं और वे सर्वज्ञ, सुअन्तर्दृष्टि और सुचि हैं।

चौपाई
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।।
करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।
परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।
यह चौपाई भगवान रामचरितमानस से ली गई है। इसका अर्थ है:

"सभी प्रकार के राजा भाग्यशाली होते हैं, लेकिन जो किसी विपत्ति को सुनकर विचार कर उसमें दुःख मानते हैं, वही वास्तविक राजा होता है। ऐसी बात सुनकर समझकर सोचो और उस बात को त्यागो, और राज्य की ओर ध्यान दो।
राजा, राज्यपाल, तुम्हें कहते हैं कि वह पिताजी की वाणी को छोड़कर बाहर के बचनों का अनुसरण किया। जैसे राम ने पिताजी के वचनों को त्याग दिया, वैसे ही उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया और बिना राम के साथ व्यथित हुए।
राजा, वह बात जो आपको प्रिय नहीं है, लेकिन पिता के वचनों का पालन करें, उसमें अनुमति दें। अपने सिर पर हाथ रखकर राज्य की सेवा करो, इससे तुम्हारी सभी प्रकार से भलाई होगी।
परशुराम ने पिता की अज्ञा को पालन किया, माता को छोड़ दिया और लोगों के साक्षात्कार में मार दिया। उसने पिता की अज्ञा का पालन किया, जो की वृद्ध पिता की आज्ञा थी, और उसने किसी भी बात से नहीं डरा।"
दोहा-
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
इस दोहे का अर्थ है:
"जो पुत्र अनुचित, उचित और बिचारु (सावधान) नहीं होते, उन्हें पिता को त्याग देना चाहिए। ऐसे पुत्रों का भजन (संगीत) सुखद और सुसज्जनों के साथ रहने वालों के लिए अमरपति की तरह होता है।"
इस दोहे में पिता को अपने पुत्रों का सावधान रहकर उचित और अनुचित विचार करने का सुझाव दिया जा रहा है। यदि पुत्र उचित और सावधान नहीं है, तो पिता को उसे त्याग देना चाहिए, ताकि वह सुखद और सुसज्जनों के साथ रहने वालों के लिए एक आनंदमय जीवन बना सके।
चौपाई
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।
करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।।
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।।
कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।
सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।
यह चौपाई भगवान रामचरितमानस से ली गई है। इसका अर्थ है:

"राजा, तुम अपनी अवस्था के अनुसार वाणी करो और प्रजा की परवाह किया करो, उनके दुःखों को दूर करो। स्वर्गीय राजा स्वर्गों में भी प्रसन्न होते हैं, तुम्हें कोई दोषी नहीं समझता।
सब वेदों में सम्मानित हैं, जिसे पिता ने दिया है, वही विद्यार्थी उपदेश का पालन करता है। राजा, तुम वाणी को संभालो और मेरे वचन को आदर्श मानो।
राम और सीता द्वारा कहे गए वचनों को सुनकर सुख प्राप्त होता है, और पंडित कभी अनुचित वचन नहीं बोलते। कौसल्या आदि सभी महारानियों ने अपने प्रजा को सुखदायी बनाया है।
आपका परमात्मा भगवान राम हैं, तुम्हें सभी प्रकार से मान्यता मिलती है। राजा, राम को समर्पित करो, उनकी सेवा करो और प्यार से उनका संगीत करो।"
दोहा-
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।
इस दोहे का अर्थ है:
"जो कुछ भी करें, उसे गुरु के आदर्शों और उपदेशों के अनुसार करें और सत्यिकता के साथ सचिव के साथ बहस करें। जब राघव परमेश्वर आएँगे, तब उसके अनुसार कार्य करें।"
इस दोहे में यह बताया जा रहा है कि हर कार्य को गुरु के उपदेशों के अनुसार करना चाहिए और सत्यिकता के साथ सचिव के साथ बहस करना चाहिए। जब भी भगवान राम प्रकट होंगे, तब उनके उपदेशों और मार्गदर्शन के अनुसार कार्य करना चाहिए।
चौपाई
कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।
सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।
बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।
यह चौपाई श्रीरामचरितमानस से ली गई है। इसका अर्थ है:

"कौसल्या ने धैर्य से कहा, 'पुत्र! पुत्रकाम्य गुरु की आज्ञा को पालन करना चाहिए। वह आदर करने योग्य है और हित में सम्मानी होती है। उसे छोड़कर बिषाद का अंत जानना चाहिए।
रघुकुल के बन्धु और सूर्य के समान हो, तुम अपने पिता की इसी तरह की कद्र करो। परिजन, प्रजा और सब सचिव तुम्हारे ऊपर निर्भर हैं, तुम्हारी ही संरक्षा में हैं।
विवशता के समय भी धैर्य बनाए रखो, मातृभाव को बलिदान करो। गुरु की आज्ञा का पालन करो, प्रजा की रक्षा करो और परिजनों की दुःख हरो।
सचिव ने गुरु के वचन का स्वागत किया, भरत ने उन्हें दिल से स्वागत किया। माता ने उनकी वचनों को सुना, जो सील, सम्मान और सरलता से भरे थे।"
छंद 
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।।
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की।।
इस छंद का अर्थ नीचे दिया गया है:

"सुनकर मातृभाषा की सादगी से भरा हुआ सुख, भरत ने बहुत अच्छा महसूस किया। उसने अपनी आंखों से बहते हुए आँसुओं के समुद्र की भाँति देखा, और उसके हृदय में प्रेम के अंकुर नए उत्पन्न हुए।
उसने उस समय देखा कि वह दशा (सीता) उसे देख रही है, और उसने सभी बाधाओं को भूलकर अपने शरीर की शुद्धि प्राप्त की। तुलसी दास ने समझाया कि सबकुछ सराहनीय है, और उन्होंने सभी के प्रति सहज और स्वाभाविक प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत किया।"
सोरठा-
भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।
बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि।।176।।
सोरठा (सोरठी) का अर्थ है:

"भरत ने कमल के जैसा बुद्धिमत्ता से जोर दिया है, धीरजवंत के रूप में स्थिर रूप से समर्थ बना रखा है। उनके वचन हमें एक बोर में आपत्ति दिखाने की आवश्यकता है, और उन्होंने सबको उचित उत्तर देने का आदान-प्रदान किया है।"
इस छंद में, कबीर जी भरत के बुद्धिमत्ता और समर्थता की स्तुति करते हैं, और उनके वचनों को सभी के लिए मार्गदर्शन मानते हैं। उनका कहना है कि भरत की सीखें सभी को उचित उत्तर प्रदान करने में मदद कर सकती हैं।
मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम

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