किष्किंधा कांड छंद

किष्किंधा कांड छंद kishkindha kand verses

रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में 1 श्लोक, 30 दोहे, 1 सोरठा, 2 छंद और 30 चौपाइयां हैं. किष्किंधा कांड  के छंद अर्थ सहित हैं

छंद  
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं,
जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं ||
यह कविता देवनागरी लिपि में लिखी गई है और इसमें एक साधु या महात्मा की भावना व्यक्त हो रही है। इसका संदेश है कि मनुष्य को अपने नयन (आंखों) को अद्वितीय दिव्यता की दिशा में ले जाना चाहिए ताकि वह नित्य गुणों का अनुभव कर सके और इसे श्रुति (वेद और उपनिषद) गाती हैं। मुनि या साधु ध्यान में रहकर पवन (वायु) के समान शीतल और निरस रहते हैं और उन्हें कभी-कभी दिव्य अनुभव होता है।
इस छंद में कवि वर्णन कर रहे हैं कि उस व्यक्ति की आत्मा, जिनके नयन (आंखें) गोचर हैं, जिनके सदा गुणों का चरित्रण होता है, जो नेति (नेति - नहीं) कहते हैं और जिनके बारे में श्रुति (शास्त्र) गाती है। इसके साथ ही, उनका मन पवन के समान शुद्ध है, जो मुनियों द्वारा ध्यान किया जाता है और जो किसी समय भी गो (गोविन्द, भगवान) की ध्यानभावना से ही संपन्न होता है।

मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही,
अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही ||१||
यह कविता भक्ति रस की है और इसमें कवि अपनी अभिमानी भावनाओं को परमात्मा के सामने छोड़ने की प्रार्थना कर रहा है। उसे चाहिए कि वह अपने शरीर को भी भगवान के नाम में समर्पित करे और सब कुछ भगवान की इच्छा के अनुसार हो। इसमें उसकी आत्मा का समर्पण और समर्पण के साथ साधने की प्रेरणा है। इसमें बाबर (बबूर) का उल्लेख हो सकता है, लेकिन इसका सही संदेश और समर्थन के लिए पूरा कविता का संदर्भ जरूरी है।
इस छंद में गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान जी की भक्ति करते हैं और अपनी अभिमानशून्यता को प्रकट करते हैं। उनका कहना है कि मैं अपने आप को अत्यधिक अभिमानी नहीं समझता, बल्कि मैं सिर्फ तुझे ही प्रभु मानता हूँ और मैं अपने शरीर को भी तुझे ही समर्पित करता हूँ। इसके साथ ही, गोस्वामी तुलसीदास जी विचार करते हैं कि कौन सी सड़ी हठ से होने वाली आवश्यकताओं को हनुमान जी ने बाबर को कैसे पूरा किया।

अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ,
जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ ||
यह कविता भक्ति भावना से भरी हुई है और इसमें कवि अपनी प्रार्थना कर रहा है कि भगवान उस पर अपनी कृपा बनाए रखें। वह भगवान से अनुरोध कर रहा है कि भगवान उसे करुणा से देखें और उसकी मांगों को सुनें। कवि भगवान से बस एक चीज मांग रहा है - राम पद के अनुराग में रहने की क्षमता। उसने जन्म-जन्मांतर के कर्मों से आगे बढ़कर राम के प्रेम में रत होने की प्रार्थना की है। इसका संदेश है कि भक्ति और प्रेम के माध्यम से ही मनुष्य भगवान के पास पहुँच सकता है।
इस छंद में तुलसीदास जी भगवान राम से आशीर्वाद की प्रार्थना कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब, हे नाथ (भगवान), कृपा करके मेरी ओर देखो और मेरी आशा को पूरा करो। जो कुछ मैं मांगता हूँ, वह सब तुम्हें ही मांगता हूँ। मैं चाहता हूँ कि जहां-जहां मैं जन्म लेता हूँ और वहां-वहां मैं कर्म करता हूँ, वह सब स्थानों पर मैं राम पद के प्रति अनुरागी रहूँ। इस छंद में भक्ति और सर्वशक्तिमान भगवान के प्रति आत्मनिवेदन की भावना प्रकट है।

यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ,
गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ ||२ ||
इस छंद में भक्ति भावना और आत्मनिवेदन का अद्भुत वर्णन है। यहां कवि अपने बिनय और भक्ति के साथ भगवान से कह रहे हैं कि हे प्रभु, इस बलवान और कल्याणकारी बच्चे को मेरा समान बनाकर लीजिए। मेरे बल, भक्ति और बिनय के साथ मैं आपके सामने हूँ, कृपया मेरी पूर्णता करें। मेरी बाहें तो स्वर्गीय और मानवीय सभी लोगों के लिए हैं, लेकिन मैं आपका दास अंगद हूँ, इसलिए कृपया मुझे आपका भक्त बनाए रखें।
यह कविता भक्ति रस की है और इसमें कवि भगवान से अपनी प्रार्थना कर रहा है। यहां कवि अपने बिनय और भक्ति के साथ भगवान से अनुरोध कर रहा है कि वह अपने बल से और कल्याणप्रद रूप से उसकी कृपा करें। कवि कह रहा है कि मैं तनय (बेटा) हूं, मेरे सामर्थ्य और भक्ति को देखकर मुझ पर कृपा करें और मुझे अपना दास बना लें। यह कविता भक्ति भावना, विनय, और परमेश्वर के प्रति समर्पण की भावना से भरी हुई है। यह कविता भगवान की भक्ति के माध्यम से आत्मा की मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना करती है।

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