पाठ अर्थ सहित अरण्यकाण्ड चौपाइयां

पाठ अर्थ सहित अरण्यकाण्ड चौपाइयां Aranyakaand Chaupaiyas with text meaning

सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥2॥
यह चौपाई "रामचरितमानस" में स्थित है। इसका अर्थ है:
"वह सच्चाई स्वतंत्र नहीं होता, वह केवल उस ज्ञान और विज्ञान के अधीन होता है। भक्ति ही उस सच्चे सुख की जड़ होती है, जो संतों से मिलकर अनुकूल होती है।"
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥3॥
इसका अर्थ है:
"भक्ति के साधन को मैं कहता हूँ, जो मनुष्य को सुगम मार्ग प्राप्त कराता है। सबसे पहले ब्राह्मणों के पादों की अत्यंत प्रेम से सेवा करो, और अपने-अपने कर्मों को वेदों और शास्त्रों की रीति के अनुसार सतत निरंतर करो।"
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥4॥
इस चौपाई का अर्थ है:
"इस प्रकार यह कार्य करके फिर भोगों से बाहर निकल, तब मेरा धर्म उत्पन्न होकर भक्ति में अनुराग उत्पन्न होगा। श्रवण आदि नव-नव भक्ति दृढ़ हो जाएगी और मेरी लीला में बहुत रति होगी तेरे मन में।"
अरण्यकाण्ड चौपाइयां
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥5॥
इसका अर्थ है: "संतों के चरणों में लगाव बहुत ही प्रेमवाला होता है। मन, वचन और भजन में उनका निष्ठा बहुत ही दृढ़ होता है। गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सबको मैं स्वयं को उनकी सेवा में समर्पित करता हूँ, और मेरी इस सेवा को वे कैसे समझ सकते हैं?"
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥6॥
इसका अर्थ है: "मैं अपने गुणों की स्तुति करते हुए अपने शरीर में पुलकित हो जाता हूँ, और मेरी आंखों से अश्रु बहने लगते हैं। काम, आदि, मद और दंभ मुझे जहाँ तक हो सके उनसे दूर रहते हैं, सिर्फ मेरे राम के चरणों में ही मेरा स्थान है।"
चौपाई :
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥
एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥1॥
इसका अर्थ है: "भक्ति और ज्ञान को सुनकर मैं बहुत अच्छा सुख प्राप्त करता हूँ, जैसे कि लक्ष्मण ने प्रभु राम के चरणों को अपने सिर पर धारण किया। इसी प्रकार विराग्य, ज्ञान और गुणों की बात कहते हुए दिन बीत गया।"
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥
इसका अर्थ है:
"सूर्पणखा रावण की बहन थी, जिसका दिल बहुत ही दुष्ट और दारुण था। एक बार वह पंचवटी में गई थी और जब वह श्रीराम और लक्ष्मण को देखा, तो वह व्याकुल हो गई।"
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥3॥
इसका अर्थ है:
"भाई, पिता, और पुत्र - ये सभी मनोहर पुरुषों की तरह हैं, जो महिलाओं को आकर्षित करते हैं। यह आकर्षण बड़ा ही विचित्र होता है और मन को रोकने में सक्षम नहीं होता, जैसे सूर्य चंद्रमा को अपनी तरफ खींचता है।"
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥4॥
इसका अर्थ है:
"भगवान ने एक रुचिर रूप धारण किया और बोलने का भी उनका तरीका बहुत ही मनमोहक था। तुमसे समान पुरुष नहीं, न मो महिला हैं। यह संयोग भगवान की विचारधारा द्वारा रचा गया है।"
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥
तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥5॥
इसका अर्थ है:
"मेरे समान कोई पुरुष इस जगत में नहीं है, मैंने सभी लोगों को देखा लेकिन कोई भी मेरे समान नहीं है। इसलिए अब मैं कन्या बनकर रहूँ, मैंने तुम्हें देखकर कुछ तो माना है।"
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥6॥
इसका अर्थ है:
"सीता ने प्रभु से यह कहकर कहा कि 'मेरे छोटे भ्राता लक्ष्मण को भी वह कुआर कहते हैं।' लक्ष्मण ने रावण की बहन को देखकर उसे शत्रु की बहना माना, फिर प्रभु ने उसे देखा और मृदु भाषा में बोले।"
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥7॥
इसका अर्थ है:
"सुंदरि, मैंने उन्हें अपना सेवक मानकर पूजा है। तुम्हारा सेवानिवृत्त नहीं हुआ है। प्रभु श्रीराम, कोसलपुर के राजा, जो कुछ भी करते हैं, वह सब उन्हीं के आदेशानुसार होता है।"
 सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥8॥
इसका अर्थ है:
"सेवक सुख चाहकर भी मानव जैसा व्यवहार करते हैं, जो भिखारी के समान होता है। धन सुभ (साधुवादी) होता है लेकिन उसकी गति भ्रष्टाचारी जैसी होती है। जैसे लोभी चारों तरफ अपने गुमान में डूबा हुआ है, ठीक उसी तरह जीवन में रत्ती भर भी संतोष नहीं मिलता।"
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥9॥
इसका अर्थ है:
"सीता फिर से राम के निकट गई और प्रभु ने लक्ष्मण को फिर से उसके पास भेजा। लक्ष्मण ने कहा, 'वह सब कुछ बड़ा है जो तुम्हारी लाज तोड़ने के लिए तुम्हारे पैरों की धूल भी न छू सके।'"
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥10॥
इसका अर्थ है:
"तब सीता राम के पास गई और एक भयंकर रूप में प्रकट हुई। जब सीता ने ऐसा रूप देखा, तो वे सभी डरकर राम को देखते रह गईं, और उन्होंने लक्ष्मण से सब कुछ समझा दिया।"
चौपाई :  
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥
 खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥1॥
इसका अर्थ है: "नाक और कान के बिना मनुष्य बेहाल हो जाता है, जैसे कि जल बिना समुद्र, और गर्गरियों के बिना गंगा की धारा। खर और दूषण की तरफ जाकर शिकायत की, 'हे राम, हे मेरे भ्राता, तेरे वीरता और बल को नाश हो।'"
तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥
धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥2॥
इसका अर्थ है: "तब उसने सभी से पूछा और सब ने उसे समझाया। उसने जानकरी प्राप्त करके सेना बनाई। तब निसाचर जाति के राक्षस बड़े धावे से आए, जैसे की बहुत सारी जंगली सुअर एक साथ भाग रहे हों।"
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥
सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥3॥
इसका अर्थ है: "सीता के बहनों और भाइयों का विवर्णन करते हुए कहा गया है। उनमें बहुत से अलग-अलग प्रकार के युद्धास्त्र हैं, जो बहुत ही भयंकर और अपार हैं। सूर्पणखा ने भगवान श्रीराम के सामने अपना अशुभ रूप धारण किया, जिससे उसकी सुनी गई श्रुति (वेद) की नासा हो गई।"
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥
 गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥4॥
इसका अर्थ है:
"असुगुन अत्यंत भयंकर हो जाते हैं, वे मृत्यु को भी हरा देते हैं। वे आकाश को गर्जाते हैं, तारों को ताड़ते हैं, उसे उड़ा देते हैं। उन्होंने कटकु को देखा, जिससे भट्ट बहुत हर्षित हो गए।"
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥
 धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥5॥
इसका अर्थ है:
"कोई कहे जीतो, तुम दोनों भाई धरती पर रहो। कोई कहे मारो, तो तुम तीर्थ छोड़कर जाओ। धरा, पूरी धूप-छाव, नभ-मंडल सब सुना है, लेकिन श्रीराम ने अनुज से यह कहा।"
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥6॥
इसका अर्थ है:
"जानकी को लेकर चलो, जहाँ पर गिरिजा के गुहरों में अवश्य आएंगे असुरों की भयंकर सेना। ध्यान से प्रभु की वाणी सुनो, जो अपने साथ श्रीराम और सीता जी के साथ धनुष और पानी के साथ जा रहे हैं।"
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥7॥
इसका अर्थ है:
"राम ने राक्षसों के दल को देखा और मुस्कुराते हुए कठिन धनुष को तैयार करके उठाया।"
चौपाई :  
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥1॥
इसका अर्थ है:
"जब भगवान श्रीराम ने राक्षसों को देखा, तो उन्हें भय नहीं हुआ। वे रजनीचर (राक्षसों) थक गए और शरीर लाचार हो गए। रावण के सचिव खर दूषण ने कहा, 'यह नृप बालक और नर भूषण कोई अन्य है।'"
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥2॥
इसका अर्थ है:
"नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि - सभी हार जाते हैं। हमने इतने जन्म लिए हैं, लेकिन हमने इस सुंदरता को नहीं देखा।"
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥3॥
इसका अर्थ है:
"भले ही बहन ने एक कुरूप अवतार धारण किया, लेकिन पुरुष के लायक नहीं है। वह तुरंत अपनी स्त्री को छोड़कर जाए, अपने जीवन को दो भाइयों के बीच बाँट दे।"
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु॥
 दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई॥4॥
 इसका अर्थ है:
"मैंने कहा, 'तुम्हें उस संदेश को सुनाना चाहिए।' सुनकर उस वाचन को सुनने के लिए उत्सुक हो जाना चाहिए। दूत ने कहा, 'राम के पास जाते समय मैंने आपको देखा।' श्रीराम ने सुनकर मुस्कान में बोला।"
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥5॥
 इसका अर्थ है:
"हम छत्री मृग्या बन कर रहते हैं, लेकिन तुमसे शातिर मृग को ढूँढते रहते हैं। हम शत्रु के बल पर देखते हैं लेकिन हमें डर नहीं लगता। एक बार तो हम उसके साथ भी युद्ध करते हैं।"
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥
 जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥6॥
इसका अर्थ है:
"हालांकि मनुष्य और राक्षसों के कुल के अनियंत्रित होते हैं, वे मुनियों के पालने के बावजूद भी कपटी, दुष्ट और कपटी बच्चे होते हैं। अगर घर में शक्ति न हो, तो मैं किसी से भी युद्ध करने के लिए वापस नहीं जाता। मैं युद्ध में मुख होते हैं, लेकिन किसी को मैं हानि नहीं पहुंचाता।"
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ॥7॥
इसका अर्थ है:
"राम ने चतुराई से दौड़कर रण में बढ़ाई और दुष्ट शत्रु पर अत्यन्त कृपा की। उसने अपने दूत को तुरंत भेजा और सबको बताया, लेकिन खर और दूषण ने सुनकर बहुत ही दुःखित हो गए।"
चौपाई :  
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते॥
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥1॥
इसका अर्थ है:
"जब रघुकुलनायक श्रीराम ने युद्ध में शत्रु को जीत लिया, तब देवता, मानव और मुनि सबका भय दूर हो गया। इस दौरान लक्ष्मण ने सीता को साथ ले आया, और प्रभु ने उनके पादों में चढ़कर बड़े हर्षित मन से आनंदित हुए।"
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥ 
पंचबटीं बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥2॥
इसका अर्थ है:
"सीता ने श्याम रंग वाले राम को चिताया और मृदु गाते हुए उन्हें प्रेम से निहारा। वे श्रीराम, परम प्रेम के स्वामी, सब देवताओं और मुनियों के हृदय में बसे हुए हैं, जो सुखदायक चरित्र करते हैं।"
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥
बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥3॥
इसका अर्थ है:
"खर और दूषण ने धुआं देखकर श्रीरावण को अभिप्रेरित किया। उन्होंने क्रोध से भारी शब्दों में बोला, और अपनी बुद्धि को देश के प्रदेश को भूलकर खो दिया।"

Comments