सुंदरकांड श्लोक हिंदी में अर्थ सहित

सुंदरकांड श्लोक हिंदी में अर्थ सहित Sunderkand Shloka in Hindi with meaning

सुन्दर काण्ड में 3 श्लोक, 60 दोहा,  1 सोरठा,  3 छंद एवं 60 चौपाई हैं। दोहे अर्थ सहित 46-60 हैसुन्दर काण्ड में 3 श्लोक, 60 दोहा,  1 सोरठा,  3 छंद एवं 60 चौपाई हैं। श्लोकअर्थ सहित है 

श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।

इस श्लोक का अर्थ 
शान्तं - शान्त, शाश्वतम् - शाश्वत, अप्रमेयम् - अप्रमेय, अनघं - निर्दोष, निर्वाणशान्तिप्रदं - निर्वाण और शान्ति को प्रदान करने वाला, ब्रह्मा - ब्रह्मा, शम्भु - शिव, फणीन्द्र - वासुकि (शिव के गले में वसुकि नामक सर्प), सेव्यम् - सेवनीय, अनिशं - सदा, वेदान्तवेद्यं - वेदान्त का ज्ञेय, विभुम् - सर्वशक्तिमान।
रामाख्यं - राम का नाम, जगदीश्वरं - जगत के ईश्वर, सुरगुरुं - देवताओं का गुरु, मायामनुष्यं - माया के द्वारा मनुष्य रूप में, हरिं - हरि (विष्णु), वन्दे - वंदन करता हूँ, अहं - मैं, करुणाकरं - करुणा कारण, रघुवरं - रघुवंशी (राम), भूपालचूड़ामणिम् - भूपाल (राजा) की छवि, चूड़ामणि (माणिक्य) की भाँति,। ।1।।
इस श्लोक के माध्यम से तुलसीदास जी भगवान राम की महिमा और दिव्यता को स्तुति रूप में व्यक्त करते हैं। इसमें राम को सर्वशक्तिमान, अनंत, अप्रमेय, शान्तिदाता, वेदान्त का ज्ञाता, सदा पूज्य, लोकनाथ, देवताओं का गुरु, मानव रूप में माया के द्वारा प्रकट होनेवाले, करुणा का सागर, रघुकुल श्रेष्ठ, और राजा की भूषण आदि गुणों से सुशोभित किया गया है।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।

इस श्लोक का अर्थ

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये - हे रघुपति (राम), मेरे हृदय में तुम्हारे अलावा कोई अन्य इच्छा नहीं है, सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा - मैं सत्य कहता हूँ और हे रघुपुंगव (राम), तुम अन्तरात्मा हो। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे - हे रघुपुंगव, मुझे निर्भर भक्ति प्रदान करो, कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च - और हे मनस्स्वरूप रघुपति, मेरे मन को कामादि दोषों से मुक्त करो।
इस श्लोक में तुलसीदास जी अपने हृदय से राम के प्रति अपनी अनन्य भक्ति का अभिवादन करते हैं। वे कहते हैं कि राम, आपके इलावा मेरे हृदय में किसी अन्य की आकांक्षा नहीं है, और मैं सत्य कह रहा हूँ क्योंकि तुम सबके अंतरात्मा हो। वे राम से निर्भर भक्ति की प्रार्थना करते हैं और चाहते हैं कि राम मन को कामादि दोषों से मुक्त करें।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।

इस श्लोक का अर्थ

अतुलितबलधामं - अतुलनीय बल और धाम, हेमशैलाभदेहं - सोने के पहाड़ों से भी सुंदर शरीर वाले, दनुजवनकृशानुं - राक्षसों को नष्ट करने वाले, ज्ञानिनामग्रगण्यम् - ज्ञानीयों के समृद्धि में प्रमुख, सकलगुणनिधानं - सम्पूर्ण गुणों का संग्रहण करने वाले, वानराणामधीशं - वानरों के अधीश्वर (किंवदन्ति), रघुपतिप्रियभक्तं - रघुपति (राम) के प्रिय और उनके भक्त, वातजातं - वायुपुत्र हनुमान, नमामि - मैं नमन करता हूँ।
इस श्लोक में तुलसीदास जी हनुमानजी का स्तुति करते हैं और उनके अद्वितीय गुणों, बल, ज्ञान, धर्म और भक्ति में प्रशंसा करते हैं। हनुमानजी को रघुपति श्रीराम के प्रिय भक्त के रूप में और समस्त वानरों के अधीश्वर के रूप में पूजा जाता है।

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