संत कबीर के दोहे 551से 600 तक,Saint Kabir's couplets from 551 to 600

संत कबीर के दोहे 551 से 600 तक,(Saint Kabir)

संत कबीरदास  

कबीरदास एक महान संत और कवि थे. कबीरदास के दोहे इस संसार में अत्यंत ही मशहूर हैं. वे अपने दोहों के माध्यम से लोगों को ज्ञान की बातें बताया करते थे. वे एक सच्चे समाज सुधारक थे. वे समाज में उपस्थित विकृतियों को हमेशा ही ठीक करने का प्रयास करते थे. उनके द्वारा कही गयी बातें आज भी प्रासंगिक हैं. तो चलिए अब हम जान लेतें हैं की साल 2024 में संत कबीरदास जी की जयंती कब है?हिन्दू कैलेंडर में ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कबीर जयंती के रूप में मनाया जाता है। कबीर का जन्म संवत 1455 की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था। इन्हें कबीर साहब या संत कबीर दास भी कहा जाता है। इनके नाम पर कबीरपंथ नामक संप्रदाय प्रचलित है। इस संप्रदाय के लोग इन्हें एक अलौकिक अवतारी पुरुष मानते हैं। संत कबीरदास की जयंती प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. इस साल यानी की 2024 में संत कबीरदास जी की जयंती 22 जून 2024, दिन शनिवार को मनाई जायेगी.आप सबको बता दें की इस साल यानी की 2024 में संत कबीरदास की 647वाँ जयंती मनाई जायेगी.
Saint Kabir's couplets from 551 to 600

संत कबीर के दोहे 551से 600 तक

धु आवत देखिकर, हँसी हमारी देह । 
माथा का ग्रह उतरा, नैनन बढ़ा सनेह ॥ 551 ॥
दोहे
साधु शब्द समुद्र है, जामें रत्न भराय । 
मन्द भाग मट्टी भरे, कंकर हाथ लगाय ॥ 552 ॥
दोहे
साधु आया पाहुना, माँगे चार रतन । 
धूनी पानी साथरा, सरधा सेती अन्न ॥ 553 ॥
दोहे
साधु आवत देखिके, मन में करै भरोर । 
सो तो होसी चूहा, बसै गाँव की ओर ॥ 554 ॥
दोहे
साधु मिलै यह सब हलै, काल जाल जम चोट । 
शीश नवावत ढ़हि परै, अघ पावन को पोट ॥ 555 ॥
दोहे
साधु बिरछ सतज्ञान फल, शीतल शब्द विचार । 
जग में होते साधु नहिं, जर भरता संसार ॥ 556 ॥ 
दोहे
साधु बड़े परमारथी, शीतल जिनके अंग । 
तपन बुझावै ओर की, देदे अपनो रंग ॥ 557 ॥
दोहे
आवत साधु न हरखिया, जात न दीया रोय । 
कहै कबीर वा दास की, मुक्ति कहाँ से होय ॥ 558 ॥
दोहे
छाजन भोजन प्रीति सो, दीजै साधु बुलाय । 
जीवन जस है जगन में, अन्त परम पद पाय ॥ 559 ॥
दोहे
सरवर तरवर सन्त जन, चौथा बरसे मेह । 
परमारथ के कारने, चारों धारी देह ॥ 560 ॥ 
दोहे
बिरछा कबहुँन फल भखै, नदी न अंचय नीर । 
परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ॥ 561 ॥ 
दोहे
सुख देवै दुख को हरे, दूर करे अपराध । 
कहै कबीर वह कब मिले, परम सनेही साध ॥ 562 ॥ 
दोहे
साधुन की झुपड़ी भली, न साकट के गाँव । 
चंदन की कुटकी भली, ना बूबल बनराव ॥ 563 ॥ 
दोहे
कह अकाश को फेर है, कह धरती को तोल । 
कहा साध की जाति है, कह पारस का मोल ॥ 564 ॥ 
दोहे
हयबर गयबर सधन धन, छत्रपति की नारि । 
तासु पटतरा न तुले, हरिजन की परिहारिन ॥ 565 ॥ 
दोहे
क्यों नृपनारि निन्दिये, पनिहारी को मान । 
वह माँग सँवारे पीववहित, नित वह सुमिरे राम ॥ 566 ॥ 
दोहे
जा सुख को मुनिवर रटैं, सुर नर करैं विलाप । 
जो सुख सहजै पाईया, सनन्‍्तों संगति आप ॥ 567 ॥ 
दोहे
साधु सिद्ध बहु अन्तरा, साधु मता परचण्ड । 
सिद्ध जु वारे आपको, साधु तारि नौ खण्ड ॥ 568 ॥ 
दोहे
कबीर शीतल जल नहीं, हिम न शीतल होय । 
कबीर शीतल सन्त जन, राम सनेही सोय ॥ 569 ॥ 
दोहे
आशा वासा सन्त का, ब्रह्मा लखै न वेद । 
घट दर्शन खटपट करै, बिरला पावै भेद ॥ 570 ॥ 
दोहे
कोटि-कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करु धाय । 
जब लग साधु न सेवई, तब लग काचा काम ॥ 571 ॥ 
दोहे
वेद थके, ब्रह्मा थके, याके सेस महेस । 
गीता हूँ कि गत नहीं, सन्‍त किया परवेस ॥ 572 ॥ 
दोहे
सन्त मिले जानि बीछुरों, बिछुरों यह मम प्रान । 
शब्द सनेही ना मिले, प्राण देह में आन ॥ 573 ॥ 
दोहे
साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं । 
पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहिं ॥ 574 ॥ 
दोहे
साधु कहावन कठिन है, ज्यों खांड़े की धार । 
डगमगाय तो गिर पड़े निहचल उतरे पार ॥ 575 ॥ 
दोहे
साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर । 
चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरे तो चकनाचूर ॥ 576 ॥ 
दोहे
साधु चाल जु चालई, साधु की चाल । 
बिन साधन तो सुधि नाहिं साधु कहाँ ते होय ॥ 577 ॥ 
दोहे
साधु सोई जानिये, चलै साधु की चाल । 
परमारथ राता रहै, बोलै बचन रसाल ॥ 578 ॥ 
दोहे
साधु भौरा जग कली, निशि दिन फिरै उदास । 
टुक-टुक तहाँ विलम्बिया, जहँ शीतल शब्द निवास ॥ 579 ॥ 
दोहे
साधू जन सब में रमैं, दुख न काहू देहि । 
अपने मत गाड़ा रहै, साधुन का मत येहि ॥ 580 ॥ 
दोहे
साधु सती और सूरमा, राखा रहै न ओट । 
माथा बाँधि पताक सों, नेजा घालैं चोट ॥ 581
दोहे
साधु-साधु सब एक है, जस अफीम का खेत । 
कोई विवेकी लाल है, और सेत का सेत ॥ 582 ॥ 
दोहे
साधु सती औ सिं को, ज्यों लेघन त्यौं शोभ । 
सिंह न मारे मेढ़का, साधु न बाँघै लोभ ॥ 583 ॥ 
दोहे
साधु तो हीरा भया, न फूटै धन खाय । 
न वह बिनभ कुम्भ ज्यों ना वह आवै जाय ॥ 584 ॥ 
दोहे
साधू-साधू सबहीं बड़े, अपनी-अपनी ठौर । 
शब्द विवेकी पारखी, ते माथे के मौर ॥ 585 ॥ 
दोहे
सदा रहे सन्तोष में, धरम आप दृढ़ धार । 
आश एक गुरुदेव की, और चित्त विचार ॥ 586 ॥ 
दोहे
दुख-सुख एक समान है, हरष शोक नहिं व्याप । 
उपकारी निहकामता, उपजै छोह न ताप ॥ 587 ॥ 
दोहे
सदा कृपालु दुःख परिहरन, बैर भाव नहिं दोय । 
छिमा ज्ञान सत भाखही, सिंह रहित तु होय ॥ 588 ॥ 
दोहे
साधु ऐसा चाहिए, जाके ज्ञान विवेक । 
बाहर मिलते सों मिलें, अन्तर सबसों एक ॥ 589 ॥ 
दोहे
सावधान और शीलता, सदा प्रफुल्लित गात । 
निर्विकार गम्भीर मत, धीरज दया बसात ॥ 590 ॥ 
दोहे
निर्बैंरी निहकामता, स्वामी सेती नेह । 
विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह ॥591 ॥ 
दोहे
मानपमान न चित धरै, औरन को सनमान । 
जो कोर्ठ आशा करे, उपदेशै तेहि ज्ञान ॥ 592 ॥ 
दोहे
और देव नहिं चित्त बसै, मन गुरु चरण बसाय । 
स्वल्पाहार भोजन करूँ, तृष्णा दूर पराय ॥ 593 ॥ 
दोहे
जौन चाल संसार की जौ साधु को नाहिं । 
डिंभ चाल करनी करे, साधु कहो मत ताहिं ॥ 594 ॥
दोहे
इन्द्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय । 
सदा शुद्ध आचरण में, रह विचार में सोय ॥ 595 ॥
दोहे
शीलवन्त दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय । 
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय ॥596 ॥
दोहे
कोई आवै भाव ले, कोई अभाव लै आव । 
साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव ॥ 597 ॥
दोहे
सन्त न छाड़ै सन्‍्तता, कोटिक मिलै असंत । 
मलय भुवंगय बेधिया, शीतलता न तजन्त ॥ 598 ॥
दोहे
कमल पत्र हैं साधु जन, बसैं जगत के माहिं । 
बालक केरि धाय ज्यों, अपना जानत नाहिं ॥ 599 ॥
दोहे
बहता पानी निरमला, बन्दा गन्दा होय । 
साधू जन रमा भला, दाग न लागै कोय ॥ 600 ॥

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