पुराण माहात्म्य ,पाताल लोक का वर्णन ,शिव स्मरण द्वारा नरकों से मुक्ति ,Greatness of Puranas, description of underworld, liberation from hells by remembering Shiva

पुराण माहात्म्य ,पाताल लोक का वर्णन ,शिव स्मरण द्वारा नरकों से मुक्ति

पुराण माहात्म्य

सनत्कुमार जी बोले- हे महामुने! जो ब्राह्मण वेद शास्त्रों को पढ़कर दूसरे मनुष्यों को सुनाते हैं, उन्हें इस पुण्य का फल अवश्य मिलता है। नरक की यातनाओं के विषय में बताकर जीवों को सचेत करने वाले पुराण के ज्ञाता और धर्मोपदेशकों को श्रेष्ठ गुरु माना जाता है। वे अपने असीम ज्ञान द्वारा जगत का कल्याण करते हैं। अपना परलोक सुधारने हेतु मनुष्यों को धन, अन्न, भूमि, स्वर्ण, गौ, रथ, वस्त्र एवं आभूषण आदि वस्तुओं का दान करना चाहिए। जुता हुआ खेत अर्थात लहलहाते फसल वाले खेत का दान करने से मनुष्य की दस पीढ़ियां सुधर जाती हैं। वह मनुष्य सभी सुखों को भोगकर अंत में विमान पर सवार होकर सीधे स्वर्गलोक जाता है। अपने घर में अथवा शिवालय या मंदिरों में भगवान शिव, विष्णु और सूर्य पुराण का पाठ करवाने वाले उत्तम पुरुष को राजसूय यज्ञ व अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। वे सूर्यलोक होते हुए ब्रह्मलोक में जाते हैं। देवताओं के मंदिरों में पुराणों की अमृतमय कथा कराने वाले सत्पुरुषों को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। इस संसार में मुक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को श्रद्धापूर्वक भक्ति भावना से शिव पुराण की परम पवित्र कथा अवश्य पढ़नी अथवा सुननी चाहिए। प्रतिदिन कुछ समय के लिए शिव पुराण की कथा अवश्य सुननी या पढ़नी चाहिए। इस संसार में अपने कर्मों के बंधनों से मुक्त होने के लिए शिव पुराण का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए। निरंतर योग शास्त्रों का अध्ययन करने अथवा पुराणों का श्रवण करने से समस्त पापों का नाश होता है एवं धर्म की वृद्धि होती है।
शिव पुराणश्रीउमा संहिता तेरहवां अध्याय 

विभिन्न दानों का वर्णन

सनत्कुमार जी बोले- हे व्यास जी ! मनुष्य यदि दान के लिए सुपात्रों को ही चुने, तभी उसका परम कल्याण होता है। गौ, पृथ्वी, विद्या और तुला का दान सर्वोत्तम माना जाता है। अपने घर के द्वार पर आए मांगने वाले अर्थात याचकों को दूध देने वाली गाय, वस्त्र, जूते, अन्न, छाता अथवा भक्तिभाव से श्रद्धापूर्वक जो भी यथासंभव दान दिया जाए वह परम कल्याणकारी होता है। यही नहीं, स्वर्ण, तिल, हाथी, कन्यादासी, घर, रथ, मणि, गौ, कपिला और अन्न इन दस दानों को महादान माना जाता है। इन दस महादानों को जो भी मनुष्य भक्तिभावना से करता है वह इस भवसागर से अवश्य ही पार हो जाता है। वह सत्पुरुष जीवन और मरण के बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। त्रिलोकीनाथ देवाधिदेव महादेव जी की परम कृपा पाकर उसे भोग और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। सोने में सींग रूप मैं खुर मढ़ाकर वस्त्र, आभूषण एवं अन्य वस्तुओं सहित गाय और बछड़े का दान जो मनुष्य सुपात्र विद्वान ब्राह्मण को करता है, उसके सभी मनोरथों की सिद्धि हो जाती है। वह जीव इस लोक में सभी सुख भोगकर शिवलोक को जाता है। उसे लोक-परलोक में सभी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है। मन में मुक्ति की इच्छा लेकर किया गया दान अवश्य ही हितकर होता है। इस जगत में तुला के दान को भी उत्तम माना जाता है। तुला दान करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह मन ही मन शिवजी का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करे कि वे उसका कल्याण करें। तराजू के एक पलड़े में बैठकर दूसरे पलड़े में अपनी शक्ति के अनुसार द्रव्य भरें और जब दोनों तरफ वजन बराबर हो जाए तो उस द्रव्य को किसी सुपात्र ब्राह्मण को दान करें। ऐसा दान करते समय शुद्ध हृदय से कल्याणकारी भगवान शिव से प्रार्थना करें कि हे प्रभु! मैंने बचपन से लेकर अब तक अपने जीवन में जाने-अनजाने जो भी पाप किए हों उन्हें आप अपनी कृपादृष्टि से भस्म कर दें। हे ऋषिगणो! इस प्रकार तुला दान से जीव सभी पापों से मुक्त हो जाता है तथा सीधे स्वर्गलोक को जाता है और वहीं निवास करता हुआ सभी उत्तम भोगों को भोगता है।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता चौदहवां अध्याय

पाताल लोक का वर्णन

सनत्कुमार जी बोले- हे व्यास जी ! अब मैं आपको ब्रह्माण्ड के विषय में बताता हूं। यह ब्रह्माण्ड जल के बीच में स्थित है और त्रिलोकीनाथ भगवान शिव के अंश शेषनाग ने इसे अपने फन पर धारण कर रखा है एवं श्रीहरि विष्णु इसका पालन करते हैं। सभी देवता और ऋषि-मुनि, साधु-संत सृष्टि के कल्याण हेतु शेषनाग का प्रतिदिन पूजन करते हैं। इन्हीं शेषनाग को अनंत नाम से भी जाना जाता है। आप अनेकों गुणों से संपन्न हैं और आपकी कीर्ति का गुणगान सभी देवताओं सहित सारे ग्रह और नक्षत्र भी निरंतर करते हैं। नाग कन्याएं सदैव आपकी पूजा और आराधना करती रहती हैं। इन्हीं के संकर्षण रूप रुद्रदेव हैं। शेषनाग के बल और स्वरूप को स्वयं देवता भी भली-भांति नहीं जानते तो फिर साधारण पुरुष भला कैसे जान सकते हैं? पृथ्वी के निचले भाग में अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, पाताल आदि कुल सात लोक हैं जो कि दस-दस हजार योजन लंबे और चौड़े तथा बीस-बीस हजार योजन ऊंचे हैं। इन सबकी रत्न, स्वर्ण की पृथ्वी एवं आंगन है। इसी स्थान पर दैत्य महानाग रहते हैं। सूर्य द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली धूप तथा प्रकाश, चंद्रमा की शीतलता एवं चांदनी सिर्फ पृथ्वी लोक को आलोकित करती है। यहीं पर सर्दी, गरमी और वर्षा नामक अनेक ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार पाताल लोक में सभी प्रकार के सुख विद्यमान हैं जो कि जीवों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्णतः सक्षम हैं। धरा में जल के अनगिनत स्रोत हैं जो कि अपने स्वच्छ और निर्मल जल से जीवों की प्यास बुझाते हैं। भैरे यहां पर सदा गुंजार करते हैं। यहां पर अनेक सुंदर अप्सराएं नृत्य करती हैं और गाना गाती हैं। पाताल लोक में अनेक प्रकार के वैभव और विलास उपलब्ध हैं और यहां पर अनेक सिद्ध मनुष्य, दानव और नाग अपने द्वारा की गई तपस्या के उत्तम फल को भोगते हैं।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता पंद्रहवां अध्याय

शिव स्मरण द्वारा नरकों से मुक्ति

सनत्कुमार जी बोले- हे महामुने ! इन्हीं लोकों में सबसे ऊंचे हिस्से में रौरव, शंकर, शूकर, महाज्वाला, तप्त कुंड, लवण, वैतरणी नदी, कृमि-कृमि, भोजन, कठिन, असिपत्र वन, बालाभक्ष्य, दारुण, संदेश कालसूत्र, महारौरव, शालमलि आदि नाम के बड़े ही दुखदायी और कष्टकारक नरक हैं। इन नरकों में आकर पापी मनुष्य की आत्मा अनेक यातनाएं भोगती है। जो ब्राह्मण असत्य के मार्ग पर चलता है, उसे रौरव नामक नरक को भोगना पड़ता है। चोरी करने वाला, दूसरे को धोखा देने वाला, शराब पीने वाला, गुरु की हत्या करने वाले पापी कुंभी नरक में जाते हैं। बहन, कन्या, माता, गाय व स्त्री को बेचने वाला और ब्याज खाने वाले पापी तप्तेलोह नरक के वासी होते हैं। गाय की हत्या करने वाले देवता और पितरों से बैर रखने वाले मनुष्य कृमिभक्ष नरक को भोगते हैं। इस नरक में उन्हें कीड़े खाते हैं। पितरों और ब्राह्मणों को भोजन न देने वालों को लाल भक्ष नरक को भोगना पड़ता है। नीच व पापियों का साथ करने वाले, अभक्ष्य वस्तु खाने वाले एवं बिना घी के हवन करने वाले रुधिरोध नरक में जाते हैं। युवा अवस्था में मर्यादाओं को तोड़ने वाले, शराब व अन्य नशा करने वाले, स्त्रियों की कमाई खाने वाले कृत्य नरक में जाते हैं। वृक्षों को अकारण काटने वाले असिपत्र नरक में, मृगों का शिकार करने वाले ज्वाला नरक में जाते हैं। दूसरों के घर में आग लगाने वाले श्वपाक नरक में तथा अपनी संतान को पढ़ाई से वंचित रखने वाले श्वभोजन नरक में अपने पापों को भोगते हैं। मनुष्य को अपने शरीर एवं वाणी द्वारा किए गए पापों का प्रायश्चित अवश्य करना पड़ता है । बड़े से बड़े पापों का प्रायश्चित त्रिलोकीनाथ भगवान शिव का स्मरण करके किया जा सकता है। पाप, पुण्य, स्वर्ग, नरक ये सब कारण हैं। असल में सुख-दुख सब मन की कल्पनाएं हैं। परम ब्रह्म को पहचानकर उसका पूजन करना ही ज्ञान का सार है।
शिव पुराण श्रीउमा संहिता सोलहवां अध्याय

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