अग्निदेव का महत्त्व महाभारत और हरिवंश पुराण के अनुसार , Importance of Agnidev according to Mahabharata and Harivansh Purana

! अग्नि के प्रकार ! अग्निदेव का महत्त्व महाभारत और हरिवंश पुराण के अनुसार 

अग्नि के प्रकार

पुराणों में अग्नि 108 प्रकार की बताई गई है किंतु उनमें पांच प्रकार की अग्नि मुख्य मानी गई हैं। ये हैं वरदा, शतमंगल, बलद, क्रोध और कामद।
  • बलद : बलद नाम की अग्नि का आव्हान पुष्टि कार्यो में किया जाता है। पुष्टि अर्थात संतान की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति आदि के लिए यदि आप अग्नि का आव्हान कर रहे हैं तो उस समय बलद नाम की अग्नि को आमंत्रित किया जाता है।
  • क्रोध : अभिचार कर्म में क्रोध नाम की अग्नि को बुलाया जाता है। अभिचार अर्थात् मारण, उच्चाटन आदि कार्य क्रोध नाम की अग्नि की उपस्थिति में किए जाते हैं।
  • कामद : वशीकरण, आकर्षण, मोहन जैस कार्यो के निमित्त किए जाने वाले यज्ञ हवन आदि में कामद नाम की अग्नि का आव्हान किया जाता है।
  • वरदा : शांति से संबंधित कार्य जैसे ग्रह शांति, मूल शांति, पारिवारिक सुख-शांति आदि कार्यो में वरदा नाम की अग्नि का आव्हान किया जाता है।
  • शतमंगल : जब आप किसी यज्ञ या हवन की पूर्णाहुति कर रहे हैं। किसी पाठ, व्रत, संकल्प आदि की पूर्ति के लिए किए गए कार्य की पूर्णाहुति करते हैं तब शतमंगल नाम की अग्नि का आव्हान किया जाता है।
Importance of Agnidev according to Mahabharata and Harivansh Purana

अग्निदेव का महत्त्व - महाभारत के अनुसार

देवताओं को जब पार्वती से शाप मिला था कि वे सब सन्तानहीन रहेंगे, तब अग्निदेव वहाँ पर नहीं थे। कालान्तर में विद्रोहियों को मारने के लिए किसी देवपुत्र की आवश्यकता हुई। अत: देवताओं ने अग्नि की खोज आरम्भ की। अग्निदेव जल में छिपे हुए थे। मेढ़क ने उनका निवास स्थान देवताओं को बताया। अत: अग्निदेव ने रुष्ट होकर उसे जिह्वा न होने का शाप दिया। देवताओं ने कहा कि वह फिर भी बोल पायेगा। अग्निदेव किसी दूसरी जगह पर जाकर छिप गए। हाथी ने देवताओं से कहा-अश्वत्थ (सूर्य का एक नाम) अग्नि रूप है। अग्नि ने उसे भी उल्टी जिह्वा वाला कर दिया। इसी प्रकार तोते ने शमी में छिपे अग्नि का पता बताया तो वह भी शापवश उल्टी जिह्वा वाला हो गया। शमी में देवताओं ने अग्नि के दर्शन करके तारक के वध के निमित्त पुत्र उत्पन्न करने को कहा। अग्नि देव शिव के वीर्य का गंगा में आधान करके कार्तिकेय के जन्म के निमित्त बने। भृगु पत्नी पुलोमा का पहले राक्षस पुलोमन से विवाह हुआ था। जब भृगु अनुपस्थित थे, वह पुलोमा को लेने आया तो उसने यज्ञाग्नि से कहा कि वह उसकी है या भृगु की भार्या। उसने उत्तर दिया कि यह सत्य है कि उसका प्रथम वरण उसने (राक्षस) ही किया था, लेकिन अब वह भृगु की पत्नी है।
जब पुलोमन उसे बलपूर्वक ले जा रहा था, उसके गर्भ से 'च्यवन' गिर गए और पुलोमन भस्म हो गया। उसके अश्रुओं से ब्रह्मा ने 'वसुधारा नदी' का निर्माण किया। भृगु ने अग्नि को शाप दिया कि तू हर पदार्थ का भक्षण करेगी। शाप से पीड़ित अग्नि ने यज्ञ आहुतियों से अपने को विलग कर लिया, जिससे प्राणियों में हताशा व्याप्त हो गई। ब्रह्मा ने उसे आश्वासन दिया कि वह पूर्ववत् पवित्र मानी जाएगी। सिर्फ़ मांसाहारी जीवों की उदरस्थ पाचक अग्नि को छोड़कर उसकी लपटें सर्व भक्षण में समर्थ होंगी। अंगिरस ने अग्नि से अनुनय किया था कि वह उसे अपना प्रथम पुत्र घोषित करें, क्योंकि ब्रह्मा द्वारा नई अग्नि स्रजित करने का भ्रम फैल गया था। अंगिरस से लेकर बृहस्पति के माध्यम से अन्य ऋषिगण अग्नि से संबद्ध रहे हैं।

अग्निदेव का महत्त्व - हरिवंश पुराण के अनुसार

असुरों के द्वारा देवताओं की पराजय को देखकर अग्नि ने असुरों को मार डालने का निश्चय किया। वे स्वर्गलोक तक फैली हुई ज्वाला से दानवों की दग्ध करने लगे। मय तथा शंबरासुर ने माया द्वारा वर्षा करके अग्नि को मंद करने का प्रयास किया, किन्तु बृहस्पति ने उनकी आराधना करके उन्हें तेजस्वी रहने की प्रेरणा दी। फलत: असुरों की माया नष्ट हो गई। जातवेदस् नामक अग्नि का एक भाई था। वह हव्यवाहक (यज्ञ-सामग्री लाने वाला) था। दिति-पुत्र (मधु) ने देवताओं के देखते-देखते ही उसे मार डाला। अग्नि गंगाजल में आ छिपा। देवता जड़वत् हो गए। अग्नि के बिना जीना कठिन लगा तो वे सब उसे खोजते हुए गंगाजल में पहुँचे। अग्नि ने कहा, भाई की रक्षा नहीं हुई, मेरी होगी, यह कैसे सम्भव है? देवताओं ने उसे यज्ञ में भाग देना आरम्भ किया। अग्नि ने पूर्ववत् स्वर्गलोक तथा भूलोक में निवास आरम्भ कर दिया। देवताओं ने जहाँ अग्नि प्रतिष्ठा की, वह स्थान अग्नितीर्थ कहलाया।
दक्ष की कन्या (स्वाहा) का विवाह अग्नि (हव्यवाहक) से हुआ। बहुत समय तक वह नि:सन्तान रही। उन्हीं दिनों तारक से त्रस्त देवताओं ने अग्नि को सन्देशवाहक बनाकर शिव के पास भेजा। शिव से देवता ऐसा वीर पुत्र चाहते थे, जो कि तारक का वध कर सके। पत्नी के पास जाने में संकोच करने वाले अग्नि ने तोते का रूप धारण किया और एकान्तविलासी शिव-पार्वती की खिड़की पर जा बैठा। शिव ने उसे देखते ही पहचान लिया तथा उसके बिना बताये ही देवताओं की इच्छा जानकर शिव ने उसके मुँह में सारा वीर्य उड़ेल दिया। शुक (अग्नि) इतने वीर्य को नहीं सम्भाल पाए। उसने वह गंगा के किनारे कृत्तिकाओं में डाल दिया, जिनसे कार्तिकेय का जन्म हुआ। थोड़ा-सा बचा हुआ वीर्य वह पत्नी के पास ले गया। उसे दो भागों में बाँटकर स्वाहा को प्रदान किया, अत: उसने (स्वाहा ने) दो शिशुओं को जन्म दिया। पुत्र का नाम सुवर्ण तथा कन्या का नाम सुवर्णा रखा गया। मिश्र वीर्य सन्तान होने के कारण वे दोनों व्यभिचार दोष से दूषित हो गए। सुवर्णा असुरों की प्रियाओं का रूप बनाकर असुरों के साथ घूमती थी तथा सुवर्ण देवताओं का रूप धारण करके उनकी पत्नियों को ठगता था। सुर तथा असुरों को ज्ञात हुआ तो उन्होंने दोनों को सर्वगामी होने का शाप दिया। ब्रह्मा के आदेश पर अग्नि ने गोमती नदी के तट पर, शिवाराधना से शिव को प्रसन्न कर दोनों को शापमुक्त करवाया। वह स्थान तपोवन कहलाया।

अग्नि देवता से जुड़ी कुछ बातें

  • अग्नि देवता, प्रकाश करने वाले और सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं.
  • अग्नि देवता की दो बहनें हैं, दिन और रात.
  • अग्नि देवता की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान, और शुचि नामक तीन पुत्र हुए.
  • अग्नि देवता की उत्पत्ति भगवान के मुख से हुई है और ये सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं.
  • अग्नि देवता का वाहन भेड़ है. कुछ छवियों में अग्नि देव को एक रथ पर सवारी करते हुए भी दिखलाया गया है जिसे बकरियों और तोतों द्वारा खींचा जा रहा होता है.
  • अग्नि देवता के बारे में कहा गया है कि ये प्रकाशकों का प्रकाशक, नित्यों का नित्य, और चेतनों का चेतन है.
  • अग्नि देवता को बल में वायु और इंद्र के सदृश देव-स्वरूप वाला बताया गया है.
  • अग्नि देवता के बारे में कहा गया है कि ये समान रूप से सूर्य, बिजली, और घरेलू तथा यज्ञ चूल्हे दोनों की अग्नि हैं.
  • अग्नि देवता का अग्निमय लाल रंग का शरीर बताया गया है. इसके तीन पैर, सात भुजाएं, सात जीभें, और तेज सुनहरे दांत होते हैं.
  • अग्नि देवता के दो चेहरे, काली आंखें, और काले बाल होते हैं. घी के साथ घिरे होते हैं

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