पुराणों में अग्निदेव का महात्म्य (Importance) ,Puraanon Mein Agnidev Ka Mahaatmy

पुराणों में अग्निदेव का महात्म्य (Importance) ,

संस्कृत शब्द अग्नि का अर्थ है 'अग्नि' और यह शब्द अग्नि देवता का प्रतिनिधित्व करता है। अग्नि सबसे महत्वपूर्ण वैदिक देवताओं में से एक है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पृथ्वी का स्वामी है। वह प्राचीन ऋग्वेद में सबसे अधिक संदर्भित देवत्व हैं, जिसमें कई भजनों के साथ उनकी प्रशंसा की गई है और उन्हें वायु, पवन देवता और सूर्य , सूर्य के साथ एक सर्वोच्च देवता माना जाता है।

Puraanon Mein Agnidev Ka Mahaatmy

अग्नि के पीछे की पौराणिक कथा

अग्नि के देवता अग्नि के बारे में कई किंवदंतियाँ हैं।
कहा जाता है कि एक बार उन्होंने ऋषि भृगु को नाराज कर दिया था, जिन्होंने उन्हें हमेशा भूखा रहने और हर चीज निगलने का श्राप दे दिया था। महाभारत में अग्नि द्वारा अपनी भूख को शांत करने के लिए कृष्ण और अर्जुन के पास जाने और उनकी मदद से पूरे खांडव वन को भस्म करने और पूरे एक पखवाड़े तक सभी चीजों को जलाने के बारे में बताया गया है। बाद में, भगवान ब्रह्मा ने दया दिखाई और शाप में संशोधन किया, जिससे अग्नि को, उनके द्वारा छुई गई हर चीज को शुद्ध करने वाला बनाया गया। कहानी में अग्नि का भी उल्लेख है, जिसमें राजा शिबि की परीक्षा अग्नि देवता द्वारा की जाती है, जो कबूतर के रूप में प्रकट होता है और बाज़ के रूप में भगवान इंद्र द्वारा पीछा किए जाने पर राजा की शरण मांगता है। शिबी की करुणा तब सिद्ध होती है जब वह कबूतर की रक्षा करता है और इसके बदले बाज की भूख मिटाने के लिए उसे अपना मांस देता है। तब प्रसन्न होकर देवता नेक राजा को अपना आशीर्वाद देते हैं। रामायण में अग्नि की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। महान महाकाव्य में, रावण के साथ युद्ध समाप्त होने के बाद, सीता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा। जैसे ही वह अग्नि में प्रवेश करती है, भगवान अग्नि अपने मानव रूप में चमकती हुई दिव्य माँ को लेकर प्रकट होते हैं, और इस प्रकार पूरी दुनिया के सामने अपनी त्रुटिहीन पवित्रता साबित करते हैं।

पुराणों में अग्निदेव का महात्म्य

अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं। वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है। उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। अतः यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।
आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलती हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था। पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओं के मुख हैं। इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है। वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। उन जिह्वाओं के नाम : - काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं।
पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। भगवान कार्तिकय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।
अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया।अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था। अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नमः है।
ऋग्वेद के अनुसार, अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए। अतः सब देवता बहुत भयभीत हुए। अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया। तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की। अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं। अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।

अग्नि से सम्बंधित घटनाएँ

अग्नि को देवताओं का मुख भी माना जाता है और इसलिए होम, अग्नि अनुष्ठानों में इसका आह्वान किया जाता है, जो देवताओं तक प्रसाद पहुंचाने के लिए एक माध्यम के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार प्रत्येक होम अग्नि को एक महान श्रद्धांजलि के रूप में और सबसे विकसित आध्यात्मिक तकनीक के रूप में भी बना रहता है।

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