कबीर दास जी की दोहावली 151 और कबीर की शिक्षा,अंतिम संस्कार कैसे हुआ ,Kabir Das ji's Dohavali 151 and Kabir's teachings, how the last rites were performed

कबीर दास जी की दोहावली 151 और कबीर की शिक्षा,अंतिम संस्कार कैसे हुआ

  • कबीर की शिक्षा कहाँ तक हुई थी

कबीर की शिक्षा बिल्कुल भी नहीं हुई थी यानी वह निरक्षर थे। कबीर दास भक्ति काल के निर्गुण विचारधारा के कवि रहे हैं, जो जुलाहे का कार्य करते थे, क्योंकि उनका पालन पोषण जुलाहे दंपति ने किया था। बेहद गरीब परिवार से होने के कारण वह बचपन में शिक्षा-दीक्षा नही प्राप्त कर पाये।
Kabir Das ji's Dohavali 151 and Kabir's teachings, how the last rites were performed
  • कबीर दास जी का अंतिम संस्कार कैसे हुआ 
लेकिन जब इसी विवाद के बीच शव से चादर हटाई गई तो वहां पर शरीर की जगह केवल फूल थे। इन फूलों को लोगों ने आपस में बांट लिया और अपने धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार किया।

कबीर दास जी की दोहावली 101 से 151तक

  • !! दोहावली 151!!
तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर । 
तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥ 101 ॥ 

आस पराई राख्त, खाया घर का खेत । 
औरन को प्त बोधता, मुख में पड़ रेत ॥ 102 ॥ 

सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार । 
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥ 103 ॥ 

सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय । 
सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय ॥ 104 ॥ 

बलिहारी वा दूध की, जामे निकसे घीव । 
घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव ॥ 105 ॥ 

आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न प्रकट होय । 
सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥ 106 ॥ 

साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय । 
आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय ॥ 107 ॥ 

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार । 
बाल सने ही सांडया, आवा अन्त का यार ॥ 108 ॥ 

कबिरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय । 
जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥ 109 ॥ 

ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय । 
सौरन कलश सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय ॥ 110 ॥ 

सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार । 
होले-होले सुरत में, कहैं कबीर विचार ॥ 111॥ 

सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल । 
कबिरा पीछा क्‍या रहा, गह पकड़ी जब मूल ॥ 112 ॥ 

जो जन भीगे रामरस, विगत कबहूँ ना रूख । 
अनुभव भाव न दरसते, ना दुःख ना सुख ॥ 113 ॥ 

सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर । 
जैसा बन है आपना, तैसा बन है और ॥ 114 ॥ 

यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो । 
बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो ॥ 115 ॥ 

जहर की जर्मी में है रोपा, अभी खींचे सौ बार । 
कबिरा खलक न तजे, जामे कौन विचार ॥ 116 ॥ 

जग मे बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय । 
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ॥ 117 ॥ 

जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार । 
जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार ॥118 ॥ 

कबीर जात पुकारया, चढ़ चन्दन की डार । 
बाट लगाए ना लगे फिर क्‍या लेत हमार ॥ 119 ॥ 

लोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय । 
जीय रही लूटत जम फिरे, मँढ़ा लुटे कसाय ॥ 120 ॥ 

एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार । 
है जैसा तैसा हो रहे, रहें कबीर विचार ॥121 ॥ 

जो तु चाहे मुक्त को, छोड़े दे सब आस । 
मुक्त ही जैसा हो रहे, बस कुछ तेरे पास ॥ 122 ॥ 

साँई आगे साँच है, साँई साँच सुहाय । 
चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट भुण्डाय ॥ 123 ॥ 

अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान । 
हरि की बातें दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥ 124 ॥ 

खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह । 
आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह ॥ 125 ॥
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लीक पुरानी को तजें, कायर कुटिल कपूत । 
लीख पुरानी पर रहें, शातिर सिंह सपूत ॥ 126 ॥ 

सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह । 
लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह ॥ 127 ॥ 

भूखा-भूखा क्या करे, कया सुनावे लोग । 
भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग ॥ 128 ॥ 

गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव । 
कहे कबीर बैकुण्ठ से, फेर दिया शुक्देव ॥ 129 ॥ 

प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय । 
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय ॥ 130 ॥ 

कांचे भाड़ें से रहे, ज्यों कुम्हार का देह । 
भीतर से रक्षा करे, बाहर चोई देह ॥ 131 ॥ 

साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं । 
राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं ॥132 ॥ 

केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह । 
अवसर बाोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह ॥ 133 ॥ 

एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय । 
एक से परचे भया, एक मोह समाय ॥ 134 ॥ 

साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध । 
आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ॥ 135 ॥ 

हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप । 
निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप ॥ 136 ॥ 

आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत । 
जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ॥ 137 ॥ 

आग जो लगी समुद्र में, धुआँ ना प्रकट होय । 
सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥ 138 ॥ 

अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट । 
चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पठन को फूट ॥ 139 ॥ 

अपने-अपने साख की, सब ही लीनी भान । 
हरि की बात दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥140 ॥ 

आस पराई राखता, खाया घर का खेत । 
और्न को पथ बोधता, मुख में डारे रेत ॥144 ॥ 

आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक । 
कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥ 142 ॥ 

आहार करे मनभावता, इंद्री की स्वाद । 
नाक तलक पूरन भरे, तो कहिए कौन प्रसाद ॥ 143 ॥ 

आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर । 
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बाँधि जंजीर ॥ 144 ॥ 

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान । 
सूरत सँभाल ए काफिला, अपना आप पह्चान ॥ 145 ॥ 

उज्जवल पहरे कापड़ा, पान-सुपरी खाय । 
एक हरि के नाम बिन, बाँधा यमपुर जाय ॥ 146 ॥ 

उतते कोई न आवई, पासू पूछँ धाय । 
इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय ॥ 147 ॥ 

अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक होय । 
मानुष से पशुआ भया, दाम गाँठ से खोय ॥ 148 ॥ 

एक कहूँ तो है नहीं, दूजा ६३ 8 गार। 
है जैसा तैसा रहे, रहे कबीर ॥ 149 ॥ 

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए । 
औरन को शीतल करे, आपौ शीतल होय ॥ 150 ॥ 

कबीरा संग्डति साधु की, जौ की भूसी खाय । 
खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय ॥ 151 ॥

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