तुलसी उपासना द्वारा मानसिक शांति तुलसी कवच ,Mental Peace by Tulsi Upasana Tulsi Kavach

तुलसी उपासना द्वारा मानसिक शांति तुलसी कवच

श्यामा तुलसी की माला को धारण करने से मानसिक शांति मिलती है और मन में पॉजिटिविटी आती है. आध्यात्मिक के साथ ही साथ पारिवारिक तथा भौतिक उन्नति भी होती है. ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति भाव बढ़ता है. वहीं रामा तुलसी की माला को धारण करने से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास बढ़ता है और सात्विक भावनाएं जागृत होती हैं.
वर्तमान समय में मानसिक चिकित्सा में आत्मसंकेत (ऑटो सजैशन) का बड़ा महत्त्व है। यदि कोई मनुष्य अपने स्वास्थ्य, विचार और मानसिक प्रवृत्तियों को श्रेष्ठ बनाने के लिए बार-बार किसी काम को मन में लाकर मुँह से कहे और वैसी ही कल्पना करे तो उसमें धीरे-धीरे उन विशेषताओं की वृद्धि होती रहती है। जो उद्देश्य आधुनिक विचारों के व्यक्ति 'ऑटो सजैशन' से पूरा करते हैं, उसी को हमारे यहाँ के प्राचीन मनीषियों ने देवताओं की प्रार्थना-स्तुति कवच आदि के माध्यम से प्राप्त करने की विधि निकाली थी। इन दोनों मार्गों की भली प्रकार परीक्षा करने के उपरांत हम कह सकते हैं कि सामान्य स्तर के लोगों के लिए दूसरा मार्ग ही अधिक लाभदायक है, क्योंकि किसी स्थूल पदार्थ को आधार बनाकर प्रयुक्त किया जाता है, पर पहली विधि जो केवल मानसिक भावनाओं और किसी निराकार शक्ति पर आश्रित रहती है, वह अधिक विचारशील प्राणी, जिनकी संख्या अपेक्षाकृत थोड़ी ही रहती है, के द्वारा काम में लाई जा सकती है।
यद्यपि आज अन्य धर्म कृत्य, पूजा, उपासना आदि के समान स्तोत्र और कवच आदि भी रूढ़ि मात्र बन गए हैं और बिना अर्थ को समझे, बिना किसी प्रकार की भावना के तोता की तरह रट लिए जाते हैं। इस प्रकार लकीर पीटने से अगर कोई लाभ दिखाई न दे तो इसमें आश्चर्य ही क्या? अन्यथा जो प्रार्थना व स्तुति भावपूर्वक दृढ़ विश्वास और श्रद्धा के साथ की जाती है, उसका कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष फल मिलना अनिवार्य है।

तुलसी कवच

इस दृष्टि से तुलसी कवच हमको एक बड़ी अच्छी स्तुति प्रतीत होती है। इसमें तुलसी की अंतर्निहित शक्ति की एक दैवी व्यक्तित्व के रूप में भावना करते हुए उससे सिर से लेकर पैरों तक प्रत्येक अंग की रक्षा करने की, उन्हें स्वस्थ और कार्यक्षम स्थिति में रखने की प्रार्थना की गई है। एक तो तुलसी के समीप का वातावरण ही स्वास्थ्य प्रदायक तत्त्वों से युक्त और मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने वाला होता है और उसके साथ ही यदि हम उसे दैवी विभूति मानकर अपने स्वास्थ्य तथा कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं, तो ऐसी स्तुति अवश्य ही एक सर्वोत्तम 'ऑटो सजैशन' का काम दे सकती है। नीचे हम 'ब्रह्मांड पुराण' में दिए 'तुलसी माहात्म्य' में से 'तुलसी कवच' के कुछ श्लोक उद्धत करते हैं। पाठक देखेंगे कि उसमें किस प्रकार मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति की कामना और भावना संबंधी प्रेरणाएँ भरी हुई हैं।

तुलसी श्रीमहादेवि नमः पंकज धारिणी।
 शिरोमे तुलसी पातु भालं पातु यशस्विनी ॥
 दृर्गो मे पद्मनयना श्रीसखी श्रवणो मम।
घ्राण पातु सुगन्धमे नखं च सुमुखी मम ॥

तुलसी के उपरोक्त विभिन्न नामों का उल्लेख करते हुए उपासक उससे प्रार्थना करता है- "कमल पुष्प को धारण करने वाली श्रीतुलसी देवी को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। तुलसी के रूप में मेरे सिर की, यशस्विनी रूप में मेरे मस्तक की रक्षा करें। 'पद्म नयना' नाम देने वाली मेरे नेत्रों की, श्री सखी नाम से मेरे कानों की, 'गंधम्' नाम से मेरी नासिका की और 'सुमुखी' नाम से मेरे मुख की रक्षा करें।"

जिह्वां मे पातु शुभदा कण्ठ विद्यामयो मम। 
स्कन्धौ कल्हारिणि पातु हृदयं विष्णु वल्लभा ॥ 
पुण्यदा मातु मे मध्यं नाभि सौभाग्य दायिनी। 
कटि कुण्डलिनी पातु ऊरु नारद वन्दितः ॥

'शुभदा' मेरी जिह्वा की रक्षा करे।  'विद्यामयी' कंठ की, 'कल्हारिणी' कंधों की, 'विष्णु वल्लभा' हृदय की, 'पुण्यदा' मध्य भाग (धड़) की, 'सौभाग्यदायिनी' नाभि की, 'कुण्डलिनी' कमर की और 'नारद वंदिता' मेरे उरु प्रदेश की रक्षा करती रहे।
जननी जानुनी पातु जंघे सकल वन्दिता । 
नारायण प्रिया पादौ सर्वांग सर्वरक्षिणी ॥ 
सङ्कटे विषमे दुर्गे भये वादे महाहवे। 
नित्ये साध्ययौ पातु तुलसी सर्वदः सदा ॥ 

'जननी' धातुओं की, 'सकल वंदिता' जंघाओं की, 'नारायण प्रिया' पैरों की और 'सर्व रक्षिणी' मेरे सर्वांग की रक्षा करें। 'दुर्गा' घोर संकट से और 'महाहवे' भय और विरोधियों से बचाएँ। 'संध्या रूपिणी' नित्य रक्षा करती रहें और तुलसी देवी सदैव कुशल से रखें। 
इतीदं परम गुह्यं तुलस्या कवचामृतम्। 
मृत्यान ममृतार्थाय भीतानाम भयाय च ॥ 
मौक्षाय च मुमुक्षाणां ध्यानिनां ध्यानयोगकृत । 
वशाय विश्वकामनां विद्यावै वेदवादिकाम् ॥ 

यह 'तुलसी कवच' अत्यंत गुह्य है, जिसके प्रभाव से मरणासन्न व्यक्ति मृत्यु के आतंक से और भयभीत सब प्रकार के भयों से परित्राण पा जाते हैं। इसके द्वारा मोक्षाभिलाषियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, योगाभिलाषियों को ध्यान में सुदृढ़ता मिलती है, सांसाराभिलाषियों की कामनाएँ पूर्ण होती हैं और ज्ञानाभिलाषियों को विद्या की प्राप्ति होती है।

द्रविणाम दरिद्राणां पापिना पाप शान्तय । 
अन्नाय क्षुधितानां च स्वर्गमिच्छताम् ॥ 
भक्तर्थ विष्णु भक्तानां विष्णो सर्वान्तिरात्मनि । 
जाप्य त्रिवर्ग सिद्धयर्थ गृहस्थेन विशेषतः ।।

'दीन-दरिद्र' व्यक्तियों को संपत्ति मिलती है, दुष्कर्म ग्रस्तों की पाप कर्मों में से प्रवृत्ति मिट जाती है, भूखों को अन्न की और स्वर्गाभिलाषियों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और गृहस्थों को त्रिवर्ग की प्राप्ति होती है। यद्यपि यह 'तुलसी कवच' एक स्तोत्र के समान ही है, तो भी इसका यदि श्रद्धापूर्वक तन्मयता के साथ पाठ किया जाए और इसमें दिए गए शारीरिक तथा मानसिक उन्नति के संकेतों को प्रयत्नपूर्वक हृदयंगम किया जाए तो शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक स्थिति पर उसका कल्याणकारी प्रभाव पड़ना असंभव नहीं है। शरीर और मन की उन्नति होने से अन्य सांसारिक विषयों और जीवन निर्वाह संबंधी कार्यों पर भी उसका सुप्रभाव निश्चित है। इसलिए तोते की तरह रटा हुआ उच्चारण न करके अगर भावनापूर्वक ऐसी उपासना की जाएगी तो वह कई दृष्टि से लाभजनक अवश्य होगी।

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