तुलसी का महत्व और तुलसी का प्रयोग ,Importance of Tulsi and use of Tulsi

तुलसी  का महत्व और तुलसी का प्रयोग

तुलसी की महिमा क्या है?

कहा गया है कि जहां तुलसी होती है वहां साक्षात लक्ष्मी का निवास भी होता है। स्वयं भगवान नारायण श्री हरि तुलसी को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। यह मोक्षकारक है तो भगवान की भक्ति भी प्रदान करती है, क्योंकि ईश्वर की उपासना, पूजा व भोग में तुलसी के पत्तों का होना अनिवार्य माना गया है।
तुलसी के पत्तों का काढ़ा पीने से जुकाम, सिर दर्द, बुखार आदि रोगों से लाभ मिलता है. तुलसी के पत्ते चबाकर ऊपर से पानी पीने से कैंसर से लाभ मिलता है. तुलसी के पत्तों के सेवन से रक्त चाप सामान्य होता है. 
तुलसी के पत्तों में कफ़-वात दोष को कम करने, पाचन शक्ति और भूख बढ़ाने और रक्त को शुद्ध करने वाले गुण होते हैं. इसके अलावा तुलसी के पत्ते बुखार, दिल से जुड़ी बीमारियां, पेट दर्द, मलेरिया और बैक्टीरियल संक्रमण आदि के इलाज में बहुत फ़ायदेमंद हैं. 
तुलसी के पौधे को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है. जिन घरों में तुलसी का पौधा होता है वहां पर मां लक्ष्मी हमेशा वास करती हैं.

Importance of Tulsi and use of Tulsi
तुलसी  का महत्व और तुलसी का प्रयोग

  1. किसी प्रकार के विष जैसे अफीम, कुचला, धतूरा आदि खा जाने पर तुलसी के पत्रों को पीसकर गाय के घी में मिलाकर पीने से आराम होता है। घी की मात्रा अवस्था के अनुसार पावभर से आधा सेर तक हो सकती है। एक बार में आराम न हो तो बार-बार तुलसी घृत पिलाना चाहिए।
  2. तृषा रोग में तुलसी के रस में नींबू तथा मिश्री मिलाकर और थोड़ा पानी डालकर शरबत की तरह सेवन करने से लाभ होता है।
  3. दिन में दो बार, विशेषकर भोजन के घंटे, आधे घंटे बाद तुलसी के चार-पाँच पत्ते चबा लेने से मुख में दुर्गंध आना बंद हो जाता है।
  4. तुलसी पत्र, हुरहुर के पत्ते, अमरबेल, ऊँट की मेंगनी, इन सबको गौमूत्र में पीसकर और पकाकर बढ़े अंडकोष के ऊपर गाढ़ा लेप करने से लाभ होता है।
  5. चारपाई में खटमल हो जाने पर वन तुलसी की डाली रख देने से ये भाग जाते हैं। इन डालों को घर में रखने से मच्छर, छबूंदर व सांप नहीं आते, ये सब जीव वन तुलसी की गंध को सहन नहीं कर सकते।
  6. छाती, पेट तथा पिंडलियों में जलन का अनुभव होने पर तुलसी की पत्ती और देवदारू की लकड़ी घिसकर चंदन की तरह लेप कर देना लाभदायक होता है।
  7. गले के दरद में तुलसी के पत्तों का रस शहद में मिलाकर चाटना चाहिए।
  8. पेचिश, मरोड़ और आँव आने की शिकायत होने पर तुलसी पत्र सूखा दो माशा, काला नमक एक माशा, आधा पाव दही में मिलाकर सेवन करें।
  9. बवासीर के लिए तुलसी की जड़ तथा नीम की निबोरियों की मिंगी समान भाग लेकर पीसकर चूर्ण बना लें,इसमें ३ माशा प्रतिदिन छाछ के साथ सेवन करने से लाभ होता है।
  10. पेट ट में तिल्ली बढ़ जाने पर तुलसी की जड़, नौसादर, भुना सुहागा और जवाखार बराबर लेकर समान भाग में पीसकर चूर्ण बना लें, इसमें २-३ माशा ताजा पानी के साथ सुबह खा लेने से आराम होता है।
  11. देह में पित्ती उठ आने पर तुलसी के बीज २ माशा आँवला के मुरब्बे के साथ मिलाकर सेवन करना चाहिए।
  12. पसली में सरदी का दरद उठ आने पर तुलसी की पत्ती का रस ६ माशा और पोंहकर मूल का चूर्ण ३ माशा मिलाकर गरम करके दरद के स्थान पर लेप करें।
  13. नेहरू या नेहरूआ की बीमारी में सूजन के स्थान पर तुलसी की जड़ को घिसकर लेप करना चाहिए। इससे कीड़े का २-३ इंच लंबा भाग बाहर निकल जाएगा, उसको बाँधकर अगले दिन फिर इसी प्रकार लेप करें। इस तरह २-३ दिन में पूरा कीड़ा
  14. बाहर निकल आता है और कुछ समय तक लेप करते रहने से घाव बिलकुल ठीक हो जाता है। 
वन तुलसी के पत्ते हैजे में आश्चर्यजनक प्रभाव दिखलाते हैं। पत्तों के साथ बीज की गिरी, नीम की छाल, अपामार्ग (औंगा) के बीज, गिलोय, इंद्रजौ, इन सबको मिलाकर दो-तीन तोला, तीन पाव पानी में पकाएँ, जब आधा रह जाए तो तीन तोला की मात्रा थोड़ी-थोड़ी देर में देता चला जाए। इस प्रयोग से हैजा के कठिन रोगियों की प्राणरक्षा भी प्रायः हो जाती है।


तुलसी एक जड़ी-बूटी है. तुलसी के पत्तों में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं. तुलसी के पत्ते चबाने से कई फ़ायदे होते हैं:-
तुलसी के पत्तों का काढ़ा पीने से जुकाम, सिर दर्द, बुखार आदि रोगों से फ़ायदा मिलता है. तुलसी के पत्तों को चबाकर ऊपर से पानी पीने से कैंसर से फ़ायदा मिलता है. तुलसी के पत्तों के सेवन से रक्त चाप सामान्य होता है. खांसी, दमा, इओसिनोफ़िल आदि में तुलसी के 10 पत्ते, एक चम्मच बायबडिंग का काढ़ा बनाकर पीने से फ़ायदा मिलता है
  • सर्दी-खांसी में फ़ायदेमंद
  • पाचन में सुधार
  • मुंह की बदबू दूर होती है
  • तनाव कम होता है
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
  • कान दर्द और सूजन में राहत
  • दस्त में आराम
  • चोट लगने पर फ़ायदेमंद
  • कैंसर रोधी गुण
  • त्वचा और बालों के लिए फ़ायदेमंद
  • ओरल हेल्थ के लिए बेहतरीन
  • किडनी स्टोन में इस्तेमाल किया जा सकता है 
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तुलसी का प्रयोग

अनेक प्रदेशों में तुलसी को साँप काटने पर चिकित्सा के लिए प्रयोग में लाया जाता है। मध्यप्रदेश की कई आदिवासी जातियों में तुलसी के पत्तों को पीसकर तथा मक्खन मिलाकर साँप के काटे हुए स्थान पर लेप कर देते हैं। इसी प्रकार जब तक लेप काला पड़ता जाता है, तब तक उसे बदल कर नया लेप करते रहते हैं। इस विधि से तुलसी के पत्ते समस्त विष को खींच लेते हैं। कुछ लोग साँप के काटे हुए व्यक्ति को एक मुट्ठी तुलसी के पत्ते खिला देते हैं और तुलसी को बारीक पीसकर मक्खन के साथ मिलाकर सर्पदंश के स्थान पर लेप किया जाता है। इस लेप को भी उपयुक्त लेप की तरह बार-बार बदलना पड़ता है, जिससे विष का प्रभाव दूर होकर रोगी की प्राणरक्षा हो जाती है।
  • तुलसी के द्वारा सर्प विष की चिकित्सा की एक और विधि कुछ वर्ष पहले एक सामयिक पत्र में प्रकाशित हुई थी। रामकृष्ण मिशन के एक आश्रम में खबर आई कि पास के एक गाँव में किसी स्त्री को साँप ने काट लिया है। इस पर आश्रम के दो संन्यासी चिकित्सा के लिए भेजे गए। उस समय साँप के काटे हुए आठ घंटे हो गए थे। स्त्री लगभग मुरदा जैसी हो गई थी। चिकित्सा के लिए बहुत सी तुलसी और केले का तना मँगवाया गया। इन दोनों का रस निकालकर रोगी के मस्तक और छाती पर मला गया और दो तोला रस उसके मुख में डाला गया। यह प्रयोग पाँच-पाँच और दस-दस मिनट के अंतर से चालू रखा गया। अंत में ६-७ घंटे बाद रोगिणी को होश आया। उसके बाद उपचार की अन्य पद्धतियाँ भी अपनाई गईं। रोगी को एनिमा लगाकर दस्त भी कराया गया। लगभग चौबीस घंटे में उसे पूरा लाभ हो गया। प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ में भी तुलसी की विषनाशक शक्ति का वर्णन मिलता है। 'चरक संहिता' में कहा गया है -
काकण्ड सुरसा गवाक्षो पुनर्नवायसो शिरीषफलै।
उद्बंध विषजलसूस लपोनस्य पाननि ॥
अर्थात
साँप के विष में तुलसी, काकतिंतु, इंद्रायण, पुनर्नवा, मकोय और सरिस के बीजों को एक साथ पीसकर लगाएँ, नाक में टपका दें और कुछ भाग पिला दें।
साँप के काटने पर बुबई तुलसी या बरबरी के बीजों को मुख में लेकर चबाना चाहिए। जब उसका लुआब बन जाए तो आधा भाग खा लिया और आधा काटने की जगह पर लेप कर दिया जाए। पत्तों का रस निकालकर पाँच तोले की मात्रा में पिलाने से भी शीघ्र लाभ होता है।

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