अग्नि पुराण - बयासीवाँ अध्याय ! Agni Purana - 82 Chapter !

अग्नि पुराण - बयासीवाँ अध्याय ! Agni Purana - 82 Chapter !

अग्नि पुराण बयासीवाँ अध्याय - समय दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षा की विधि का वर्णन !

अग्नि पुराण - बयासीवाँ अध्याय ! Agni Purana - 82 Chapter !

अग्नि पुराण - बयासीवाँ अध्याय ! Agni Purana - 82 Chapter !

ईश्वर उवाच
वक्ष्ये संस्कारदीक्षायां विधानं शृणु षण्मुख ।
आवाहयेन्महेशस्य वह्निस्थस्य शिरो हृदि ॥००१॥

संश्लिष्टौ तौ समभ्यर्च्य सन्तर्प्य हृदयात्मना ।
तयोः सन्निधये दद्यात्तेनैवाहुतिपञ्चकं ॥००२॥

कुसुमेनास्त्रलिप्तेन ताडयेत्तं हृदा शिशुं ।
प्रस्फुरत्तारकाकारं चैतन्यं तत्र भावयेत् ॥००३॥

प्रविश्य तत्र हुङ्कारमुक्तं रेचकयोगतः ।
संहारिण्या तदाकृष्य पूरकेण हृदि न्यसेत् ॥००४॥

ततो वागीश्वरीयौनौ मुद्रयोद्भवसञ्ज्ञया ।
हृत्सम्पुटितमन्त्रेण रेचकेन विनिक्षिपेत् ॥००५॥

ॐ हां हां हां आत्मने नमः
जाज्वल्यमाने निर्धूमे जुहुयादिष्टसिद्धये ।
अप्रवृद्धे सधूमे तु होमो वह्नौ न सिद्ध्यति ॥००६॥

स्निग्धः प्रदक्षिणावर्तः सुगन्धिः शस्यते ऽनलः ।
विपरीतस्फुलिङ्गी च भूमिस्पर्शः प्रशस्यते ॥००७॥

इत्येवमादिभिश्चिह्नैर् हुत्वा शिष्यस्य कल्मषं ।
पापभक्षणहोमेन दहेद्वा तं भवात्मना ॥००८॥

द्विजत्वापादनार्थाय तथा रुद्रांशभावने ।
आहारवीजसंशुद्धौ गर्भाधानाय संस्थितौ ॥००९॥

सीमन्ते जन्मतो नामकरणाय च होमयेत् ।
शतानि पञ्च मूलेन वौषडादिदशांशतः ॥०१०॥

शिथिलीभूतबन्धस्य शक्तावुत्कर्षणं च यत् ।
आत्मनो रुद्रपुत्त्रत्वे गर्भाधानं तदुच्यते ॥०११॥

स्वान्तत्र्यात्मगुणव्यक्तिरिह पुंसवनं मतं ।
मायात्मनोर्विवेकेन ज्ञानं सीमन्तवर्धनं ॥०१२॥

शिवादितत्त्वशुद्धेस्तु स्वीकारो जननं मतं ।
बोधनं यच्छिवत्वेन शिवत्वार्हस्य नो मतं ॥०१३॥

संहारमुद्रयात्मानं स्फुरद्वह्निकणोपमं ।
विदधीत समादाय निजे हृदयपङ्कजे ॥०१४॥

ततः कुम्भयोगेन मूलमन्त्रमुदीरयेत् ।
कुर्यात् समवशीभावं तदा च शिवयोर्हृदि ॥०१५॥

ब्रह्मादिकारणात्यागक्रमाद्रेचकयोगतः ।
नीत्वा शिवान्तमात्मानमादायोद्भवमुद्रया ॥०१६॥

हृत्सम्पुटितमन्त्रेण रेचकेन विधानवित् ।
शिष्यस्य हृदयाम्भोजकर्णिकायां विनिक्षिपेत् ॥०१७॥

पूजां शिवस्य वह्नेश् च गुरुः कुर्यात्तदोचितां ।
प्रणतिञ्चात्मने शिष्यं समयान् श्रावयेत्तथा ॥०१८॥

देवं न निन्देच्छास्त्राणि निर्माल्यादि न लङ्घयेत् ।
शिवाग्निगुरुपूजा च कर्तव्या जीवितावधि ॥०१९॥

बालबालिशवृद्धस्त्रीभोगभुग्व्याधितात्मनां ।
यथाशक्ति ददीतार्थं3 समर्थस्य समग्रकान् ॥०२०॥

भूताङ्गानि जटाभस्मदण्डकौपीनसंयमान् ।
ईशानाद्यैर् हृदाद्यैर् वा परिजप्य यथाक्रमात् ॥०२१॥

स्वाहान्तसंहितमन्त्रैः पात्रेष्वारोप्य पूर्ववत् ।
सम्पादितद्रुतं हुत्वा स्थण्डिलेशाय दर्शयेत् ॥०२२॥

रक्षणाय घटाधस्तादारोप्य क्षणमात्रकं ।
शिवादाज्ञां समादाय ददीत यतिने गुरुः ॥०२३॥

एवं समयदीक्षायां विशिष्टायां विशेषतः ।
वह्निहोमागमज्ञानयोग्यः सञ्जायते शिश्रुः ॥०२४॥

इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये समयदीक्षाकथनं नाम द्व्यशीतितमो ऽध्यायः

अग्नि पुराण - बयासीवाँ अध्याय !-हिन्दी मे -Agni Purana - 82 Chapter!-In Hindi

भगवान् शिव कहते हैं- षडानन ! अब मैं  संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन करूँगा, सुनो अग्निमें स्थित महेश्वरके शिवा-शिवमय (अर्ध- नारीश्वर) रूपका अपने हृदयमें आवाहन करे। शिव और शिवा दोनों एक शरीरमें ही परस्पर सटे हुए हैं-इस प्रकार ध्यानद्वारा देखकर उनका पूजन करके हृदय मन्त्रसे संतर्पण करे। फिर उनके संनिधानके लिये हृदय मन्त्रसे ही अग्निमें पाँच आहुतियाँ दे। तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित पुष्पद्वारा शिष्यके हृदयमें ताड़ना दे, अर्थात् उसके वक्षपर उस फूलको फेंके। फिर उसके भीतर प्रकाशमान नक्षत्रकी आकृतिमें चैतन्य (जीव) की भावना करे। तत्पश्चात् हुंकारयुक्त रेचक प्राणायामके योगसे शिष्यके हृदयमें भावनाद्वारा प्रवेश करके संहारिणीमुद्राद्वारा उस जीवचैतन्यको वहाँसे खींचकर पूरक प्राणायामके योगसे उसे अपने हृदय में स्थापित करे ॥ १-४॥
तदनन्तर 'उद्भव' नामक मुद्राका प्रदर्शन करके हत्सम्पुटित आत्ममन्त्रका उच्चारण करते हुए रेचक प्राणायामके सहयोगसे उसका वागीश्वरी देवीकी योनिमें भावनाद्वारा आधान करे। उक्त मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है - ॐ हां हां हामात्मने नमः। इसके बाद अत्यन्त प्रज्वलित एवं धूमरहित अग्निमें अभीष्ट-सिद्धिके लिये आहुति दे। अप्रज्वलित तथा धूमयुक्त अग्निमें किया गया होम सफल नहीं होता है। यदि अग्निकी लपटें दक्षिणावर्त उठ रही हों, उससे उत्तम गन्ध प्रकट हो रही हो तथा वह अग्नि सुस्निग्ध प्रतीत होती हो तो उसे श्रेष्ठ बताया गया है। इसके विपरीत जिस अग्निसे चिनगारियाँ छूटती हों तथा जिसकी लपट धरतीको ही चूम रही हो, उसे उत्तम नहीं कहा गया है ॥५-८ ॥ 
इस श्लोकके बाद सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' में तीन श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जिनमें शिष्यके पापविशेषको जाननेके लिये अग्निके लक्षण दिये गये हैं। वे श्लोक इस प्रकार हैं-
अन्तेवासिकृत्तं पापं जानीयादग्निलक्षणैः विष्ठागन्धे स भूहर्ता विष्ठागन्धे स भूहर्ता ॥
सुरापो गुरुहन्ता च गोष्नश्च कृतनाशनः कृशेऽग्नौ शवगन्धे च गर्भभर्तृविनाशनः ॥
भ्रमति स्त्रीषधे वह्निः कम्पते हेमहतंरि । वधे स्फुटति बालस्य निस्तेजा गर्भघातके ॥
'हवनीय अग्निके लक्षणोंसे शिष्यद्वारा किये गये पापविशेषको जानना चाहिये। यदि उस अग्निसे विष्ठाकी-सी दुर्गन्ध प्रकट होती हो तो यह जानना चाहिये कि वह शिष्य भूमिहर्ता, ब्रह्महत्यारा, गुरुपत्नीगामी, शराबी, गुरुमाती, गोवध करनेवाला तथा कृतघ्न रहा है। यदि अग्नि क्षीण हो और उससे मुर्देकी-सी बदबू आ रही हो तो उस शिष्यको गर्भ-हत्यारा और स्वामिघाती समझना चाहिये। यदि शिष्यमें स्त्रीवधजनित पाप हो तो उसके आहुति देते समय आगकी लपट सब ओर चक्कर देती है और यदि वह सुवर्णकी चोरी करनेवाला है तो उससे अग्निदेवमें कम्पन होने लगता है। यदि शिष्यने बालहत्याका पाप किया है तो अग्निमें किसी वस्तुके फूटनेकी-सी आवाज होती है। यदि शिष्य गर्भघाती है तो उसके संनिहित होनेसे आग निस्तेज हो जाती है।'इस प्रकारके चिह्नोंसे शिष्यके पापको जानकर उसका हवन कर दे, अथवा पाप-भक्षण-निमित्तक होमसे उस पापको जला डाले। फिर नूतन रूपसे उसमें द्विजत्वकी प्राप्ति, रुद्रांशकी भावना, आहार और बीजकी शुद्धि, गर्भाधान, गर्भ-स्थिति (पुंसवन), । सीमन्तोन्नयन, जातकर्म तथा नामकरण के लिये पृथक् पृथक् मूल-मन्त्रसे एक सौ पाँच-पाँच आहुतियाँ दे तथा चूडाकर्म आदिके लिये इनकी अपेक्षा दशमांश आहुतियाँ प्रदान करे। इस प्रकार जिसका बन्धन शिथिल हो गया है, उस जीवात्माके भीतर जो शक्तिका उत्कर्ष होता है, वही उसके रुद्रपुत्र होनेमें निमित्त बनकर 'गर्भाधान' कहलाता है। स्वतन्त्रतापूर्वक उसमें जो आत्मगुणोंकी अभिव्यक्ति होती है, उसीको यहाँ 'पुंसवन' माना गया है। माया और आत्मा-दोनों एक-दूसरेसे पृथक् हैं, इस प्रकार जो विवेक-ज्ञान उत्पन्न होता है, उसीका नाम यहाँ 'सीमन्तोन्नयन' है ॥ ९-१३ ॥ 
शिव आदि शुद्ध सद्वस्तुको स्वीकार करना 'जन्म' माना गया है। मुझमें शिवत्व है अथवा मैं शिव हूँ, इस प्रकार जो बोध होता है, वही शिवत्वके योग्य शिष्यका 'नामकरण' है। संहार- मुद्रासे प्रकाशमान अग्निकणके समान प्रतीत होनेवाले जीवात्माको लेकर अपने हृदयकमलमें स्थापित करे। तदनन्तर कुम्भक प्राणायामके योगपूर्वक मूल-मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस समय हृदयके भीतर शक्ति और शिवकी समरसताका सम्पादन करे ॥ १४-१६ ॥
ब्रह्मा आदि कारणोंका क्रमशः त्याग करते हुए रेचक-योगसे जीवात्माको शिवके समीप ले जाकर फिर उद्भवमुद्राके द्वारा उसे वापस ले ले और पूर्वोक्त हृत्सम्पुटित आत्ममन्त्रद्वारा रेचक प्राणायाम करते हुए विधानवेत्ता गुरु शिष्यके हृदय-कमलकी कर्णिकामें उस जीवात्माको स्थापित कर दे। इसके बाद गुरु शिव और अग्निकी तत्कालोचित पूजा करे और शिष्यसे अपने लिये प्रणाम करवाकर उसे समयाचारका उपदेश दे। वह उपदेश इस प्रकार है-' इष्टदेवता (शिव)- की कभी निन्दा न करे; शिव-सम्बन्धी शास्त्रोंकी भी निन्दासे दूर रहे; शिव-निर्माल्य आदिको कभी न लाँचे। जीवन-पर्यन्त शिव, अग्नि तथा गुरुदेवकी पूजा करता रहे। बालक, मूढ़, वृद्ध, स्त्री, भोगार्थी (भूखे) तथा रोगी मनुष्योंको यथाशक्ति धन आदि आवश्यक वस्तुएँ दे।' समर्थ पुरुषके लिये सब कुछ दान करनेका नियम बताया गया है ॥ १७-२१॥
व्रतके अङ्गभूत जटा, भस्म, दण्ड, कौपीन एवं संयमपोषक अन्य वस्तुओंको ईशान आदि नामोंसे अथवा उनके आदिमें 'नमः' लगाकर उन नाम-मन्त्रोंसे क्रमशः अभिमन्त्रित करके स्वाहान्त संहिता-मन्त्रोंका पाठ करते हुए उन्हें पात्रोंमें रखे और पूर्ववत् सम्पाताभिहत (संस्कारविशेषसे संस्कृत) करके स्थण्डिलेश (वेदीपर स्थापित- पूजित भगवान् शिव) के समक्ष उपस्थित करे। इनकी रक्षाके लिये क्षणभर कलशके नीचे रखे। इसके बाद गुरु शिवसे आज्ञा लेकर उक्त सभी वस्तुएँ व्रतधारी शिष्यको अर्पित करे ॥ २२-२
इस प्रकार विशेषरूपसे विशिष्ट समय-दीक्षा- सम्पन्न हो जानेपर शिष्य अग्निहोम तथा आगमज्ञानके योग्य हो जाता है ॥ २५ ॥ 
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समय-दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२
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