होलिका दहन की कथा शिव-पार्वती ( कामदेव ) Holika Dahan Kee Katha Shiv-Paarvatee ( Kaamadev )

होलिका दहन की कथा शिव-पार्वती ( कामदेव )

होलिका दहन और होली में अंतर 

होली भारत का जीवंत और रंगीन त्योहार है। यह जीवन के उत्साह का प्रतीक है। यह क्षमा, मित्रता, एकता और समानता का दिन है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव भी है। होली को दो घटनाओं में विभाजित किया जाता है: होलिका दहन या छोटी होली और रंगवाली होली, जिसे धूलिवंदन भी कहा जाता है।  धूलिवंदन से एक रात पहले होलिका दहन होता है। अच्छाई द्वारा बुराई को हराने के प्रतीक के रूप में लकड़ी और गोबर के उपले जलाए जाते हैं। धूलिवंदन होलिका दहन के बाद सुबह होता है, तब बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी व्यक्त करने के रूप में एक दूसरे पर रंग लगाया जाता है। 
होलिका दहन में एक बड़ा दहन कुंड बनाया जाता है और लोग इसमें घी, लकड़ी और खुशबूदार गुब्बारे डालकर उन्हें आग लगाते हैं। होलिका दहन के अगले दिन खुशी के रूप में सभी लोग रंग, अभिनय, अच्छे पकवान, मिठाईयां बनाते हैं और फिर बहुत सारी मस्ती के साथ एक दूसरे पर रंग – गुलाल लगाते हैं। होलिका दहन का पर्व होलिका की बुरी ताकत पर भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद की भक्ति की जीत की याद दिलाती है। बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करना ही होलिका दहन का उद्देश्य है और इसी जीत का जश्न ही रंगों का त्योहार होली है।


Holika Dahan Kee Katha Shiv-Paarvatee ( Kaamadev )

होलिका दहन की कथा शिव-पार्वती

एक पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में हिमालय की पुत्री पार्वती की इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान शिव से ही हो। सभी देवता भी चाहते थे कि देवी पार्वती ही भगवान शिव से विवाह करें। लेकिन, भगवान शिव सदैव गहन ध्यान में लीन रहते थे। ऐसे में देवी पार्वती के लिए शिव जी के सामने अपना विवाह प्रस्ताव रखना कठिन हो रहा था। इस कार्य में पार्वती जी ने कामदेव से सहायता मांगी। पहले तो कामदेव यह सुनकर घबरा गये कि उन्हें भगवान शिव का ध्यान भंग करना है। लेकिन पार्वती जी के अनुरोध पर वह इस कार्य को करने के लिए तैयार हो गए। भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव ने भगवान पर प्रेमबाण छोड़ा। तपस्या भंग होने से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गये। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और कामदेव को भस्म कर दिया। जिसके बाद शिव जी ने देवी पार्वती से विवाह किया।  कामदेव के अग्नि में भस्म हो जाने के बाद शिव शंकर को अनुमान हुआ कि कामदेव निर्दोष थे. इसके बाद माता पार्वती के पूर्व जन्म की कहानी जानकर उन्हें कामदेव के लिए और ज्यादा सद्भाव जागा. ऐसे में महादेव ने कामदेव को एकबार फिर जीवित कर दिया और उन्हें अशरीरी बना दिया. इस दिन लोग फाल्गुन मास पर होलिका दहन कर रहे थे. इसी होलिका में कामदेव की वासना की मलिनता जलकर प्रेम के रूप में प्रकट हुई और कामदेव का अशरीरी भाव से सृजन हुआ जिसका सभी ने जश्न मनाया. इसके बाद से ही होली का त्योहार मनाया जाने लगा.
होलिका दहन का त्योहार कामदेव को जलाने से संबंधित है। अत: इस पर्व का महत्व यह है कि व्यक्ति को होलिका दहन के साथ अपनी इच्छाओं का भी दहन कर देना चाहिए। और, अपनी चाहतों से ऊपर उठकर एक अच्छा जीवन व्यतीत करें।

यहाँ भी पढ़े क्लिक कर के-

होलिका दहन की विशेषताएं और उनका महत्व

होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन लोग अलाव जलाते हैं और भगवान विष्णु के प्रति भक्त प्रह्लाद की भक्ति की जीत को याद करते हैं। इसके अलावा अपने अन्दर की सभी बुराइयों, छल-कपट, बुरी आदतों को उस अग्नि में भस्म करके अच्छाई की राह पर चलने का संकल्प लेते हैं। जिस प्रकार प्रह्लाद की अच्छाई के सामने होलिका जैसी बुराई जल गई उसी प्रकार लोग अपनी बुराइयों को होलिका की अग्नि में जला देते हैं। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन से पहले होलिका की पूजा की जाती है। अब यह सवाल आपके मन में ज़रूर आएगा कि होलिका तो असुरी थी फिर उसकी पूजा क्यों? हालांकि होलिका असुरी थी लेकिन ऐसा माना जाता है कि होलिका को सभी भयों को दूर करने के लिए बनाया गया था।  वह शक्ति, धन और समृद्धि का प्रतीक थी।  इसलिए होलिका दहन से पहले प्रह्लाद सहित होलिका की पूजा की जाती है। इस दिन पूजा करने से व्यक्ति को अपने जीवन से सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिलती है।
इस समारोह को समर्पित अलाव जलाते समय एक होलिका दहन मंत्र का जाप किया जाता है। शांति और खुशी बनाए रखने के लिए भक्त होलिका की आत्मा का सम्मान करते हैं और प्रार्थना करते हैं। पानी के बर्तन के साथ तीन, पांच या सात बार अलाव के चारों ओर घूमकर प्रार्थना समाप्त की जाती है। फिर, अंतिम परिक्रमा पूरी होने पर भक्त बर्तन खाली कर देते हैं। परंपरा का पालन करते हुए जब लोग परिक्रमा करते हैं तब अलाव से आने वाली गर्मी शरीर में बैक्टीरिया को मारती है और इसे साफ करती है। होलिका दहन की रस्म के बाद श्रद्धालुओं के माथे पर तिलक लगाया जाता है। मौसम की पकी या भुनी हुई फसलें खाई जाती हैं। कुछ भक्त कुछ होलिका की राख भी अपने घर ले जाते हैं क्योंकि उसे शुभ माना जाता है।

Comments